Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

डर का ‘डीएनए’

कहा जाता है कि इंसान की बुनियादी फितरत में आहार, निद्रा, क्रोध, भय और मैथुन शामिल हैं। इनमें से भय हमारे जीवन के सर्वाधिक करीब है। क्‍या होता है, भय? उसके क्‍या प्रभाव होते हैं? हमारे मन में भय क्‍यों,…

गंगत्व बचाने का काम लोकतंत्र में ‘लोक राजनीति’ से ही सम्भव

गंगा को अब लोक राजनीति से ही बचा सकते हैं। यह लोक राजनीति के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। इस हेतु सभी अपनी निजी पहचान भूलकर एकाकर संगठित होकर लोक राजनीति में जुटें। गंगत्व बचाने का काम लोकतन्त्र में लोक राजनीति…

एक प्रवक्ता की मौत और मीडिया की कथित मजबूरियाँ !

बेबाक टिप्‍पणी एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अख़बारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक…

आत्मनिर्भर भारत में बंद होता ‘हथकरघा बोर्ड’

हमारे यहां समाज, संस्‍कृति और श्रम की एक धुरी हस्‍तशिल्‍प भी रही है। इसीलिए आजादी के पहले और बाद में भी हथकरघा उत्‍पादन स्‍थानीय संसाधनों के उपयोग, निजी श्रम और आपसी लेन-देन की खातिर अहमियत पाते रहे हैं। अब हस्‍तशिल्‍प…

संविधान के संकट

73वें ‘स्‍वतंत्रता दिवस’ (15 अगस्‍त) पर विशेष व्‍यक्ति के ब्‍याह और जन्‍म आदि की वर्षगांठ की तरह किसी देश की आजादी की वर्षगांठ में अव्‍वल तो खुशी और समारोह होना ही चाहिए, लेकिन फिर इन अवसरों पर आत्‍म–समीक्षा भी की जानी चाहिए ताकि…

पिंजरे चुनने की आजादी

आजादी बहुत अधिक सजगता की मांग भी करती है। अक्सर तो हमें इसका अहसास भी नहीं होता कि वह वास्तव में हम आजाद नहीं या फिर जिसे आजादी समझ रहे हैं वह गुलामी का ही एक परिष्कृत रूप है। सुसज्जित…

राजनीतिक शून्‍य से बनता है, बेपरवाह समाज

तमाम अटकल-पच्चियों के बावजूद सवाल है कि क्‍या हमारा समाज आजादी के बाद के सबसे बडे पलायन को भोगने की तकलीफों को महसूस करना भी छोड़ चुका है? या फिर ‘पहचान,’ ‘धर्म’,’ ‘बहु-संख्‍यकवाद’ जैसी कोई और बात है जिसके चलते…

सरकार तो बच गई, ‘सरदार’ कमज़ोर हो गए ?

कांग्रेस के लिए बहुत ही नाज़ुक वक्त में एक और सरकार स्वाहा होने से बच गई पर राजस्थान की सात करोड़ जनता और देश के लिए अब कुछ ही बचे हुए नेताओं में से भी कुछ और नज़रों से गिर…

दामिनी दमक रही घन माहीं

तुलसी-कृत ‘रामचरित मानस’ के ‘किष्किंधा कांड’ में अनूठा प्रकृति चित्रण करते हुए तुलसी बाबा ‘दामिनी’ यानि तडित या बिजली का वर्णन भी करते हैं। क्‍या है यह, ‘दामिनी?’ मानसून के मौसम में गिरती बिजली देखना आम बात है, लेकिन यह…

कश्‍मीर के बाद मंदिर, मंदिर के बाद क्‍या?

भाजपा की राजनीतिक सत्‍ता प्राप्ति की यात्रा को ही देखें तो पता चलता है कि उसने आम लोगों और समाज में सुगबुगा रहे सवालों पर ही उंगली रखी है और नतीजे में शून्‍य से शिखर तक पहुंची है। इसके विपरीत…