Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विकास

नमामि गंगे परियोजना : नौ दिन चले अढ़ाई कोस

नदियों को अहर्निश मां, पुण्‍य-सलिला, जीवन-दायिनी आदि का दर्जा देते रहने वाला समाज और उसके वोट से बनी सरकारें नदियों के साथ क्या और कैसा व्यवहार करते हैं, इसे जानने के लिए गंगा की बानगी काफी है। हजारों करोड रुपयों…

‘पेसा कानून’ के बरक्स बसनिया बांध

आज के विकास की मारामार में सरकारें और कंपनियां उन कानूनों तक को अनदेखा कर रही हैं जिन्हें बाकायदा संसद में पारित किया गया है। इन कानूनों के मैदानी अमल के लिए बनाए जाने वाले नियमों में, मूल कानून की…

खाद्यान्न की बर्बादी : खतरे में खाद्यान्न

दुनियाभर में सबके लिए पेट-भर भोजन एक बडी समस्या बनता जा रहा है, लेकिन उससे पार पाने के लिए कोई कारगर उपाय सामने नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ, बडी मात्रा में खाद्यान्न की बर्बादी इस संकट की विडंबना को…

बैंकों की बदहाली और निजीकरण का खतरा

किसी भी देश की आर्थिक सेहत में बैंकों की भूमिका अहम होती है,लेकिन आजकल तीसरी दुनिया, खासकर भारत सरीखे देशों में बैंकों को आम जनता को लूटने की नायाब तरकीब की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। नतीजे में समूचा…

आर्थिक विकास : गिरता रुपया, चढ़ता डॉलर

‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ (जेएनयू) से अर्थशास्त्र पढीं देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की इस बात में कितना दम है कि रुपए के गिरने की वजह डॉलर का मजबूत होना है? ध्यान से देखें तो उनकी यह टिप्पणी समूचे अर्थतंत्र को…

प्रकृति : जिन्दा रहने की जद्दोजेहद

अब यह कोई दुराव-छिपाव की बात नहीं रही है कि हमारे आम-फहम जीवन में लगातार गिरावट आती जा रही है और इसकी वजह भी हम खुद ही हैं। आखिर किस तरह हम अपनी इस बदहाली से पार पा सकते हैं?…

गंगा : मैली रह गईं मोक्षदायिनी

हमारे समाज के पाखंड को देखने का एक आसान तरीका नदियों की बदहाली का भी है। जिन नदियों को हम अहर्निश पूजते, माता का दर्जा तक देते हैं, उनमें तरह-तरह की औद्योगिक, रासायनिक और अस्पताली गंदगियों को उडेलते हुए कोई…

मध्यप्रदेश स्‍थापना दिवस : मिल-जुलकर बना मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ समेत) का गठन 1 नवम्बर 1956 को हुआ था। राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक विशेष आयोग बनाया गया था जिसका नाम ‘राज्य पुनर्गठन आयोग’(एसआरसी) था। 1956 के पूर्व जो राज्य अस्तिव में थे उनका कोई तार्किक आधार…

विकास के बरक्स ‘यू-टर्न’ की युक्ति

विकास का मौजूदा मॉडल दरअसल विनाश को न्यौतता है, यह बात कोई दबी-छिपी नहीं रह गई है। ऐसे में कैसे हम अपने जीवन को जीने लायक बनाए रखें? हाल में बिज़नेस न्यूज-चैनल पर एक विज्ञापन देखा जिसमें बताया गया था…