सप्रेस फीचर्स

आर्थिक हित पोषक बनने के स्थान पर शोषक बन जाते है, तब कोरोना जैसे प्रलय की घंटी

कोरोना के बाद विश्‍व को टिकाने का रास्ता प्रकृति अनुकूलन ही है। प्रकृति के विपरीत समाजवाद में भी पूंजी की परिभाषा अच्छी नहीं थी, इसलिए पूंजीवाद और समाजवाद दोनों में ही प्राकृतिक आस्था नहीं है और प्राकृतिक संरक्षण सिमटा है। जब भी विश्‍व में प्रकृति के विपरीत ही सब काम होने लगे तो प्रकृति का बडा हुआ क्रोध महाविस्फोट बनता है और उससे प्राकृतिक आपदाएं निर्मित होती है। कोरोना को आपदा भी मान सकते है। महामारी केा प्रलय भी कहा जा सकता है। भारत इस महामारी से अपने परंपरागत ज्ञान आयुर्वेद द्वारा बहुत से कोरोना प्रभावितों को स्वस्थ बना सका है। बहुत लोगों के प्राण बचे है। इस आधुनिक आर्थिक तंत्र ने आयुर्वेद जैसी आरोग्य रक्षण पद्धति को सफल बनने का मौका ही नहीं दिया गया। उसने आर्थिक लाभ के लिए केवल चिकित्सा तंत्र को ही बढावा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरफ लौटने का वक्त

सुरेंद्रसिंह शेखावत कोविड-19 से बचने के लिए लगाए गए ‘लॉक डाउन’ के तीसरे चरण में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब कोरोना के बाद क्‍या? आजादी के सत्‍तर सालों में हमने उद्योग, शहरीकरण और मशीनीकरण का उपयोग करके देख…

भारत में हैं, नई दुनिया की संभावनाएं

कोरोना के प्रकोप ने हमारे सामने, भले ही परोक्ष रूप से, विकास की वैश्विक अवधारणा का एक बेहद जरूरी सवाल खडा कर दिया है। यानि विकास के नाम पर आज तक हम जो और जैसा करते रहे थे, वह दरअसल…

नागरिकता साबित करने के ताजा कानून

जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र आदि की कठोर मानी जाने वाली वर्जनाओं को तोड़कर देशभर को आंदोलन के लिए मजबूर करने वाला ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (सीएए) और ‘राष्ट्रीय नागरिकता पंजी’ (एनआरसी) आखिर क्या करने वाले हैं? क्या ‘राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी’ (एनपीआर)…

सत्ता की मार्फत नहीं बदल सकेगा समाज

महेन्द्रकुमार राजनीति के द्वारा सत्ता प्राप्त करके ही सेवा की जा सकती है। यानि गांवों की सेवा कोई बहुत बड़ा बिच्छू है और उसे राजसत्ता के चिमटे से पकड़ा जाए। राजनीति में पड़े हुए कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें…

सचमुच वे गुमनाम नींव की ईंटें भी प्रणम्य हैं

किसी व्यक्ति की महानता उसके समय, परिवेश और परिजनों पर भी निर्भर करती है। महात्मा गांधी को भी अपने सबसे बड़े भाई से ऐसा साथ, सहयोग, सहायता मिलती रही। बुलन्द इमारत पर रीझना स्वाभाविक है, लेकिन नींव की वे ईंटें…

जैव विविधता दिवस : जैव विविधता पर संकट ?

22 मई जैव विविधता दिवस पर विशेष वैश्विक स्तर पर जैव विविधता का संरक्षण एक चुनौती के रूप में सामने है। दुनियाभर में प्राकृतिक आवासों की क्षति, वन विनाश, खनिज कार्य, कृषि विकास, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक महत्व की फसलों…

क्या लोकतंत्र के असली स्वरूप तलाशने की संभावनाएँ खत्म हो चुकी हैं?

विकास की अंधी दौड़ में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, बलात्कार, हिंसा हमारे ऊपर हावी हो रही है। लोक, जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ा घटक है, गायब हो चुका है। सियासत और भ्रष्टाचार का यह गठजोड़…

शराबबंदी को टालती सरकारें

किसी भी हाइवे से शराब की दुकानें कम-से-कम 500 मीटर की दूरी पर हों-सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को लेकर शराब ठेकेदारों, शराब उत्पादकों और स्वयं लोक कल्याणकारी सरकारों में बवाल मचा है। स्थानीय निकायों से लेकर राज्य सरकारें तक…

डॉ. जे. सी. कुमारप्पा: ग्रामीण भारत की आवाज

डॉ.कुमारप्पा अहिंसक अर्थव्यवस्था के जबरदस्त पैरोकार थे। गांधीजी के ग्रामोद्योग व ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विचारों को उन्होंने सबसे अच्छे ढंग से संप्रेषित किया। आजादी बाद भी उन्होंने सरकार को इस दिशा में कार्य करने की सलाह दी थी। गांधी जी…