Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

समसामयिक

बाबा साहेब को आज समझने की जरूरत है

डॉ. भीमराव अम्बेडकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं, जो समानता, न्याय और मानव गरिमा की अलख जगाते हैं। 14 अप्रैल 1891 को जन्मे अम्बेडकर ने जीवनभर जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया और संविधान निर्माता बनकर भारत…

‘सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी’ : एक बेहतरीन विरासत

सामंती समाज की लाख बुराइयों के बावजूद कतिपय राजे-महाराजे पढ़ने-लिखने के भारी शौकीन हुआ करते थे। कई रजवाडों की लाइब्रेरियां असंख्य बेशकीमती,अनूठी किताबों से भरी रहती थीं। आज की जोधपुर की ‘सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी’ इन्हीं में से एक है। अशोक…

डिजिटल मीडिया : अनछुए मसलों को उजागर करने का तंत्र

हाल के कुछ दशकों में संवाद और संप्रेषण पर पूरी तरह छा चुका डिजिटल मीडिया हमारे आमफहम जीवन में कैसे दखल करता है? तेजी से बदलते, नित-नया होते इस अत्याधुनिक कारनामे ने हमें किस तरह लाभ पहुंचाया है? तेजी से बढ़ती…

केदारनाथ का पैदल मार्ग : कितना सुरक्षित? 

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 11,968 फीट की ऊंचाई पर बसा केदारनाथ मंदिर शीतकाल में 6 महीने बंद रहने के बाद अब 2 मई को फिर से खुलने वाला है। चारधाम यात्रा के इस हिस्से में लाखों श्रद्धालु आते हैं,…

साम्प्रदायिकता के खिलाफ गांधीजी का ताबीज

हाल के दिनों में देशभर में साम्प्रदायिकता का जहर तेजी से फैला है और नतीजे में समाज का तीखा विभाजन हो रहा है। ऐसे में महात्मा गांधी ही याद आते हैं। वे होते तो ऐसे हालातों में आखिर क्या करते?…

International Day of Zero Waste: स्वच्छता के साथ जीरो वेस्ट अभियान की जरूरत

कचरा संकट अब सिर्फ धरती तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरिक्ष तक फैल चुका है। जल, थल, नभ हर जगह मानव निर्मित अपशिष्ट का अंबार लगा है, जिससे पर्यावरण और जैव विविधता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। इसी को देखते…

म्यांमार और थाइलैंड में विनाशकारी भूकंप: प्रकृति के प्रकोप से मानवता पर संकट

28 मार्च को म्यांमार और थाईलैंड में 7.7 तीव्रता के भीषण भूकंप ने भारी तबाही मचाई, जिसमें 1600 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों घायल हुए। इसके बाद 7.0 तीव्रता के एक और झटके ने हालात और…

भाषा विमर्श : आखिर कैसे अलग है, हिंदी से उर्दू ?

संवाद के लिए बनी भाषा आजकल फिरकापरस्ती की दुनाली बनती जा रही है। सत्ता पर विराजी भाजपा अपनी एक-आयामी नजर से खुद को छोड़कर बाकी सबको खारिज करने में लगी है। उर्दू को एक धर्म-विशेष की भाषा करार देना इसी…

विनोद कुमार शुक्ल : ‘इतनी उदासीनता कहाँ से आती है ?’

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य में सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों की अनुपस्थिति को लेकर बहस छिड़ी है। यह बहस साहित्यकार की सामाजिक जिम्मेदारी और उसकी व्यक्तिगत रचनात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल उठाती है। सवाल है क्या हर…

Theatre : रंगमंच और शांति की संस्कृति

रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और संवेदना का जीवंत प्रतिबिंब है। विश्व रंगमंच दिवस (27 मार्च), जिसे 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट ने स्थापित किया, रंगमंच की गरिमा, प्रभाव और उसकी वैश्विक भूमिका को रेखांकित करने…