“भूख के विरुद्ध भात के लिए . . . .!”

आशीष कोठारी

भूख हमारे समय की सर्वाधिक व्यापक और गहराई से महसूस की जाने वाली सचाई है, लेकिन उससे निपट पाने की कोई कारगर तजबीज अब तक हाथ नहीं लगी है। एक तरफ, तरह-तरह के खाद्य-सुरक्षा कानूनों और सरकारी, गैर-सरकारी प्रयासों के बावजूद भूख जहां-की-तहां है और दूसरी तरफ, ऐसे कई स्थानीय अनुभव भी हैं जहां आम लोगों ने भूख से निपटने के कारगर तरीके ईजाद किए हैं। तो क्या इन तरीकों और इनमें निहित विचारों से आखिर भूख से पार पाया जा सकेगा?

“व्यर्थ के लोग खाने-पीने के लिए जीते हैं; कायदे के लोग सिर्फ जीने के लिए ही खाते-पीते हैं।” यह बात सुकरात ने कही थी। यह ज्ञान है या कोई मज़ाक? दुनिया का हाल तो ऐसा है कि करीब दो अरब लोगों के पास पर्याप्त भोजन ही नहीं है और एक अरब या उससे भी ज्यादा लोग जरुरत से ज्यादा खाकर बीमार पड़ जाते हैं या ‘जंक फ़ूड’ खाकर मर जाते हैं।  सुकरात की बातें बहुत सार्थक हैं, पर वास्तविकता ऐसी काली-सफेद नहीं है। अपने पर्यावरणीय, आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों के साथ भोजन हमारे समय के सबसे गंभीर मुद्दों में से एक है। कोविड-काल के वैश्विक संकट में तो यह पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट हो गया है।

‘ऑक्सफैम’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक यदि तुरंत कोई उपाय नहीं किये गए तो भुखमरी, कोरोना वायरस की तुलना में ज्यादा लोगों की जानें ले लेगी। ये मौतें कोविड के कारण खाद्य आपूर्ति में आने वाली बाधा की वजह से होंगी। रिपोर्ट बताती है कि “वैश्विक महामारी करोड़ों लोगों के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित होगी। वैसे भी युद्ध, जलवायु-परिवर्तन, असमानता और ऐसी विखंडित खाद्य प्रणाली मौजूद हैं जिनकी वजह से करोड़ों किसान और मजदूर पहले ही गरीबी के चंगुल में फंसे हैं।”

भूख इसलिए नहीं है, क्योंकि अन्न का अभाव है, बल्कि इसलिए है, क्योंकि न्याय नहीं है। ‘ऑक्सफैम’ की भविष्यवाणी को दुनिया गलत साबित कर पाएगी या नहीं, यह इसी पर निर्भर करता है कि हम इस समझ को कितनी गंभीरता से लेते हैं। भोजन एक बहुआयामी मुद्दा है। अव्वल तो हर प्रजाति के अस्तित्व के साथ यह जुड़ा हुआ है, पर यह इससे भी कहीं ज्यादा अहम है। सांस्कृतिक जीवन के साथ यह बुनियादी रूप से जुड़ा है, क्योंकि इंसान इसे जुटाने, इसकी प्रोसेसिंग और इसे तैयार करने, पकाने के लिए न जाने कितने तरीके अपनाता है।

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भारत के बारे में कहा जाता है कि कुछ किलोमीटर पर ही यहाँ भोजन बनाने का ढंग बदल जाता है। अलग-अलग पाक-विधियों के साथ भाषा, रस्मोरिवाज, आचरण और नियमों का संबंध है। क्या ‘खाने योग्य’ है इसका फैसला सांस्कृतिक और सामाजिक मतों और संबंधों के आधार पर होता है। इसके अलावा यह एक आर्थिक और गहरा राजनीतिक मुद्दा है जो इस बात पर निर्भर करता है कि फैसले कौन कर रहा है और कैसे। यह ज्ञान, तकनीकी और पर्यावरण का सवाल भी है जिसके लिए एक स्वस्थ पर्यावरण, भूमि और जैव-विविधता जरूरी है। इन सभी में हमारा सत्ता से आमना-सामना होता है, जैसे – पितृसत्ता, पूंजीवाद, नस्लवाद, राज्यवाद, जातिवाद और मानवकेन्द्रित मतों का वाद। हमारे भोजन के इन सभी कारकों के बावजूद कई लोग, कई तरीकों से अपना भोजन प्राप्त करने में लगे हैं।  

नगालैंड में स्त्री-संगठन ‘नार्थ ईस्ट नेटवर्क’ ने खेती के परम्परागत तरीकों को पुनर्जीवित करने और उन्हें बचाए रखने के प्रयास किये हैं। उसने महामारी के दौरान घरेलू आहार सुरक्षा को प्राथमिकता दी है और समुदायों को स्थानीय बाजारों तक पहुँचने में सहायता की है। तेलंगाना में 5000 दलित और आदिवासी महिलाओं का संगठन है, ‘डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी।’ उसने पिछले तीन दशकों में आहार आत्म-निर्भरता हासिल की है। कोविड-19 महामारी के दौरान इन परिवारों में से किसी को भोजन का अभाव नहीं हुआ। जिले के राहत कार्यों में उन्होंने हजारों किलो अनाज का योगदान दिया, वह अलग से।  

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थानीय करेन समुदाय अपनी आहार संस्कृति को पुनर्जीवित करने की कोशिश में लगा है। ये लोग पीढ़ियों पहले बर्मा (म्यानमार) से आये थे। उन्होंने परंपरागत भोजन को युवाओं के लिए प्रासंगिक बनाते हुए फिर से उसे शुरू करने की पहल की। ‘सिविल सोसाइटी संगठन-दक्षिण’ इस काम में उनकी मदद कर रहा है। तेलंगाना में ‘फ़ूड सॉवरेंनिटी अलायन्स – इंडिया’ किसानों और खेतिहरों की मदद कर रहा है जिससे वे जाति और लिंग भेद का विरोध करें, अपनी ज़मीन फिर से प्राप्त करें और अपनी आहार संस्कृति को फिर से स्थापित करें। इन लोगों ने दूध और फसल के कारोबार को स्थानीय बनाया है और युवाओं को प्रोत्साहित किया है कि वे सामूहिक खेती को जीविका के साधन के रूप में अपनाएँ।

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पश्चिमी भारत में ‘भीमाशंकर अभयारण्य’ के आदिवासी गाँवों की स्त्रियों के स्थानीय समूह ने पिछले कुछ वर्षों में ‘वन्य भोजन उत्सव’ मनाये हैं जिसमें उन्हें पर्यावरण समूह ‘कल्पवृक्ष’ ने मदद की है। ‘लिविंग फार्म्स’ जैसे संगठनों ने भोजन के पोषण और सांस्कृतिक महत्त्व से जुड़े कार्य किये हैं। भारत में इस तरह के कार्यों को दुनिया भर के हज़ारों लोग सहयोग करते हैं। बांग्लादेश में ‘नया कृषि आन्दोलन’ के साथ हजारों किसान जुड़े हुए हैं। ये लोग आहार स्वायत्तता और सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं और कोविड लॉकडाउन के दौरान इसने काफी अच्छा काम किया है।  

क्यूबा में दीर्घकालिक एवं स्थाई शहरी कृषि ने हवाना की आहार संबंधी आवश्यकताओं को काफी हद तक पूरा किया है और ऐसे कई आन्दोलन शहरी लोगों को साझा ज़मीन पर अन्न पैदा करने के अवसर दे रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े जन-संगठनों में शामिल है, ‘ला विया काम्पेसिना।’ इसमें करीब 20 करोड़ किसान शामिल हैं। यह विशेष बल देता है छोटी ज़मीन के मालिकों पर, घरेलू आहार की दीर्घकालिक स्वतंत्रता पर। इसके लिए एक सामान्य शब्द है – ‘एग्रो-इकॉलॉजी’ या कृषि-पारिस्थितिकी।’ हालाँकि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए अलग-अलग शब्द और रूप प्रचलित हैं, मसलन पर्माकल्चर, प्राकृतिक कृषि, जैविक या आर्गेनिक खेती वगैरह। इसके अलावा एक वैश्विक ‘स्लो फ़ूड आन्दोलन’ भी चला है जो कि स्थानीय आहार संस्कृति और परम्परा पर बल देता है। आहार चयन के निहितार्थ के बारे में यह जागरूकता भी फैलाता है।  

ये तौर-तरीके परंपरागत, रासायनिक और बड़े किसानों के तरीकों से अलग तो हैं ही, इनके समाधान भी भिन्न हैं – हाई टेक खेती और कॉर्पोरेट के नियंत्रण वाली अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के धूर्त समाधानों से निहायत ही अलग। यह जरूरी है कि राज्य को उन लोगों के लिए भोजन जुटाने की ज़िम्मेदारी दी जाए जो खुद अपने लिए खाद्य जुटाने की क्षमता नहीं रखते। पूरी दुनिया में, जिसमें विकसित देशों के कमज़ोर लोग भी शामिल हैं, यह देखा गया है कि महामारी के वक्त कैसे करोड़ों छोटे और सीमान्त कृषक या तो उखड चुके हैं या अपनी ज़मीनें खो चुके हैं या अपनी ज़मीनें छोड़ने पर मजबूर हुए हैं।  

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भारत में भूमि के स्वामित्व वाले किसानों का प्रतिशत कम हुआ है और भूमिहीन कृषि श्रमिकों का प्रतिशत बढ़ा है। आर्थिक तंगी के चलते भारत में करीब तीन लाख लोगों ने आत्महत्या की है। असंगठित क्षेत्र के करीब नब्बे फीसदी लोग आर्थिक लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। उनकी खाद्य असुरक्षा बढती जा रही है। यह एक ऐसी पृष्ठभूमि में हो रहा है जहाँ पहले से ही पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह कमज़ोर और सबसे गरीब तबकों की फिक्र करे।

चूंकि यह कार्य पूरी तरह राज्य पर नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए भोजन के कानूनी हक के लिए जन-आन्दोलनों की दरकार है। इस अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है—‘यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स’ के ‘अनुच्छेद-25’ के आधार पर। भारत में लोगों ने करीब एक दशक तक भोजन के अधिकार की मांग की और अंततः 2013 में ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून’ बना जिसके तहत सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह जरुरतमंदों को पर्याप्त भोजन मुहैया करवाए। यह दुर्भाग्य ही है कि यह कानून और सार्वजनिक वितरण प्रणाली दोनों ही अकुशल, भ्रष्ट क्रियान्वयन की वजह से सफल नहीं हो पा रही। जो भी हो, यह समझना जरूरी है कि ‘खाद्य सुरक्षा कानून’ इस समस्या का एक आंशिक समाधान भर है।

आहार स्वातंत्र्य इससे परे जाकर भोजन के लोकतान्त्रिक नियंत्रण की मांग करता है। समाज को उस दिशा में बढ़ना चाहिए जहाँ लोगों को अपनी व्यवस्था खुद करने के अवसर हों, या फिर लोगों के पास इतनी आर्थिक हैसियत हो कि वे बाजार से भोजन खरीद सकें। ये सब जितना स्थानीय स्तर पर होगा, इस तरह की बुनियादी जरूरतों पर लोगों के नियंत्रण की संभावना उतनी ही अधिक होगी। (सप्रेस)

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