महात्मा गांधी के सामने कोरोना जैसी महामारी की चुनौती खड़ी होती तो उन्होंने क्या किया होता?
आज हम कोरोना महामारी, अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सकंट को एक साथ झेल रहे हैं। इस संकट में हमें एक महानायक की जरूरत है। हमारे युग के सबसे बड़े नायक महात्मा गांधी हैं। अगर आज गांधी जी होते तो इस संकट…
गांव, गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह
पांच जून को गांधी विचार को मानने वाले देशभर के अनेक लोगों ने दो अक्टूबर, गांधी जयन्ती और ‘विश्व अहिंसा दिवस’ तक चलने वाले एक-एक दिन के उपवास की शुरुआत की थी। यह उपवास श्रमिकों, किसानों, ग्रामीण-अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को…
स्वयं की मुक्ति का उदघोष
हम राजनीतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गए हैं परंतु अभी भी मानसिक तौर पर उपनिवेशवाद की स्थिति से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इस बीच कारपोरेटीकरण एवं वैश्वीकरण ने नए तरह के उपनिवेशवाद को हमारे ऊपर लाद दिया है।…
फ्रंटलाइन वॉरियर बन महात्मा गांधी ने महामारी को हराया था
महात्मा गांधी ने जब महामारी से लड़कर लोगों को बचाने का फैसला किया था तब वह अकेले ही थे लेकिन लोगों का उन पर विश्वास था। जिस व्यक्ति को कहा वही गांधी के साथ जुड़ गया। यहाँ तक कि वे…
गांधी तो अभी भी प्लेटफ़ॉर्म पर ही हैं, उनका केवल देश बदला है !
श्रवण गर्ग अमेरिकी राष्ट्रपति के निवास स्थान ‘व्हाइट हाउस’ के सामने की एक सड़क का नाम बदलकर ‘’Black Lives Matter”(अश्वेतों का जीवन मायने रखता है) कर दिया गया है।पाँच जून को दिन के उजाले में बड़े-बड़े शब्दों में समूची चौड़ी…
राहत की राजनीति
कोरोना के कहर ने राहत की राजनीति को भी उजागर कर दिया है। प्राकृतिक, मानव-निर्मित आपदाओं में पीडित-प्रभावितों की मदद के लिए बहत्तर सालों से सक्रिय ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष’ को खिसकाकर अब नया ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ लाया जा रहा है। कहा जा…
सभ्यता का शैतान मुस्कुराने लगा है
आज, जब कोरोना वायरस की चपेट में आकर समूची दुनिया अपने इतिहास के पहले व्यापक वैश्विक बंद को भुगत रही है, क्या मोहनदास करमचंद गांधी याद नहीं किए जाना चाहिए? करीब सत्तर साल पहले एक सिरफिरे की गोली से संसार त्यागने वाले गांधी…
‘कोविड’ की त्रासदी और विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था
पिछले साल दिसम्बर में चीन से निकला वायरस ‘कोविड-19’ दुनियाभर को हलाकान किए है। अब तक उससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और हजारों ने अपनी जानें दी हैं। क्या इस तबाही का कोई जोड हमारी अर्थव्यवस्था से भी है?…
मतभेद निपटाने की गांधी की कला
एक तरह से देखें तो गांधी का समूचा जीवन मतभेदों से निपटते ही बीता, भले ही वे मतभेद संगी-साथियों, परिवार और धुर विरोधी विचारों के हों या फिर अपने हित साधने में लगी देशी-विदेशी सत्ताओं के। इन मतभेदों से निपटने…
संकट में साबरमती आश्रम
क्या गांधी को कोई ‘वल्र्ड क्लास’ बना सकता है? सब जानते हैं कि गांधी ने बार-बार अपने जीवन को ही अपना संदेश निरूपित किया है, यानि वे जहां, जैसे रहे-बसे, वह उनके संदेश के दर्जे का हो गया। आजकल अहमदाबाद…









