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दिया जलाओ : राजनीति ने जलता दिया बुझा दिया।

कुमार प्रशांत

क्या किसी को याद है कि राजधानी में ही एक ज्योति और भी जल रही है? बापू की समाधि राजघाट पर जलती ज्योति क्या यह कह बुझाई जाएगी कि स्वतंत्रता के शहीदों का एक नया स्मारक हम बना रहे हैं जहां सबके नाम से एक ही ज्योति जलाई जाएगी? तो बापू की हत्या तो स्वतंत्रता के बाद हुई थी। तो उस ज्योति का क्या करेंगे आप?

1943 का साल था और कुंदनलाल सहगल ने अपनी फिल्म ‘तानसेन’ में अपने मन-प्राणों का पूरा बल लगा कर गाया था : दिया जलाओ… जगमग जगमग दिया जलाओ ! अंधकार को तोलती और प्रकाश का आह्वान करती ऐसी हूक, ऐसी वेदना और ऐसी ललकार थी उनकी आवाज में कि हम विवश हो जाते थे कि मन के किसी कोने में, कहीं तो कोई दीप जले !! कला यही करती है। लेकिन राजनीति इसका उल्टा करती है।  नया साल आया नहीं कि राजनीति ने जलता दिया बुझा दिया।

अमर जवान ज्योति पिछले 70 से अधिक सालों तक उस इंडिया गेट पर जलती रही थी जिसे अब सेंट्रल विस्टा जैसा बेढब नाम दे कर धूल, धुआं और धंधे की गर्द में इस तरह ढक दिया गया है कि देश की राजधानी की उस पहचान का दम ही टूट गया है। वह पूरा परिसर आज शोक व सन्नाटे में डूबा है। कोई नई रचना पुराने इतिहास को इस तरह नेस्तनाबूद कर सकती है, इसकी कल्पना भी इस हादसे से पहले करना मुमकिन नहीं था। लेकिन उनके लिए यह मुमकिन है जो देश के इतिहास से नहीं, अपने इतिहास से निस्बत रखते हैं।

जो अमर जवान ज्योति रातोरात बुझा दी गई, वह तैयार भी रातोरात ही हुई थी- 1971 में भारत-पाक युद्ध की जीत के बाद ! लेकिन इसका इतिहास इससे भी पहले की कहानी बताता है। अंग्रेजों ने अपने सबसे बड़े व कमाऊ उपनिवेश की अपनी राजधानी को सत्ता व संपत्ति का भव्यतम प्रतीक बना कर खड़ा करने की सोची तो वास्तुकार एडविन लुटियंस को अपनी भव्यतम उड़ान को साकार करने का मौका मिला। उसने वह सब बनाया जो वह बनाना चाहता था। औपनिवेशिक शोषण में धन की कमी तो थी नहीं। हमारी सरकारी दिल्ली आज भी उनके स्थापत्य कला के तले दबी हुई है। 1914 से चलकर पहला विश्वयुद्ध 1919 में समाप्त हुआ तो अंग्रेज हुकूमत को अहसास हुआ कि साम्राज्य की नींव मजबूत रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रजा यह देखे कि साहब बहादुर उसका कितना ख्याल रखते हैं। इस तरह महायुद्ध में मारे गए देशी फौजियों का एक युद्ध स्मारक बनाने का ख्याल आया और लुटियंस साहब ने 1919 से शुरू कर 1931 में वह स्मारक तैयार किया जिसे हम इंडिया गेट कहते हैं- एक ऐसा गेट कि जिसकी एक तरफ खड़े हो कर आप अपने सामने अंग्रेजी हुकूमत का दंभ-दर्प और वैभव एक साथ देख सकते हैं। गुलामों को यह याद दिलाना कि गुलामी भी कितनी भव्य व सुनहरी हो सकती है, इसका मकसद था।

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यह इतिहास इंडिया गेट पर ठहरा, पथराया ही रहता लेकिन इंदिरा गांधी ने 1973 में बड़ी खूबसूरती व तत्परता से इसे मिटा दिया और स्वतंत्र भारत के इतिहास में समाहित कर लिया। इंडिया गेट अमर जवान ज्योति में बदल गया। यह जिस तरह बना व खिला उसमें यह युद्ध स्मारक नहीं, बलिदान स्मारक बन गया। अंग्रेजों ने इसकी ऊपरी दीवार पर महायुद्ध में मारे गए कोई 3 हजार भारतीय फौजियों के नाम खुदवाए थे जो बताते हैं कि धर्म-जाति-भाषा-का भेद किए बिना सबने बलिदान दिया था। अमर जवान ज्योति ने इसे भूत-वर्तमान व भविष्य तीनों को जोड़ दिया। कल्पना यह रही कि पहले के भी और भविष्य के भी युद्धों में बलिदान होने वालों का यह प्रतीक स्मारक होगा जिसकी ज्योति सदा जलती रहेगी। वहां का पूरा वातावरण युद्धोन्माद नहीं, वीरता के लिए श्रद्धा जगाता था। उल्टी राइफल पर टंगा फौजी टोप, सामने जलती अमर जवान ज्योति और चौबीस घंटे पहरे पर खड़ा मौन, पाषाणवत् फौजी जवान – सब मिलकर सारे बलिदानों का ऐसा मुखर व शालीन प्रतीक बनाते थे कि उसके चारों ओर उत्सव मनाता भारत भी उसकी गरिमा संभाल कर चलता था। एक झटके में यह सारा कुछ मेट दिया गया। अमर जवान की ज्योति ही बुझा दी गई।    

सवाल कई हैं जिनका जवाब कई स्तरों पर ढूंढा जाना चाहिए। युद्ध स्मारकों से पश्र्चिमी दुनिया पटी है, क्योंकि उनका सारा संसार बना ही युद्धों से है। उनके यहां युद्ध धार्मिक वीरता के भी, प्रतिद्वंद्वी के विनाश के भी, हथियारों का धंधा कर कमाई करने की भी युक्ति रहे हैं। दोनों विश्वयुद्धों में की गई अपनी अकूत कमाई के बल पर ही अमरीका ऐश्वर्य के शिखर पर विराजता रहा है। भय दिखा कर और भय बढ़ा कर आमने-सामने की स्थिति पैदा करना और फिर दोनों पक्षों को हथियार बेंचना पश्चिम की हर महाशक्ति का सम्माननीय धंधा रहा है। आज पश्चिम में छाई मंदी के पीछे एक कारण यह भी है कि पिछले दिनों में युद्ध तो कई हुए हैं, होते रहे हैं लेकिन महायुद्ध नहीं हो सके हैं। महायुद्ध नहीं तो महा कमाई नहीं। इसलिए उनके यहां युद्ध स्मारकों का एक मतलब युद्धों को जीवित रखना भी है।

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हमारे यहां भी युद्ध हुए हैं लेकिन वे कमाई के साधन नहीं रहे हैं। हमारी वृत्ति कभी साम्राज्यवादी या औपनिवेशिक नहीं रही। हमारे युद्धों का उद्देश्य भी कुछ बड़ा और कुछ श्रेष्ठ रहा है – महाभारत भी न्याय के लिए हुआ तो अनेक युद्ध आती औपनिवेशिक गुलामी को रोकने के लिए हुए। इसलिए भारतीय परंपरा में युद्ध स्मारकों की नहीं, बलिदान या शहादत के प्रतीक स्मारकों की स्वाभाविक जगह बनती है। और यह भी कि प्रतीक परिपूर्णता दर्शाते हैं, संख्या नहीं। साम्राज्य के सारे प्रतीकों को आत्मसात करती हुई अमर जवान ज्योति उन सबका परिपूर्ण प्रतिनिधित्व करती थी जो सार्वभौम, स्वतंत्र देश का गौरव संजोते हैं तथा एक उद्दात मन तैयार करते हैं। बाहर जलती ज्योति जब भीतर उजाला करती हो तभी उसकी सार्थकता है । अमर जवान ज्योति एक ऐसा ही प्रतीक बन कर भारतीय मन में अवस्थित हो चुका था। जरूरत नहीं थी उसे बुझाने की जरूरत थी ही तो नवनिर्मित युद्ध स्मारक में एक ज्योति और जलाई जा सकती थी। अंधकार जितना घना और अभेद्य होता है, समाज को उतने ही उजाले की जरूरत होती है यह किसने कहा कि एक बुझा कर ही दूसरा जलाया जा सकता है ? लेकिन जब प्रतीकों, महापुरुषों और  इतिहासों को हड़पने की पागल दौड़ चल रही हो और कोई, किसी की शह पा कर कह रहा हो कि आजादी 1947 में नहीं, 2014 में मिली, तब तो दीप बुझेंगे ही, हर इतिहास हमसे ही शुरू होता है, यह निर्धारित किया ही जाएगा। यह अंधकार बाहरी ज्योति जलाने से दूर नहीं होगा।

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क्या किसी को याद है कि राजधानी में ही एक ज्योति और भी जल रही है ? बापू की समाधि राजघाट पर जलती ज्योति क्या यह कह बुझाई जाएगी कि स्वतंत्रता के शहीदों का एक नया स्मारक हम बना रहे हैं जहां सबके नाम से एक ही ज्योति जलाई जाएगी ? तो बापू की हत्या तो स्वतंत्रता के बाद हुई थी। तो उस ज्योति का क्या करेंगे आप ? अब देखिए, अब छत्तीसगढ़ में अमर जवान ज्योति बनाई गई। आगे हो सकता है कि राज्यों में वैकल्पिक ज्योति जलाई जाए। जब आम सहमति बनाने की आप कोई कोशिश नहीं करते हैं तो आम प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है। ऐसी ज्योतियां और अंधकार फैलाएंगी।

 

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