इसी तरह से दस्तक देता है आपातकाल और अधिनायकवाद!
विधायिका और कार्यपालिका यानी सरकार का जन-भावनाओं के प्रति उदासीन हो जाना या उनसे मुंह फेरे रहना हकीकत में सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और संवेदनशील नागरिकों के लिए सबसे बड़ी प्रजातांत्रिक चुनौती होना चाहिए। उन्हें दुःख मनाना चाहिए कि जो फैसले…
कोरोना-काल में भी जारी है, दवा कंपनियों के मुनाफे की हवस
कोविड-19 महामारी के दौर में कई तरह की पोल-पट्टियों के खुलासा होने में दवा कंपनियों के मुनाफे की हवस भी शामिल है। थोडी गहराई से देखें तो हमारा स्वास्थ्य चिकित्सकों की बजाए उन दवा कंपनियों के नुमाइंदों के हाथ में…
किसान आंदोलन : कैसा हो, ‘एमएसपी’ कानून?
दिल्ली की सीमाओं पर कई महीनों से धरना देकर बैठे किसानों की दो कानूनों और एक कानून में संशोधन को वापस लेने के अलावा एक महत्वपूर्ण मांग सभी 23 फसलों पर ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ लागू करने का कानून बनाने की…
जलवायु परिवर्तन के कारण बदल रहा है भारत के मानसून का मिजाज़
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से होने वाली चरम घटनाओं का कृषि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से भारत के लिए जहां अभी भी खेती की भूमि का एक बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर है। भारत एक…
‘म्यूटिड’ होकर मारता है, कोरोना
पिछले डेढ-दो साल से कोरोना वायरस का संकट हमें हलाकान किए है। एलोपैथी, होम्योपैथी से लेकर आयुर्वेद तक में इसके तरह-तरह के इलाज पता चले हैं। प्रस्तुत है, आयुर्वेद की दृष्टि से कोरोना वायरस को समझने की एक पद्धति पर…
‘…बर्लिन के उस लेखक ने तो कमाल का सिद्धांत ही बना दिया है …’
फलस्तीन-इसरायल विवाद फलस्तीन-इसरायल विवाद पर प्रारंभ से महात्मा गांधी की नजर थी और वे हर संभव मौके पर उस विवाद को एक रचनात्मक मोड़ देने की कोशिश करते रहे थे. अपने देश की आजादी की अनोखी लड़ाई का नेतृ्त्व करते…
पानी से परिवहन : फर्जी दावों की पतवार से धकेले जा रहे राष्ट्रीय जलमार्ग
सडक, रेल और वायु मार्गों के अलावा अब हमारी सरकार पारंपरिक जल-परिवहन के लिए उत्साहित हुई है। कहा जा रहा है कि पानी के छोटे-बडे जहाजों से माल ढुलाई सस्ती हो जाएगी। सवाल है कि क्या शुरुआती तैयारी के लिहाज…
लक्षद्वीप : ‘स्वर्ग’ पर संकट थोपने की योजनाएं
प्रकृति के अद्भुद सुंदर इलाकों को पर्यटन के नाम पर उजाडने का हमारा विकास-वादी चलन अब सुदूर लक्षद्वीप में पांव पसार रहा है। आदिवासी बहुल शांत और समझदार लोगों की कुछ हजार की बसाहट अब विकास-वादियों की आंख में खटकने…
“ उनसे मेरी गहरी मित्रता भी मुझे न्याय देखने से रोक नहीं सकती है….”
संदर्भ : फलस्तीन(हमास)-इस्रायल युद्ध हाल के फलस्तीन(हमास)-इस्रायल युद्ध के बाद अब इस वैश्विक समस्या के हल की गरज से तरह-तरह की आवाजें उठने लगी हैं। महात्मा गांधी होते तो वे इस मसले पर क्या कहते? प्रस्तुत है,गांधी के नजरिए से…
विनम्र और मधुर मुस्कान बिखेरने वाले गोविंदन कुट्टी मेनन जीवन पर्यंत एक अध्येता रहे
12 जून। गांधीवादी विचारक, पर्यावरण के सजग प्रहरी, पद्मश्री गोविंदन कुट्टी मेनन कर देह आज पंच तत्व में विलीन हो गई । शनिवार की दोपहर में रीजन पार्क मुक्तिधाम में अंतिम संस्कर किया गया। चिता को मुखाग्नि उनके बेटे गोपाल…









