Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

75वीं दहलीज : संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा-पत्र व मानवाधिकार का सच

10 दिसंबर मानव अधिकार दिवस पर विशेष अपने उत्थान और पतन की पर्याप्त बहस में उलझा इंसान सार्वभौम घोषणा पत्र के 75 वर्ष बाद यह आँकलन कर रहा है कि हमने अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ क्या किया? मानवाधिकारों के संरक्षण…

समसामयिक : पूंजी के लिए कमाया जाता पुण्य

खेलों की तरह हमारे यहां अब त्यौहारों को भी बाजार के हवाले किया जा रहा है। आपसी मेल-मिलाप, आनंद और स्वाद के आधार पर मनाए जाने वाले त्यौहार अब मुहूर्त निकालकर की जाने वाली खरीददारी को अहमियत देने लगे हैं।…

खेल में खनकती पूंजी

हाल में भारत में हुए वन-डे विश्वकप क्रिकेट के आयोजन ने एक तरफ दुनिया-जहान के खेल प्रेमियों में हलचल मचाई, तो दूसरी तरफ एक बार फिर उजागर कर दिया कि क्रिकेट असल में खेल की बजाए दिनोंदिन पूंजी काटने का…

मामूली नहीं है एआई (AI) का संकट

कृत्रिम बुद्धि का विकास इस तरह से हो रहा है कि यह मनुष्य की बुद्धि से कई कदम आगे निकल सकती है| इसी कारण इसके बहुत खतरनाक होने की आशंका बढ़ जाती है| किसी भ्रष्ट और विध्वंसकारी उद्देेश्य से यदि…

प्रौद्योगिकी संस्थान में भी असुरक्षित हैं महिलाएं

बीएचयू में हुई एक दुर्घटना ने फिर उजागर कर दिया है कि देश के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव होता है, लेकिन क्या इसे दुरुस्त करने के रस्मी तौर-तरीके महिलाओं को उनकी हैसियत वापस लौटा सकेंगे?…

चुनाव सरकार नहीं, देश को गढ़ने का होना चाहिए

जीत-हार की राजनीति में आकंठ डूबे राजनेता पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में लगे हैं। इसके कुछ महीनों बाद समूचा देश केन्द्र की सत्ता चुनने में लग जाएगा, लेकिन ऐसे में क्या हमारी मौजूदा हालातों पर विचार करना मौजूं…

समसामयिक : कबीर दास की उल्टी वाणी

चुनावी बुखार ऐसा ही होता है ! आप हमेशा ही सन्निपात में होते हैं, फिर आपको अहसास ही नहीं होता कि आप जो कह रहे हैं वह कहने लायक है या नहीं; और यह भी कि आप जिनका गर्व से,…

बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करे समाज

बाल दिवस (14 नवम्बर) पर विशेष देश में प्रतिवर्ष 14 नवम्बर को ‘बाल दिवस’ मनाया जाता है। सही मायनों में बाल दिवस की शुरुआत किए जाने का मूल उद्देश्य बच्चों की जरूरतों को पहचानना, उनके अधिकारों की रक्षा करना और…

मुफ़्त अनाज और चुनावी रेवड़ियाँ जनता का मुँह बंद करने के लिए हैं ?

ग़रीबों को मुफ़्त अनाज देने की योजना की अवधि लोकसभा चुनावों के पहले दिसंबर में समाप्त होना थी। चूँकि ग़रीबों के हितों को लेकर सरकार लगातार चिंतित रहती है और संयोग से पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी इसी बीच…

शिक्षा : बेबसी और उम्मीद के बीच झूलते स्कूल

बहुपठित उपन्यास ‘रागदरबारी’ के एक प्रसंग में कहा गया है कि लगता है, शिक्षा-व्यवस्था सड़क किनारे की ऐसी आवारा कुतिया है जिसे हर कोई गुजरता आदमी बेवजह लात जमा देता है। आजकल शिक्षा में किए जा रहे ना-ना प्रकार के…