समसामयिक

चमोली त्रासदी की इंसानी वजहें

सीखने-सिखाने के मामले में हमारा ‘ट्रैक-रिकॉर्ड’ कोई उत्साहवर्धक नहीं रहा है। मसलन – उत्तराखंड में हाल में आई भीषण आपदा से क्या हम कुछ सीखेंगे? क्या पहले भी कभी कुछ सीखा गया है, ताकि भविष्य में ऐसी आपदाएं नहीं हों…

पाखंड की परम्परा

क्या वे अपने जैसे नर्मदा तट के उन लाखों रहवासियों के बारे में कभी सोच पाते हैं जिन्हें बड़े बांधों के नाम पर अपने-अपने घर-बार से जबरन खदेड़ दिया गया है और जिनके पुनर्वास के बारे में विचार तक करना…

शिक्षा का केन्द्रीय बजट यानि ‘गरीबी में गीला आटा’

हाल के केन्द्रीय बजट में राज्यों के खाते में आवंटित शिक्षा-बजट की राशि बहुत कम करके केन्द्र सरकार आखिर क्या करना चाहती है? कोरोना महामारी के बाद करीब सालभर में पहली बार खुल रहे गांव-खेडे के स्कूलों को अपने रख-रखाब…

कितनी कारगर होंगी, इक्कीस साल में लड़कियों की शादी

लड़कियों के विवाह की उम्र 18 से 21 वर्ष करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव ने समाज में इन दिनों भारी हलचल मचा दी है। एक तरफ सरकार उम्र बढाने से लड़कियों को मिलने वाली सामाजिक बराबरी, प्रजनन स्वास्थ्‍य की…

अब भी प्रकृति से सीखने का अवसर है – राजेंद्र सिंह

उत्‍तराखंड में ग्‍लेश्यिर के फटने से हुए विनाश पर पर्यावरण विद राजेंद्र सिंह की प्रतिक्रिया हाल ही में चमोली जिले में एवलांच के बाद ऋषिगंगा और फिर धौलीगंगा पर बने हाइड्रो प्रोजेक्ट का बांध टूटने पर प्रसिध्‍द पर्यावरण विद एवं…

किसानों के लिए क्या मायने रखता है, ताजा बजट

पिछले करीब सवा दो महीनों से दिल्ली को घेरे बैठे किसानों के आसन्न संकट के दौरान आए केन्द्र सरकार के बजट से किसान-हितैषी होने की अपेक्षा थी। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में यत्र-तत्र किसानों का जिक्र भी किया, लेकिन…

कारपोरेटीकरण का बजट

दो दिन पहले आए केन्द्र के बजट पर प्रधानमंत्री ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि पिछले सालभर में कई ‘मिनी बजट’ आते रहे हैं और इस बार का बजट इसी श्रंखला का एक और पडाव भर होगा। एक फरवरी…

प्रभुसत्ता और बाहरी दखल : एक फलसफाई जुगाली

यह जरूर है कि अंदरूनी मामलों में दखल न होने के सिद्धांत और मानवाधिकारों की वकालत में कई बार टकराव देखा जाता है। एक तरफ अमेरिका मानवाधिकारों के नाम पर दूसरे देशों में अपने भौतिक दखल को न्यायोचित ठहराता रहा…

बजट के बतंगड

हाल के इस बजट को ही देखें तो अगले वित्त-वर्ष के लिए कृषि क्षेत्र को एक लाख 31,530 करोड रुपयों का आवंटन किया गया है, जो पिछले साल के बजट आवंटन से दस हजार करोड रुपए कम है, लेकिन इस…

लोकतंत्र की सड़क बहुत लम्बी है ; सरकार की कीलें कम पड़ जाएँगी !

किसान ‘कांट्रेक्ट फ़ार्मिंग’ से लड़ रहे हैं और पत्रकार ‘कांट्रेक्ट जर्नलिज़्म’ से। व्यवस्था ने हाथियों पर तो क़ाबू पा लिया है पर वह चींटियों से डर रही है। ये पत्रकार अपना काम उस सोशल मीडिया की मदद से कर रहे…