‘कोविड’ की त्रासदी और विकेन्द्रित अर्थव्‍यवस्‍था

अमित कोहली

पिछले साल दिसम्‍बर में चीन से निकला वायरस ‘कोविड-19’ दुनियाभर को हलाकान किए है। अब तक उससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और हजारों ने अपनी जानें दी हैं। क्‍या इस तबाही का कोई जोड हमारी अर्थव्‍यवस्‍था से भी है? क्‍या हमारा स्‍थानीय, देशी अर्थतंत्र उस सर्वग्राही अर्थव्‍यवस्‍था को चुनौती दे सकता है जिसके चलते ‘कोविड-19’ सरीखी त्रासदियां पैदा होती हैं?

अर्थशास्त्री अनुमान लगा रहे हैं कि ‘कोविड-19’ की वजह से वर्ष 2020-21 में भारत में आर्थिक वृद्धि (‘सकल घरेलू उत्‍पाद’/जीडीपी) की अनुमानित दर 5.2 प्रतिशत से कम होकर 3.5 प्रतिशत तक हो सकती है। साल 2019-20 की दूसरी तिमाही में यह 4.5 प्रतिशत थी। भारत के शेयर बाज़ारों में अब तक नौ लाख करोड रुपए के नुकसान हो चुकने का अनुमान है। ‘बीएसई’ और ‘निफ्टी’ इस वर्ष जनवरी से मार्च के बीच 35 प्रतिशत नीचे गिर चुके हैं। आगे और कितना नुकसान होगा इसका कोई ठोस अनुमान नहीं है। शहरों में हम देख ही रहे हैं कि महँगाई, जमाखोरी और कालाबाज़ारी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। खाद्य पदार्थ, दवाएँ और मास्क जैसी ज़रूरी चीज़ों पर इसकी मार ज़्यादा पड़ रही है। मुनाफा कमाने का अमानवीय लोभ तो इसके पीछे है ही, लेकिन यह बाहरी कारण है। इसका असल कारण मुद्रा, यानि कृत्रिम सम्पत्ति आधारित अर्थव्यवस्था है।

यद्यपि इन दिनों ‘कोविड-19’ का कहर बरपा है, लेकिन आम दिनों में भी शहरी जीवन में भागदौड़, तनाव और घबराहट कम नहीं हैं। लगभग सभी ने इसे “स्वाभाविक” मानकर स्वीकार कर लिया है। इसके ठीक विपरीत परिस्थिति हमें दूर-दराज के गाँवों, खास तौर पर अनुसूचित जनजातियों के गांवों में दिखाई पडती है। शहरी बुद्धि इन्हें अज्ञानी, पिछड़ा हुआ और शायद असभ्य भी कह सकती है, लेकिन हकीकत ये है कि तमाम परेशानियों के बावजूद ‘कोविड-19’ का कहर इन गाँवों में अब तक कोई खास आर्थिक प्रभाव नहीं डाल पाया है।

हम दण्डकारण्य को देखते हैं। यह भारत के दक्षिण-मध्य में बसा घने जंगलों से घिरा इलाका है। दक्षिणी छत्तीसगढ़, पूर्वी महाराष्ट्र और उत्‍तर-पूर्वी तेलंगाना के कुछ ज़िले इसमें शामिल हैं। गोण्ड, माडिया, हलबी, उरांव, गोण्ड-गोवारी जनजातियाँ यहाँ बहुतायत से निवास करती हैं। परम्परागत रूप से जीविका का मुख्य स्रोत जंगल रहा है। धान की खेती होती है, कहीं-कही थोड़ी मक्का और दालें भी होती हैं। लकड़ी के बने घर आमतौर पर कुछ फासलों पर स्थित होते हैं और उनके आस-पास सब्ज़ियाँ उगाई जाती हैं। गाय, बैल, भैंस, बकरी, सुअर और मुर्गियाँ पाली जाती हैं, जो खेती, दूध और माँस के काम आती हैं।

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इन आदिवासियों का बाज़ार से रिश्ता सीमित है। सामान्यत: 10-20 गाँवों के बीच साप्ताहिक हाट लगता है, जहाँ से वे जंगल से बीनकर लाए गए कुछ फल, मेवे, भाजियां वगैरह बेचते हैं और अपनी ज़रूरत का सामान खरीदते हैं। परिवहन के लिए बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, साइकिल और मोटर-साइकिल हैं। कई ऐसे भी गाँव हैं जहाँ रास्ते नहीं हैं और पैदल चलना लाज़िमी है। कहीं-कहीं सरकारी स्कूलों में मास्टरजी पढ़ाने आ जाते हैं तो बच्चे बैठकर पढ़ लेते हैं, वरना वयस्कों के साथ वयस्कों का सा जीवन जीते हैं। महिलाएँ ज़्यादा मेहनती हैं, जो घर और बाहर दोनों मोर्चों पर काम संभालती हैं। जन-जीवन आत्म-सन्तुष्ट किस्म का है। ज़्यादा लोभ-लालच नहीं, ज्यादा महत्वाकांक्षा नहीं। बाहर से आने वाले व्यापारी, ठेकेदार और कभी-कभी सरकारी मुलाज़िम इनका शोषण करते हैं। स्थानीय आदिवासियों द्वारा इसका कभी विरोध किया जाता है, तो कभी सहन करके चुप्पी ओढ़ ली जाती है।

‘लॉकडाउन’ से मुक्त होकर कभी आप इन गाँवों की ओर नज़र करेंगे तो पाएँगे कि यहाँ ‘कोविड-19’ को लेकर कोई दहशत नहीं है। ना तो यहां महंगाई की चिन्ता है और ना ही संग्रह करने के लिए भागदौड़। इसकी वजह है – ना तो यहाँ डरा देने वाली सूचनाओं का ज़्यादा प्रसार हुआ है और ना ही दण्डकारण्य के इन आदिवासियों के पास इतनी नकदी है कि वे महीने भर का राशन खरीदकर घर में जमा कर सकें। शेयर बाज़ार के ढह जाने की इन्हें कोई परवाह नहीं, ‘जीडीपी’  के आँकड़ों से ये उदासीन हैं। इस “कमी” के वाबजूद यहाँ “अभाव” महसूस क्यों नहीं होता?  

वजह है, यहाँ विकसित बाज़ार नहीं है। व्यक्ति हैं, श्रमिक हैं, किसान हैं, पशुपालक हैं, उत्पादक हैं, पर उपभोक्ता नहीं हैं। अतिरिक्त उत्पादन का लेन-देन है, बँटवारा है, पर मुद्रा (रुपया-पैसा) का कारोबार नगण्य है। यहाँ ‘कांचन मुक्ति’ की बात करते हुए विनोबा भावे याद आते हैं, जिन्होंने रुपए को “लफंगा” करार दिया था। यहाँ गाँधीजी के स्वराज्य का सपना याद आता है, जिसमें स्वदेशी और स्वावलम्बन आधारित विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की बात थी।

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शहर की अर्थव्यवस्था के बरक्स दण्डकारण्य की यह अर्थव्यवस्था एक नज़रिए से पिछड़ी हुई प्रतीत हो सकती है, पर असल में यह अर्थव्यवस्था भागदौड़ और तनावमुक्त जीवन का मार्ग सुलभ कराती है। गाँधीजी ने शहरी भोगवादी जीवन की “पागल दौड़” को व्याख्यायित करते हुए कहा था कि बगैर सोचे-समझे हम लालच, भोग, संग्रह और स्पर्धा की अविवेकी दौड़ में बेतहाशा भागे जा रहे हैं।

शहरी अर्थव्यवस्था में व्यक्ति अपना समय और श्रम बेचकर पैसे कमाता है, फिर उसे खर्च करता है। समय और श्रम तो वास्तविक सम्पत्ति हैं। वैसे ही जैसे खेत, जंगल, अनाज, पानी और खनिज हैं, लेकिन पैसा कृत्रिम सम्पत्ति है। वास्तविक सम्पत्ति का मोल स्थिर रहता है, पैसों का मूल्य स्थिर नहीं रहता। वास्तविक सम्पत्ति का हम सीधे तौर पर या उसमें थोड़ा श्रम ड़ालकर उपयोग करते हैं, जबकि कृत्रिम सम्पत्ति (यानी रुपया-पैसा, डिजिटल मुद्रा आदि) बाज़ार में लेन-देन का एक माध्यम मात्र है। अक्सर पैसों का मूल्य घटता रहता है, अर्थशास्त्री इसे “मुद्रास्‍फीति” कहते हैं। बाज़ारू अर्थव्यवस्था, जो अब वित्त आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था का महाभयंकर दानवी रूप ले चुकी है, में पैसों को कृत्रिम मूल्य दिया गया है, असल में तो वे कागज़ के टुकड़े हैं। पैसों को हम ना तो खा सकते हैं और ना पी सकते हैं और ना पहन-ओढ़ सकते हैं। पैसा तभी मूल्य धारण करता है जब आप बाज़ार में हों।

‘लॉकडाउन’ की आहट सुनते ही शहरी लोग पैसे लेकर बाज़ार की और दौड़ पड़े, जो जितना खरीद सकते थे, खरीद लिया। यह परवाह नहीं की कि दो किलो टमाटर या पाँच नग मास्क के बदले उन्होंने अपना कितने घण्टों का श्रम बेचा है। जब हम पैसों से खरीद-फरोख़्त करते हैं तो वस्तु का वास्तविक मूल्य देख नहीं पाते। जब आर्थिक परेशानी में होते हैं तो महंगाई को दोष देते हैं, जो कि बीमारी का लक्षण मात्र है। आर्थिक दुर्दशा का बुनियादी कारण कृत्रिम सम्पत्ति आधारित अर्थव्यवस्था है।

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बाज़ार केन्द्रित अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या है कि वह स्वावलम्बन को नकारती है और परावलम्बी बनाती है। यही वजह है कि दण्डकारण्य के आदिवासियों को फर्क नहीं पड़ता कि ‘लॉकडाउन’ के दौरान दुकानें बन्द हो जाएँगी या खुली रहेंगी। उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें तो श्रम करके सीधे प्रकृति से प्राप्त होती हैं। बाज़ार पर वे थोड़ा निर्भर तो हैं, पर यह निर्भरता गैर-ज़रूरी चीज़ों के लिए है। जैसे – जूते-चप्पल, मोटर-साइकिल, पेट्रोल, मोबाइल फोन वगैरह। जब तक प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों का अधिकार है, वे जीवनावश्यक वस्तुओं के सन्दर्भ में स्वावलम्बी बने रहेंगे।

आदिवासी जो जीवन जी रहे हैं, वह प्रकृति के करीब और प्रेरणादाई तो है, पर ऐसा नहीं कि वह आदर्श जीवन है। गाँधीजी के स्वराज और विनोबा के ‘कांचन मुक्त’ समाज को साकार करने के लिए स्थानीय संसाधन आधारित विकेन्द्रित उद्योगों का ताना-बाना खड़ा करना होगा। खेती और पशुपालन का व्यवस्थित विकास करना होगा। शिक्षा का विकास और शहरों की ओर पलायन रोकने के लिए रचनात्मक कार्य करने होंगे। जंगल का संरक्षण करते हुए उससे उपयोगी उत्पादों की आपूर्ति करनी होगी। अन्धविश्वास का खात्मा और अपनी परम्परा का सम्मान जागृत करते हुए राजनीतिक चेतना का विकास करना होगा।

‘कोविड-19’ ने कृत्रिम सम्पत्ति आधारित अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट करके हमें झकझोर दिया है। अब हमें तय करना है कि इस बहाने हम सोचें कि कृत्रिम सम्पत्ति जुटाने की ये अन्धी दौड़ हमें कहाँ लेकर जा रही है? हम कमा क्या रहे हैं और खर्च क्या कर रहे हैं? जीवन का सुकून तो प्रकृति का हिस्सा बनकर जीने में है, प्रकृति को नष्ट करके उपभोग करने में नहीं। आदिवासियों की विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था भले ही आदर्श न हो, पर उसकी ओर इशारा करता एक दीपस्तम्भ तो ज़रूर है। (सप्रेस)

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