Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

बाजार में बिकती सुन्दरता

अभी हाल में, दो लंबे दशकों के इंतजार के बाद भारत की एक युवती ‘मिस यूनिवर्स-2021’ का ताज हासिल करने में कामयाब हुई है। इसके साथ ही यह सवाल एक बार फिर उठ खडा हुआ है कि आखिर सुन्दरता कहते…

कैसे कारगर होगा, ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) ?

सालभर से ज्यादा के किसानों के दिल्ली धरने में, तीन कानूनों की वापसी के बाद जिस बात का अडंगा लगा है वह ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यानि ‘एमएसपी’ है। इसे अमल में कैसे लाया जाएगा? किन तरीकों से ‘एमएसपी’ को कारगर…

बिहार : शराबबंदी के संकट

हजारों करोड रुपयों के राजस्व को ठेंगे पर मारते हुए पांच साल पहले बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, लेकिन क्या यह अपेक्षित सफलता पा सकी है? आंकडे और अनुभव बता रहे हैं कि एक तरफ ‘मद्यनिषेध’ से…

हथकरघा के हाल, बेहाल

देश में आज भी कृषि के बाद दूसरा, सर्वाधिक रोजगार देने वाला हैन्डलूम क्षेत्र, जिसमें आजादी के आंदोलन की प्रतीक खादी भी शामिल है, किस हाल में है? अनुभव और आंकडे बताते हैं कि सरकारी नीतियों और उनके अमल ने…

‘आत्मनिर्भरता’ का आधार

डॉ. पीएस वोहरा पिछले कुछ सालों के निजाम में हमारे आर्थिक विकास के लिए एक नया शब्द आया है – ‘आत्मनिर्भरता।अब देखना यह होगा कि आत्मनिर्भर भारत के लिए जरूरी रोडमैप के अंतर्गत अर्थव्यवस्था के लिए बनने वाली दूरदर्शी आर्थिक…

बराबरी के विरोध में मर्दानगी

हजारों साल की भारतीय संस्कृति का सतत गुणगान करने वाले हमारे समाज में औरतें आज भी दोयम दर्जे पर विराजमान हैं। मर्दों की मर्दानगी को कुछ ऐसी हैसियत प्राप्त है कि वह जब चाहे, जैसे चाहे औरतों के साथ कर…

भोजन के बाजार में भुखमरी

पिछले कुछ सालों में भोजन के बाजार ने भूख को किनारे कर दिया है। आजादी के बाद की तीखी भुखमरी के बरक्स हमने उत्पादन तो कई-कई गुना और इतना अधिक बढा लिया है कि पैदावार के भंडारण की समस्या खडी…

समाज : गरीबी उन्मूलन से समाज में शांति

गरीबी और शांति के बीच गहरा और एक-दूसरे पर निर्भरता का द्वंद्वात्मक रिश्ता रहा है। यानि यदि किसी समाज में गरीबी होगी तो वहां शांति स्थापना असंभव है। पडौसी बांग्लादेश में करीब चालीस साल पहले इसे एक प्रोफेसर ने महसूस…

सामयिक : एक था, ‘एयर इंडिया’

कई सालों की मशक्कत के बाद हाल में टाटा कंपनी को ‘एयर इंडिया’ बेचकर मचाई जा रही बल्ले-बल्ले में किसी को उसकी अंतर्कथा दिखाई ही नहीं दे रही। यानि कि अभी कुछ साल पहले तक ठाठ से चलने वाली हमारे…

मौजूदा राजनीति से असहमत गांधी

स्वराज के लिए गांधीजी राजनीतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी आवश्यक मानते थे। लोकशाही की स्थापना के लिए सैनिक सत्ता पर नागरिक सत्ता की प्रधानता की लड़ाई वे अनिवार्य मानते थे। दरअसल आज सत्ता का आधार दंड…