बिहार : शराबबंदी के संकट

कुमार कृष्णन

हजारों करोड रुपयों के राजस्व को ठेंगे पर मारते हुए पांच साल पहले बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, लेकिन क्या यह अपेक्षित सफलता पा सकी है? आंकडे और अनुभव बता रहे हैं कि एक तरफ ‘मद्यनिषेध’ से मुक्त महाराष्ट्र में बिहार के मुकाबले कम शराब की खपत होती है और दूसरी तरफ, जहरीली शराब से होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ रही है। क्या हैं, ऐसी शराबबंदी के पेंच?

बिहार में पूर्ण शराबबंदी अप्रैल 2016 में लागू कर दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद जहरीली शराब से मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। सख्ती के बाद भी यह धंधा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। शराबबंदी के बावजूद बिहार में शराब उपलब्ध है। यह बात दीगर है कि लोगों को दो या तीन गुनी कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे शराब देशी हो या विदेशी। सरकार के लाख दावों के बाद भी समय-समय पर शराब की जब्ती व शराब के साथ गिरफ्तारियां इसके प्रमाण हैं। सरकारी तंत्र भी इस धंधे में अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। 

वैसे नीतीश कुमार के निर्णय के कारण ही राज्य में पंचायत स्तर तक शराब की दुकानें खुल गई थीं। यही वजह रही कि 2005 से 2015 के बीच बिहार में शराब दुकानों की संख्या दोगुनी हो गई थी। शराबबंदी से पहले बिहार में शराब की करीब छह हजार दुकानें थीं और सरकार को इससे करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये का राजस्व आता था। अप्रैल, 2016 को बिहार देश का ऐसा पांचवां राज्य बन गया जहां शराब के सेवन और जमा करने पर प्रतिबंध लग गया।

‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (एनएफएचएस) – 2020 की रिपोर्ट के अनुसार ‘ड्राई स्टेट’ होने के बावजूद बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा लोग शराब पी रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 15.5 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं। महाराष्ट्र में शराब प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन वहां शराब पीने वाले पुरुषों की तादाद 13.9 फीसदी ही है। अगर शहर और गांव के परिप्रेक्ष्य में देखें तो बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 14 प्रतिशत लोग शराब पीते हैं। बिहार में झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश एवं नेपाल से शराब की बड़ी खेप तस्करी कर लाई जाती है।

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दरअसल शराब व्यापारियों के सिंडिकेट को सरकार तोड़ नहीं पा रही है। आज तक किसी बड़ी मछली को नहीं पकड़ा जा सका है। पकड़े गए अधिकतर लोग या तो शराब पीने वाले हैं या फिर इसे लाने के लिए ‘कैरियर’ का काम करने वाले हैं। जहरीली शराब से हुई मौत का सबसे ताजा मामला बिहार के गोपालगंज का है जहां जहरीली शराब पीने से चार लोगों की मौत हो गई। इस साल अब तक 15 अलग-अलग घटनाओं में जहरीली शराब से करीब 70 लोगों की मौत हो गई।

इससे पहले  मुजफ्फरपुर में  27 अक्टूबर की रात को कुछ लोगों ने शराब पी थी, जिसके बाद 8 लोगों की मौत हो गई। मौतों के मामले में यह इस साल राज्य की तीसरी बड़ी वारदात है। इस शराबकांड में अब तक कुल छह लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जिले में जहरीली शराब से मौत को लेकर जनवरी के बाद से यह तीसरा मामला है। इससे पहले मुजफ्फरपुर के कटरा थाना इलाके में इस साल 17 और 18 फरवरी को जहरीली शराब पीने से पांच लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर के मनियार स्थित विशनपुर गिद्दा में 26 फरवरी को फिर जहरीली शराब से दो और ग्रामीणों की मौत हो गई थी।

बिहार में शराबबंदी के बावजूद शराब पीने से हो रही मौतों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि 2015 में महिलाओं की मांग पर हमने 2016 में शराबबंदी लागू की। इसको लेकर हम लोगों ने वचन दिया, विधानसभा और विधान परिषद में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ। सबने शराब नहीं पीने का संकल्प लिया। जितने सरकारी अधिकारी, कर्मचारी हैं सभी लोगों ने इसका संकल्प लिया, इसके लिये निरंतर अभियान चलता रहता है। जो गड़बड़ करते हैं वे पकड़ाते भी हैं। पुलिस-प्रशासन का जो काम है वो हर तरह से अपना काम करते रहते हैं।

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शराब का अवैध कारोबार करने वालों ने समानांतर अर्थव्यवस्था कायम कर ली है।  एक शराब दुकान में काम करने वाले मुलाजिम राजकुमार की बात से इसे समझा जा सकता है। वह कहते हैं, ‘‘अब मेरी आर्थिक स्थिति ठीक हो गई है। मैं एक हफ्ते में किसी भी ब्रांड की 50 बोतलें बेचता हूं और एक बोतल पर 300 रुपये की कमाई करता हूं। बिहार में 50 हजार करोड़ की शराब की खपत होती है, बड़े माफिया, पुलिस-पदाधिकारी शराबबंदी के बाद माला-माल हो रहे हैं। शराब का व्यापार खूब फल-फूल रहा है।

बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक अभयानंद कहते हैं, ‘‘शराबबंदी की नाकामी में पैसे की बड़ी भूमिका है। चंद लोग बहुत अमीर बन गए हैं। जो लोग पकड़े जा रहे हैं, वे बहुत छोटे लोग हैं। असली धंधेबाज या फिर उन्हें मदद करने वाले ना तो पकड़ में आ रहे और ना ही उन पर किसी की नजर है। जाहिर है, जब तक असली गुनाहगार पकड़े नहीं जाएंगे तब तक राज्य में शराबबंदी कानून की धज्जियां उड़ती ही रहेंगी।

विधानसभा में मद्यनिषेध उत्पाद एवं निबंधन विभाग के आय-व्यय पर वाद-विवाद के बाद विभाग की ओर से मंत्री सुनील कुमार ने उत्तर दिया कि शराबबंदी को और प्रभावी बनाने के लिए 186 पुलिस कर्मियों व आठ उत्पाद कर्मियों को बर्खास्त किया गया। ऐसा देश के किसी भी राज्य में नहीं हुआ है। इसमें 60 पुलिसकर्मी ऐसे हैं जो अगले 10 साल तक थाना प्रभावी नहीं बन सकते।

‘सुशासन बाबू’ के नाम से पहचाने जाने वाले और मुख्यमंत्री की गद्दी पर सबसे अधिक समय तक बैठने वाले नीतीश कुमार के शासन की सच्चाई यह भी है कि उन्होंने जो शराबबंदी अब से करीब पांच वर्ष पूर्व लागू की, वो समय-समय पर कुछ एक घटनाओं के कारण उनके शासन की या उनके दोहरे मापदंड की पोल खोल देता है।

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शराब पीने से देश-दुनिया में होने वाली मौतों की रिपोर्ट आ गई है। इसके बावजूद लोग पीयेंगे तो गड़बड़ होगा ही। अगर शराब के नाम पर कोई गड़बड़ चीज पिला देगा तो पीने वाले की मौत हो सकती है। इसको लेकर लोगों को सचेत किया जाता है। अधिकतर लोग शराबबंदी के पक्ष में हैं, चंद लोग ही इसके खिलाफ हैं। जो कुछ लोग इधर-उधर का गड़बड़ धंधा करते हैं या कुछ पीना चाहते हैं, इस तरह के चंद लोग ही इसके खिलाफ हैं। उन लोगों से भी अपील की जाती है कि वे ऐसा ना करें, शराबबंदी सबके हित में है। (सप्रेस)

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