विचार

जो तोड़ने से भी न टूटे वह गांधी है

गांधी सामयिक हैं, यह बात नारों-गीतों-मूर्तियों-समारोहों-उत्सवों से नहीं, समस्याओं के निराकरण से साबित करनी होगी. जो गांधी को चाहते व मानते हैं उनके लिए गांधी एक ही रास्ता बना व बता कर गए हैं : अपने भरसक ईंमानदारी व तत्परता…

हिजाब तो एक बहाना है ! निशाने पर कुछ और है ?

सवाल अब बुर्के या हिजाब के पहनने या नहीं पहनने का ही नहीं बल्कि यह भी बन गया है कि क्या एक विचारधारा विशेष के प्रति प्रतिबद्ध उत्तेजक भीड़ ही यह तय करने वाली है कि किसे क्या पहनना या…

हिजाब के सवाल पर बहस; प्रेम, भाईचारे और विश्वास से ही विवाद का हल

अरुण कुमार डनायक  मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनें या न पहनें, इस मुद्दे को लेकर कर्नाटक में विरोध हो रहा है। मामला उडुपी जिले के एक कॉलेज का है। यहां से जो खबरें आ रही हैं, वे चिंतनीय हैं। पर्दा प्रथा…

स्वास्थ्य : खाने के खतरे

उद्योगों और उनसे खडी की जाने वाली पूंजी का ताजा शिकार खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग हुआ है। इस प्रक्रिया में पहले खाद्य पदार्थों को बाजार के लिहाज से चमकदार बनाने के लिए उनकी पौष्टिकता कम या खत्म की जाती है और फिर…

दिया जलाओ : राजनीति ने जलता दिया बुझा दिया।

क्या किसी को याद है कि राजधानी में ही एक ज्योति और भी जल रही है? बापू की समाधि राजघाट पर जलती ज्योति क्या यह कह बुझाई जाएगी कि स्वतंत्रता के शहीदों का एक नया स्मारक हम बना रहे हैं…

एक पक्ष के लिए निष्पक्ष पत्रकारिता

सकारात्मक पत्रकारिता की तरह इन दिनों निष्पक्ष पत्रकारिता का चलन बढा है और जिस तरह सकारात्मक पत्रकारिता के नाम पर, अक्सर सत्ता-प्रतिष्ठानों की चापलूसी फल-फूल रही है, ठीक उसी तरह खुलेआम एक खास विचारधारा और सरकार की पक्षधरता के नाम…

जनता के ‘बजट’से जनता की ही जासूसी ?प्रजातंत्र अमर रहे !

अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से उस सरकार द्वारा अपने ही उन नागरिकों की जासूसी करना जिसे कि उन्होंने पूरे विश्वास के साथ अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप रखी है एक ख़तरनाक क़िस्म का ख़ौफ़ उत्पन्न करता है। ख़ौफ़ यह कि…

गांधी शहादत दिवस : गांधी को प्रासंगिक बनाते ‘अन्नदाता’

30 जनवरी : गांधी शहादत दिवस गांधी की शहादत के लंबे 74 सालों बाद भी हम यदा-कदा उनकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल सुनते-उठाते रहते हैं, लेकिन गांधी हैं कि तरह-तरह से हमें अपनी मौजूदगी जता देते हैं। हाल का, दिल्ली…

क्या देश में अब विस्मृत हैं गांधी

आचार्य राममूर्ति कर्मकांडों, मूर्तियों और खोखले ‘भजनों’ के बावजूद सब जानते हैं कि एक व्यक्ति और देश की हैसियत से हम गांधी को भूल गए हैं। यदि गांधी हमारे आसपास होते तो आज हमारी ऐसी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक…

‘फैशनेबल’ गांधी : टाई-सूट से लंगोट तक

अपने समय की जरूरतों के मुताबिक विशिष्ट रहन-सहन को फैशन माना जाए तो महात्मा गांधी सर्वाधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। इंग्लेंड, दक्षिण-अफ्रीका और भारत के अपने भिन्न-भिन्न जीवन काल में वहां की जरूरतों के अनुसार अपना वस्त्र-विन्यास बदलने वाले गांधी…