कोराना का कहर बढ़ाते सर्दी और प्रदूषण
जैसा कि कहा गया था, कडकती सर्दी और तेजी से फैलता वायु-प्रदूषण कोरोना वायरस को खुलकर खेलने का मौका दे रहे हैं। अब कोरोना से पनपे कोविड-19 के संक्रमण के दूसरे दौर की चर्चाएं होने लगी हैं। जाहिर है, सर्वशक्तिमान…
कोरोना से प्रभावित कक्षाएं
कोरोना वायरस की मार्फत फैली कोविड-19 बीमारी ने तरह-तरह की समस्याएं पैदा की हैं। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है – स्कूली शिक्षा। शिक्षा की इस बदहाली का तीखा असर झुग्गी बस्तियों की गरीब आबादी को झेलना पड रहा है। कोविड ने…
कोविड पर कारगर पेड़-पौधे
पेड़-पौधे पर्यावरण को दुरुस्त रखने के अलावा हमारे इलाज के लिए दवाएं भी मुहैय्या करवाते हैं। इन दिनों दुनिया-जहान को हलाकान करने वाली कोविड-19 बीमारी भी इसमें शामिल है। अब ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ गए हैं जिनसे कोविड के…
कोरोना-काल में सेक्स वर्कर्स
कोरोना काल में देश के 14 करोड़ से ज्यादा परिवारों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है। इनमें समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों की आजीविका सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। इन्हीं में सेक्स वर्कर्स समुदाय भी शामिल है। प्रस्तुत…
कोरोना : करने योग्य, जरूरी बातें
तीस जनवरी को केरल में पहले मरीज की पहचान होने के बाद कोरोना वायरस से फैली कोविड-19 बीमारी को अब तक लंबा वक्त और अनुभव गुजर गए हैं। करीब साढे सात महीने के दुखद दौर के बाद भी कई लोग…
‘कोरोना’ से ज्यादा खतरनाक है, लालची इंसान?
कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 बीमारी ने और कुछ किया, ना किया हो, इंसानों के सामने उसकी बनाई दुनिया की पोलपट्टी जरूर उजागर कर दी है। महामारी के दर्जे की इस विपदा ने बता दिया है कि हमारी दुनिया के दैनिक कारनामे…
बीमारी और मौत के आँकड़ों से अब डर ख़त्म हो गया है ?
वर्तमान महामारी ने व्यक्ति, परिवार, समाज,राष्ट्र और एक विश्व नागरिक के रूप में सभी को किस कदर बदलकर रख दिया है, अंदर से निचोड़कर भी। हमें पता ही नहीं चल पाया कि पिछले पाँच महीनों के दौरान हम कितने बदल…
महात्मा गांधी के सामने कोरोना जैसी महामारी की चुनौती खड़ी होती तो उन्होंने क्या किया होता?
आज हम कोरोना महामारी, अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सकंट को एक साथ झेल रहे हैं। इस संकट में हमें एक महानायक की जरूरत है। हमारे युग के सबसे बड़े नायक महात्मा गांधी हैं। अगर आज गांधी जी होते तो इस संकट…
कोविड-19 : कुछ सबक, कुछ सवाल
कोविड-19 को ‘परास्त’ करने की आपाधापी में कई तरह की गफलतें हो रही हैं और ऐसे में सरकारें अपनी-अपनी ‘पीठ ठुकवाने’ में मशगूल हैं। कहा जा रहा है कि महामारी मानी जाने वाली इस बला से हम अव्वल और बेहतर…
आजीविका के साधनों को नष्ट करना सभ्य और लोककल्याणकारी तरीका नहीं
करोना काल में लोभ, लालच, लूट- खसोंठ, पद का दुरुपयोग और दुखी दर्दी,बिमार भूखे रोजगारविहीन लोगों के साथ व्यवस्था के नाम पर अराजकता जैसे दृश्य खड़े करना न तो राज की सभ्यता हो सकती है न सामाजिक राजनैतिक और व्यावसायिक…









