Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

सप्रेस फीचर्स

लोकतंत्र में नागरिकत्व की प्राणप्रतिष्ठा

अनिल त्रिवेदी बहत्तर साल के लोकतंत्र में भारत के नागरिकों में लोकतांत्रिक नागरिक संस्कार और नागरिक दायित्वों की समझ और प्रतिबध्दता का स्वरूप कैसा हैं? इस सवाल का उत्तर ही तय करेगा भारत के नागरिक अपने जीवनकाल में नागरिक दायित्व…

आज भी अधूरे हैं, मार्टिन लूथर किंग के सपने

लल्जाशंकर हरदेनिया दुनिया के सर्वाधिक सम्‍पन्‍न और लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देश अमरीका में वहां के अश्‍वेत नागरिकों के साथ जैसा व्‍यवहार हो रहा है, उसकी एक बानगी अभी डेढ हफ्ते पहले अमरीकी शहर मिनियोपोलिस में देखने को मिली। वहां…

अद्भुत फिल्मकार सत्यजीत रे का सिनेमाई संसार

दिनेश चौधरी दीगर चीजों के अलावा कोलकाता मुझे इसलिए भी अपनी ओर खींचता रहा कि यहाँ सत्यजीत रे रहा करते थे। कोलकाता अपने किस्म का अद्भुत शहर है और सत्यजीत रे अपने किस्म के अद्भुत फिल्मकार थे। किस्से- कहानियों की…

नीलम वर्मा : विरासत को सहेजने की मुहिम

संतोष कुमार द्विवेदी भारत में कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार हाथकरघा व हस्तशिल्प उद्योग उपलब्ध कराता है। आवश्यकता इसके संरक्षण के साथ ही साथ इसे मशीनी आतंक से मुक्त कराने की भी है। नीलम वर्मा अपने सीमित संसाधनों के सहारे…

पर्यावरण, धर्म तथा विकास के अन्‍तर्संबंध

डॉ. भारतेन्दु प्रकाश भारत में पर्यावरण व धर्म को अत्यन्त व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया है। इन दोनों की व्यवस्थित समझ से ही विकास संभव है। परंतु आधुनिक योजनाकारों ने इन तीनों की अलग-अलग व्याख्या कर पूरी मानवता को ही…

गांधी तो अभी भी प्लेटफ़ॉर्म पर ही हैं, उनका केवल देश बदला है !

श्रवण गर्ग अमेरिकी राष्ट्रपति के निवास स्थान ‘व्हाइट हाउस’ के सामने की एक सड़क का नाम बदलकर ‘’Black Lives Matter”(अश्वेतों का जीवन मायने रखता है) कर दिया गया है।पाँच जून को दिन के उजाले में बड़े-बड़े शब्दों में समूची चौड़ी…

कैसे बसेंगे, लौटते प्रवासियों के गांव

‘कोविड-19’ के कारण लगे ‘लॉक डाउन’ का सर्वाधिक व्‍यापक और गंभीर असर उन मजदूरों पर पडा है जो गांवों की अपनी दुनिया छोडकर रोजी-रोटी की खातिर शहरों में बसे थे और अब वापस गांवों की ओर भागे जा रहे हैं।…

कुर्सियों पर बैठते हो ! आग तो तुम्हारी कुर्सियों के नीचे सुलग रही है

श्रवण गर्ग आज ‘सम्पूर्ण क्रांति दिवस ‘है और मैं 5 जून 1974 के उस ऐतिहासिक दृश्य का स्मरण कर रहा हूँ जो पटना के प्रसिद्ध गांधी मैदान में उपस्थित हुआ था और मैं जयप्रकाशजी के साथ मंच के निकट से…

‘कोविड-19’ में एकांगी अध्यात्म

कोविड-19 के कारण लगे ‘लॉक डाउन’ ने हमारे ‘वस्‍तुओं’ के भौतिक संसार की अपर्याप्‍तता के साथ-साथ आंतरिक, आध्‍यात्मिक संसार के सतहीपन की पोल भी खोल दी है। ऐसे में कई आध्‍यात्मिक कहे जाने वाले लोग अवसाद, डर और दुख को…

कम्पनियों का मुनाफा रोकने से लौट सकती है, आर्थिक खुशहाली?

कोरोना के बाद हमें अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्‍यवस्‍थाएं पटरी पर लाने के लिए क्‍या–क्‍या करना होगा? मसलन-क्‍या हम मजदूरों के काम के घंटों समेत कई तरह की कानूनी सुविधाओं को निरस्‍त करने की तर्ज पर कंपनियों के मुनाफे…