राजनीति

नागरिकों का सैन्यकरण या सेना का नागरिकीकरण ?

आम नागरिक कारण जानना चाहता है कि एक तरफ़ तो सरकार अरबों-खरबों के अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और अस्त्र-शस्त्र आयात कर सशस्त्र सेनाओं को सीमा पर उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना चाहती है और दूसरी ओर आने…

अमन के नाम से नफ़रत बेचने का मीडिया व्यापार !

अख़बारों के पाठकों और राष्ट्रीय (राष्ट्रवादी?) चैनलों की खबरों के प्रति ईमानदारी और विश्वसनीयता के प्रति पाठकों और दर्शकों का भ्रम काफ़ी हद तक टूटकर संदेहों में तब्दील हो चुका है।उनका बचा हुआ भरोसा भी सरकारी इंजीनियरों द्वारा बनवाए जाने…

नायकों की क़तार में कहां खड़े दिखना चाहते हैं पीएम?

मोदी जब हाल ही में तीन देशों की यात्रा पर गए तो बर्लिन में भारतीय समुदाय के कोई हज़ार-बारह सौ लोगों को अपने उद्बोधन में नेहरू के नाती और देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में उनका…

इन हिंसक भीड़ों पर नियंत्रण ज़रूरी हो गया है !

हमें भयभीत होना चाहिए कि अराजक भीड़ों के समूह अगर इसी तरह सड़कों पर प्रकट होकर आतंक मचाते रहे तो न सिर्फ़ क़ानून-व्यवस्था के लिए राष्ट्र्व्यापी संकट उत्पन्न हो जाएगा, उसमें शामिल होने वाले लोग धर्म और राष्ट्रवाद को ही…

दंगों के बीच खरगोन में नए कैराना की तलाश ?

तमाम लोग जो खरगोन से उठ रहे धुएँ के अलग-अलग रंगों का दूर से अध्ययन कर रहे हैं उन्हें एक नया मध्य प्रदेश आकार लेता नज़र आ रहा है। एक ऐसा मध्य प्रदेश जिसकी अब तक की जानी-पहचानी भाषा और…

दिया जलाओ : राजनीति ने जलता दिया बुझा दिया।

क्या किसी को याद है कि राजधानी में ही एक ज्योति और भी जल रही है? बापू की समाधि राजघाट पर जलती ज्योति क्या यह कह बुझाई जाएगी कि स्वतंत्रता के शहीदों का एक नया स्मारक हम बना रहे हैं…

नजरिया : खतरों से खेलता नेतृत्व

राजनेताओं और समाज का काम करने वालों का जीवन हमेशा ही खतरों के साये में रहता है और वे एक तरह से अपने काम इस समझ और तैयारी के साथ ही तय करते हैं। भारत में इसके अनेक उदाहरण हैं…

राजनीति : हम बदलेंगे, तभी हमारी राजनीति भी बदलेगी

पिछले कुछ समय से एक नया विमर्श और सामने आया है कि जनता को मुफ्तखोर नहीं बनाया जाना चाहिए। इस विमर्श के पैरोकार, जहां भी उन्हें मौका मिलता है, पिछली सरकारों द्वारा हम सब में पनपाई गई इस तथाकथित मुफ्तखोरी…

क्या देश में ‘गृह युद्ध’ को आमंत्रित किया जा रहा है ?

धर्म संसद जैसे आयोजनों से उठने वाली आवाज़ें मोदी के नेतृत्व वाले भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो क्षति पहुँचा ही रही है, देश के भीतर भी भाजपा की ताक़त को कमजोर कर रही है। योगी के कट्टर…

पूंजी को परोसी जाती सार्वजनिक सम्पत्ति

सार्वजनिक सम्पत्ति के निजीकरण की हुलफुलाहट में इन दिनों ठेका-प्रथा जारी है। हवाई-अड्डों, रेलवे-स्टेशनों, सडकों, कारखानों आदि को फिलहाल ठेके पर निजी कंपनियों को सौंपने के पीछे की नीयत आखिर निजीकरण नहीं तो और क्या है? ‘सरकार का काम व्यापार-व्यवसाय…