Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

समसामयिक

क्‍या उद्योग बढ़ा रहा है, सड़कों की असुरक्षा?

आज के दौर में परिवहन, यातायात सर्वाधिक जरूरी सेवाएं हो गई हैं, लेकिन उनकी बढौतरी के साथ-साथ खतरे भी बढते जा रहे हैं। आजकल तेजी से भागती आम सडकों पर चलना दुर्घटनाओं को न्‍यौता देना हो गया है। क्या इसके…

पर्यावरण संरक्षण में मार्च का महत्व

मार्च का यह महीना पर्यावण के लिहाज से इसलिए भी अहम है क्योंकि पर्यावरण से गहरे जुडे कई मुद्दों की याद दिलाने वाले ‘दिवस’ इसी महीने में पडते हैं। सवाल है कि पूरे जोश-खरोश के साथ मनाए जाने वाले इन…

देशी ज्ञान से रोका जा सकता है, पर्यावरण-विनाश

आज के समय का एक बडा संकट जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण-विनाश है जिससे निपटने की तजबीज खोजने में दुनियाभर के ज्ञानी अहर्निश लगे हैं। क्या इस संकट से हम अपनी ठेठ देशी पद्धतियों की मार्फत नहीं निपट सकते? आज की प्रचलित…

चुनावों की सार्थकता

अहिंसक, शांतिपूर्ण और अब तक राजनीतिक दलों से परहेज करने वाले किसान आंदोलन का विकल्प-हीनता की मजबूरी में पनपा यह राजनीति-प्रेम उसे कहां ले जाएगा? कहने को भले ही किसान आंदोलन ‘किसी पार्टी विशेष की वकालत’ न करते हुए भाजपा…

नागरिकों की अहिंसक लड़ाई और उनके उत्पीड़न के प्रति पूरी तरह से ख़ामोशी

हम अन्य मुल्कों में लोकतंत्र पर होने वाले प्रहारों, बढ़ते अधिनायकवाद और विपक्ष की आवाज़ को दबाने वाली घटनाओं पर इरादतन चुप रहना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि जब इसी तरह की घटनाएँ हमारे यहाँ हों तो हमें भी किसी…

विधायिका में भी जरूरी है, महिला-आरक्षण

8 मार्च महिला दिवस पर विशेष करीब ढाई दशक पहले संसद की चौखट तक पहुंच चुका ‘महिला आरक्षण विधेयक’ अब भी अधर में लटका है। देशभर की पंचायतों में एक तिहाई आरक्षण मुकर्रर करने वाली संसद और विधानसभाएं तरह-तरह के…

डिजिटल दुनिया पर निगरानी के नियम

पिछले महीने सूचना प्रौद्योगिकी के नियमन की खातिर लाए गए कानून ने देशभर में व्यापक बहस खडी कर दी है। आखिर क्या हैं, ये कानून? और कैसे इनसे विशाल डिजिटल संसार पर नियमन हो पाएगा? मौजूदा केंद्र सरकार अपने पिछले…

मेघालय के पर्यावरण को कोयला खनन से खतरा

उत्तर-पूर्व का राज्य मेघालय एक जमाने में अपनी खूबसूरती और भारी वर्षा के कारण विख्यात था, लेकिन अब, दुनिया के ऐसे ही दूसरे इलाकों की तरह, खनन, जल-विद्युत परियोजनाओं और कथित विकास की चपेट में आकर बर्बाद होता जा रहा…

एक थी ‘घोषित इमरजेंसी’ और एक है ‘अघोषित आपातकाल’!

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष…

कैसे मापें, गरीब और गरीबी की गहराई

हाल के वर्षों में गरीबी को परिभाषित करने का सवाल फिर से सिर उठा रहा है। गरीब कौन हैं, क्यों हैं और उनकी इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? अनेक अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर अपनी-अपनी अवधारणाएं प्रस्तुत की हैं,…