समसामयिक

महिलाओं, बच्चों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाना जरूरी 

 ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) के द्वारा किए गए शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित होने वाले 80 प्रतिशत महिलाएँ या बच्चे हैं। इनमें किशोरी और युवा लड़कियां भी शामिल हैं जो कि गरीबी, हिंसा या अनपेक्षित गर्भधारण, असमय गर्भपात के बढ़ते जोखिम का सामना कर रही…

वित्‍तीय संसार : सेठ की साथी सरकार

अमेरिका के ‘फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ (एफबीआई) द्वारा अडाणी पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों ने अव्वल तो सरकार और सेठ के सर्वज्ञात निकट संबंधों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। दूसरा और सर्वाधिक शर्मनाक खुलासा देश की…

मानवता के लिए सार्थक बने मानवाधिकार दिवस 

10 दिसम्बर : मानवाधिकार दिवस समाज में मानवाधिकारों के होने वाले उल्लंघन के प्रति अगर मानव ही जागरूक नहीं है तो फिर इनका औचित्य क्या है? देखे तो पता चलेगा की कितने मानवाधिकारों का हनन मानव के द्वारा ही किया…

बिजली ‘सुधार’ : मुनाफे की कीमत पर अंधेरा

वीजू कृष्‍णन रोटी, कपडा और मकान की तरह बिजली भी जीवन की बुनियादी जरूरत बन गई है। जाहिर है, इन चारों अपरिहार्य उपादानों ने सेठों को अकूत पूंजी कूटने के भरपूर अवसर दिए हैं। बिजली क्षेत्र में सरकारें, तरह-तरह के…

बाजार : छोटे रोजगारों को रौंदता ई-कामर्स 

देखने, छूने, सूंघने और यदा-कदा चखने की इंद्रियों की मदद से होने वाली खरीद-फरोख्त को धता बताते हुए आजकल आनलाइन का चलन है जिसमें सीधे ऑर्डर करके जरूरत का सामान मंगाया जाता है। सरकार से लगाकर तमाम शोध संस्थान इस…

समाज : अमानवीकरण की महापरियोजना

पूंजी के फलने-फूलने के तौर-तरीकों में एक है, इंसानों को इंसानियत से बेदखल करके उन्हें मशीनों में तब्दील कर देना। मानवीय गुणों से वंचित मशीन-रूपी इंसान पूंजी के उत्पादन और मुनाफा कूटने के लिए बेहद मुफीद होता है। क्या होती…

गंगा सहित सभी नदियों की रक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी संघर्ष का ऐलान

आंदोलन को धार देने के लिए अगला राष्ट्रीय सम्मेलन कहलगांव में चार दशक बाद फिर से नई चुनौतियों से लड़ने के लिए गंगा मुक्ति आंदोलन फिर से मैदान में आ चुका है। बिहार के मुजफ्फरपुर के चंद्रशेखर भवन में गंगा…

भोपाल गैस त्रासदी : 40 साल की जद्दोजेहद

आज़म खान दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी से चार दशक पहले निपटने वाले भोपाल में इसे लेकर आज क्या हो रहा है? क्या सरकारों, सेठों और समाज ने अपनी-अपनी जिम्मेदारी सलीके से निभाई है? प्रस्तुत है, इसी की पड़ताल करता…

प्रकृति प्रदत्त वाणी एवं मनुष्य कृत भाषा !

प्रकृति प्रदत्त ज्ञानेंद्रियों और मनुष्य की सृजनात्मक एवं विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों की निरन्तर जुगलबंदी ने आज की दुनिया को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि जहां तक पहुंच कर हम समूची सभ्यता की सृजनात्मक शक्ति बढ़ा और नष्ट-भ्रष्ट भी…

द साबरमती रिपोर्ट : सिनेमा के पर्दे पर राजनीति का खेल

भारती पंडित फिल्‍म समीक्षा मीडिया में तो राजनीति का दखल हम देख ही रहे थे, अब फिल्मों में राजनीतिक दखल के क्या मायने होते हैं, इस फिल्म को देखने से आप समझ पाएँगे | सीधे और छुपे रूप से नफरत…