समसामयिक

“भूख के विरुद्ध भात के लिए . . . .!”

भूख हमारे समय की सर्वाधिक व्यापक और गहराई से महसूस की जाने वाली सचाई है, लेकिन उससे निपट पाने की कोई कारगर तजबीज अब तक हाथ नहीं लगी है। एक तरफ, तरह-तरह के खाद्य-सुरक्षा कानूनों और सरकारी, गैर-सरकारी प्रयासों के…

कुओं से बुझेगी बुंदेलखंड की प्यास

सालाना कर्मकांड की तरह अब फिर पानी पर बिसूरने का मौसम आ गया है। हर साल महाराष्ट्र के विदर्भ की तरह मध्‍यप्रदेश-उत्तरप्रदेश का बुंदेलखंड इस दुख में अगुआ रहता है, लेकिन अधिकांश सरकारी, गैर-सरकारी कोशिशें, एक जमाने में उम्दा खेती…

भोजन में बढ़ता रासायनिक जहर

तेजी से फैलती कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों ने हमारी भोजन उत्पादन की पद्धति पर तीखे सवाल खडे कर दिए हैं। हम जिसे भोजन मानकर खा रहे हैं क्या वह सचमुच जहर-मुक्त, पौष्टिक और इंसानी शरीर के लिए सर्वथा उपयुक्त है?…

बुजुर्गों की बदहाली

इन दिनों हम एक देश की हैसियत से खुद के युवा होने का बडा जश्न मनाते रहते हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह भी सोचा है कि पचास साल बाद यही आबादी बूढी भी होगी और तब देश की इसी…

‘धृतराष्ट्र’ की मुद्रा में हैं मीडिया के ‘संजय’ इस समय?

पत्रकारिता समाप्त हो रही है और पत्रकार बढ़ते जा रहे हैं! खेत समाप्त हो रहे हैं और खेतिहर मज़दूर बढ़ते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह। खेती की ज़मीन बड़े घराने ख़रीद रहे हैं और अब वे ही‌ तय करने…

राजनीति से अलगाव की राजनीति

गहराई से देखें तो इसकी जिम्मेदारी प्रातिनिधिक लोकतंत्र की अहम खिलाड़ी राजनीतिक पार्टियों की दिखाई देती है। भांति-भांति के रंगों-झंडों वाली राजनीतिक जमातों ने वोटरों को कठपुतलियों में तब्दील कर दिया है। अब जैसा राजनीतिक पार्टियों के सरगना कहते हैं…

कृषि की राह में कारपोरेट रोडे

दुनियाभर में कृषि का मौजूदा तरीका अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है। उत्पादन में गैर-जरूरी वृद्धि पर आधारित यह तरीका पर्यावरण, पानी, जमीन, हवा जैसे कृषि के प्राकृतिक उपादानों को खतरे में डाल रहा है और कहीं-कहीं…

क्‍या उद्योग बढ़ा रहा है, सड़कों की असुरक्षा?

आज के दौर में परिवहन, यातायात सर्वाधिक जरूरी सेवाएं हो गई हैं, लेकिन उनकी बढौतरी के साथ-साथ खतरे भी बढते जा रहे हैं। आजकल तेजी से भागती आम सडकों पर चलना दुर्घटनाओं को न्‍यौता देना हो गया है। क्या इसके…

पर्यावरण संरक्षण में मार्च का महत्व

मार्च का यह महीना पर्यावण के लिहाज से इसलिए भी अहम है क्योंकि पर्यावरण से गहरे जुडे कई मुद्दों की याद दिलाने वाले ‘दिवस’ इसी महीने में पडते हैं। सवाल है कि पूरे जोश-खरोश के साथ मनाए जाने वाले इन…

देशी ज्ञान से रोका जा सकता है, पर्यावरण-विनाश

आज के समय का एक बडा संकट जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण-विनाश है जिससे निपटने की तजबीज खोजने में दुनियाभर के ज्ञानी अहर्निश लगे हैं। क्या इस संकट से हम अपनी ठेठ देशी पद्धतियों की मार्फत नहीं निपट सकते? आज की प्रचलित…