विचार : समानता के लिए ‘सम्पत्ति-दान’
दुनियाभर में कब्जा जमाए बैठी अश्लील गैर-बराबरी ने हर तरह के आर्थिक विचारों और उनके अमल पर चुनौती खडी कर दी है। चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी या फिर मध्यमार्गी, सभी भीषण गैर-बराबरी के सामने इस हद तक नतस्तक हैं…
संकट में भूमि : समाज की जमीन ही उखाड़ने का दौर
विकास के मौजूदा ढांचे में भूमि सर्वाधिक कीमती जिन्स मानी जा रही है, पूंजी और कारपोरेट हितों ने उस पर अधिक-से-अधिक कब्जा भी जमा लिया है, लेकिन क्या इस तरह से हम अपनी भोजन की बुनियादी जरूरतों को भी संकट…
गांधी के तरीके से कसी जा सकती है, राज्य और पूंजी पर नकेल
पूंजी और राज्य की आधुनिक अवधारणा एक अर्थ में हिंसक अवधारणा साबित हुई है। उसने एक तरफ, अमीरी-गरीबी के बीच गहरी, अश्लील खाई पैदा की है और दूसरी तरफ, राज्य को जरूरत से ज्यादा शक्ति-सम्पन्न बनाया है। आज यदि महात्मा…
अहिंसक समाज रचना के लिये जरूरी है, मालिकी विसर्जन
विनोबा के विचार, उन्हीं के शब्दों में 11 सितंबर विनोबा भावे की 125 वां जयन्ती वर्ष एक व्यक्ति, समाज, देश और दुनिया की हैसियत से हम आज जहां पहुंचे हैं, वह कोई ‘टिकने,’ यहां तक कि ‘गुजरने’ के लिहाज से भी…
कोरोना-काल में हारते ‘काल’ के देवता
भले ही कोरोना वायरस से उपजी ‘कोविड-19’ बीमारी दुनियाभर को हलाकान कर रही हो, लेकिन आंकडों को देखें तो इसके ठीक उलट, डर की कोई बात दिखाई नहीं देती। उलटे, ‘कोविड-19’ से होने वाली मौतों को सामान्यत: होने वाली मौतों…
कोरोना संकट पर सामान्य ज्ञान
कोरोना वायरस ने इन दिनों दुनियाभर में खलबली मचा दी है। अमीर-गरीब, ऊंचा-नीचा, काला-गोरा, गरज कि हर नस्ल और फितरत के इंसान को कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया है। इससे कैसे निपटा जाए? यह सभी को बार-बार बताया…
कोरोना संकट पर सामान्य ज्ञान
कोरोना वायरस ने इन दिनों दुनियाभर में खलबली मचा दी है। अमीर-गरीब, ऊंचा-नीचा, काला-गोरा, गरज कि हर नस्ल और फितरत के इंसान को कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया है। इससे कैसे निपटा जाए? यह सभी को बार-बार बताया…
कमी पानी की नहीं, उसे वापरने की तरकीब की है
22 मार्च – विश्व जल दिवस पर विशेष पानी की कमी ने अब दो बातों पर ऊंगली रखी है-एक, क्या पानी का टोटा सचमुच ऐसा है जिससे निपटने के लिए ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ छेड़ना पडे ? और दूसरे, क्या उस ‘अपराधी’…
युद्ध की बजाए अहिंसा से ही संभव है, शांति और न्याय
दुनियाभर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं तक में राजसत्ता की ताकत को आमतौर पर हिंसक क्षमताओं, युद्धों में जीतने की सतत सैनिक तैयारी और उनके लिए साल-दर-साल बढ़ते वार्षिक बजट से ही मापा जाता है। लेकिन क्या इस उन्मादी अभियान से हम…








