Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

जल, जंगल, जमीन

व्‍यवसाय के लिए वन

आधुनिक व्‍यापार-व्‍यवसाय ने अब तेजी से प्राकृतिक संसाधनों को अपनी चपेट में लेना शुरु कर दिया है। जंगल, जिन्‍हें सुप्रीमकोर्ट द्वारा दी गई परिभाषा के मुताबिक केवल रिकॉर्ड में जंगल की तरह दर्ज होना ही काफी है, निजी कंपनियों को…

गंगत्व बचाने का काम लोकतंत्र में ‘लोक राजनीति’ से ही सम्भव

गंगा को अब लोक राजनीति से ही बचा सकते हैं। यह लोक राजनीति के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। इस हेतु सभी अपनी निजी पहचान भूलकर एकाकर संगठित होकर लोक राजनीति में जुटें। गंगत्व बचाने का काम लोकतन्त्र में लोक राजनीति…

जरा से आंधी-पानी में क्यों उखड़ जाते हैं पेड़

मामूली आंधी-पानी में किसी भी आकार-प्रकार के शहरों के बाढ-ग्रस्‍त होने के अलावा तडा-तड गिरते पेड आजकल बडी समस्‍या बन गए हैं। हर बरसात में गाडी, मकान और इंसानों पर गिरे पेडों का दृश्‍य आजकल आम है। क्‍यों होता है,…

हिमालय: “विकास” याने पागल दौड़

इन दिनों देश में विकास का प्रकृति, पर्यावरण के साथ जबरदस्त संघर्ष चल रहा है। मानो एक युद्ध ही अनवरत चल रहा हो। आज की इन परिस्थितियों में ’विकास’ हमारी दुनिया का सबसे अधिक भ्रमपूर्ण शब्द बन गया है। आँखों…

तूफानी तबाही से बचा सकते हैं, पेड़

हाल के वर्षों में समुद्री तूफानों ने हमारे तटीय राज्यों में भारी तबाही मचाई है। इन्हीं दिनों पश्चिमी तट के केरल, महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात राज्य तूफान ‘वायु’ से उलझ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की मार से उपजे इन विचित्र…

मध्यप्रदेश में जलाधिकार कानून: कितना सार्थक

मध्यप्रदेश की मौजूदा सरकार ने अपने घोषणा-पत्र के मुताबिक ‘मध्यप्रदेश जल का अधिकार (संरक्षण और निरंतर उपयोग) अधिनियम-2020’ क्रियान्वित करने का तय किया है, लेकिन क्या यह कानून राज्य के आम लोगों की पानी की जरूरतों को पूरा करने में…

जीवन के बचाव के लिए ‘धरती रक्षा दशक’

पर्यावरण के संकट, जल-जंगल-जमीन के बाद अब मानवीय जीवन को अपनी गिरफ्त में लेने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में ‘धरती रक्षा दशक’ जैसे आपातकालीन उपायों के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। जनवरी 2020 की पहली…

‘आरे जंगल’ की कटाई – पेड़ों का जलियांवाला बाग

मुम्बई में मेट्रो-शेड के लिए जिस हड़बड़ी, कानून और पर्यावरण की अनदेखी के साथ ‘हरित फेफडे़’ माने जाने वाले आरे कॉलोनी के जंगल काटे गए, उसने एक बार फिर मौजूदा विकास की बेहूदी, खाऊ-उडाऊ अवधारणा के साथ यह भी साबित…

कैसे जलते हैं, दुनिया के फेफड़े

दुनियाभर को प्राणवायु यानि ऑक्सीजन मुहैय्या करवाने वाले अमेजान के जंगलों में लगी आग इन दिनों सर्वत्र चर्चा और चिंता का विषय बनी हुई है। अमीर देशों के ‘ग्रुप-7’ और ‘ग्रुप-20’ जैसे वैश्विक मंचों तक को हलाकान करने वाली इस…

पर्यावरण पर किया जाता प्रहार भी हिंसा ही है

जल, जंगल, जमीन, हवा जैसे प्राकृतिक संसाधनों को भरपूर मुनाफे के लिए बेरहमी से लूटना, दुहना एक तरह की हिंसा ही है। यह हिंसा धीरे-धीरे समाज में जगह बनाती है और फिर इंसानों के बीच अपने क्रूरतम रूप में अवतरित…