Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

समसामयिक

किसानों को क्यों नहीं समझा पा रही, सरकार?

कडकती ठंड और तेज बरसात में देश की राजधानी को घेरे बैठे किसानों को अब करीब डेढ महीना हो गया है, लेकिन मामला सुलझता नजर नहीं आता। किसान तीन नए कृषि कानूनों को खारिज करवाना चाहते हैं और सरकार सात-आठ…

लोकतंत्र में किसान

‘तटस्‍थ लोकतंत्री’ की नजर से देखा जाए तो एक तरफ वह सरकार दिखाई देती है जिसने दो कानून और एक संशोधन लाने के लिए किसी तरह की कोई लोकतांत्रिक औपचारिकता नहीं बरती। ना तो किसान संगठनों, उनके प्रतिनिधियों से कोई…

कोरोना की वैक्सीन ही नहीं,लोकतंत्र का टीका भी ज़रूरी है !

किसानों ने जिस लड़ाई की शुरुआत कर दी है वह इसलिए लम्बी चल सकती है कि उसने व्यवस्था के प्रति आम आदमी के उस डर को ख़त्म कर दिया है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिलों में घर कर…

‘मैं नेहरू का साया था’

पुस्‍तक समीक्षा भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर तरह-तरह के मनगढंत किस्‍से-कहानियां प्रचलित हैं और इतिहास को पीठ दिखाने की राजनीति के इस दौर में ये कहानियां और भी चटखारे लेकर सुनी-कही जा रही हैं। ऐसे में…

खेती को मुख्‍यधारा में लाता आंदोलन

दिल्‍ली की चौहद्दी पर पिछले करीब 21-22 दिनों से जारी किसान आंदोलन ने खेती-किसानी को कम-से-कम बहस के लायक तो बना ही दिया है। इस लिहाज से देखें तो पिछले तीन-साढे तीन सप्‍ताह देशभर के लिए कृषि-प्रशिक्षण का बेहतरीन मौका…

विकास की ‘बकासुरी’ नीतियों से निपटता किसान

पिछले बडे आंदोलनों को देखें तो दिल्‍ली का मौजूदा आंदोलन कई मायनों में भिन्‍न दिखाई देगा। तरह-तरह से उकसावे के बावजूद अपने अहिंसक स्‍वरूप, जाति-धर्म-वर्ग के हमारे अंतर्निहित विभाजन से परे, सामूहिक नेतृत्‍व और युवाओं-बुजुर्गों, महिलाओं-पुरुषों आदि को यथायोग्‍य जिम्‍मेदारी…

‘अभया’ और ‘निर्भया’ के अर्थ भी समान हैं और व्यथाएँ भी !

डेढ़ करोड़ की आबादी वाले कैथोलिक समाज में पादरियों और ननों की संख्या डेढ़ लाख से अधिक है। कोई पचास हज़ार पादरी हैं और बाक़ी नन्स हैं। ऊपरी तौर पर साफ़-सुथरे और महान दिखने वाले चर्च के साम्राज्य में कई…

नागरिकों को ही ‘विपक्ष’ का विपक्षी बनाया जा रहा है !

सरकार ने अब अपने किसान संगठन भी खड़े कर लिए हैं। मतलब कुछ किसान अब दूसरे किसानों से अलग होंगे ! जैसे कि इस समय देश में अलग-अलग नागरिक तैयार किए जा रहे हैं। धर्म को परास्त करने के लिए…

शिप्रा से गंगा तक पवित्र जल आचमन योग्य भी नहीं

कहा जा रहा है कि गंगा के पानी में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि अरबों रुपये खर्च होने के बाद भी गंगा का पानी पीने लायक क्यों नहीं है ? चाहे उत्तर प्रदेश सरकार प्रधानमंत्री को…

मानवाधिकारों को श्रद्धांजलि

10 दिसंबर : मानवाधिकार दिवस बीते दौर में देश भर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर भी हमले व मुकदमों में तेज़ी से बढ़त हुई है। छात्रों समेत किसान, मज़दूर व अन्य शोषित वर्ग द्वारा अपने अधिकारों की आवाज़ बुलंद करने पर…