समसामयिक

प्रकृति के ‘संरक्षक’ नहीं, उसके ‘अंश’ हैं, हम !

भोपाल गैस कांड’ : 36 वां साल ‘भोपाल गैस कांड’ का यह 36 वां साल है, लेकिन लगता नहीं कि हम उससे कुछ जरूरी सीख ले पाए हैं। मसलन – अब भी तरह-तरह के नारे, नियम-कानून और मुहीमें पर्यावरण-प्रकृति के…

क्‍या दस बरस पूर्व की गई एमएसपी से जुड़ी अपनी सिफारिशों को लागू करेंगे प्रधानमंत्री ?

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध, फायदे की उस खेती की संजीवनी बूटी या पारस पत्थर के इर्द गिर्द सिमट गया है जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी ) कहा जाता है। यह कुछ फसलों पर ही लागू है…

किसान हितैषी नये कृषि कानून के बाद भी देशभर के किसानों में हताश

निमाड़ में कपास खरीदी की हकीकत को उजागर करती एक रिपोर्ट उत्तर भारत के आंदोलनरत किसान कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना दिल्ली में ठीक उसी तरह मुस्तेद है, जैसे घुप्प अंधेरे की कडकड़ाती ठंड भरी रातों में सिंचाई…

सरकार की साथी, गैर-सरकारी संस्‍थाएं

गैर-सरकारी समाजसेवी संस्‍थाएं सरकार से समान दूरी रखते हुए उसे आइना दिखाते रहने के लिए भी खडी की जाती रही हैं, लेकिन आजकल इन संस्‍थाओं का चाल-चरित्र और चेहरा बदल-सा गया है। ‘एनजीओ’ के नाम से पुकारी जाने वाली ये…

क्या ‘जंतर मंतर‘ बन पाएगा नया शाहीन बाग़ ?

किसान आंदोलन से निकलने वाले परिणामों को देश के चश्मे से यूँ देखे जाने की ज़रूरत है कि उनकी माँगों के साथ किसी भी तरह के समझौते का होना अथवा न होना देश में नागरिक-हितों को लेकर प्रजातांत्रिक शिकायतों के…

खेती से खेलती सरकार

सत्‍ता और सरकारों के कर्ज-माफी सरीखे टोटकों को किसानों की नजर से देखें तो लगातार बढती किसान आत्‍महत्‍याएं दिखाई देती हैं। जाहिर है, किसानों और राज्‍य व केन्‍द्र की सरकारों के बीच गहरी संवादहीनता है। ऐसी संवादहीनता जिसमें सरकार की…

क्या अब किसानों के शाहीन बाग तैयार करना चाहती है केंद्र सरकार?

क्या केंद्र सरकार एक बार फिर “शाहीन बागों” का विरोध झेलने को तैयार है? या वह खुद ही किसानों को “शाहीन बाग” बनाने के लिए मजबूर कर रही है? और क्या किसान खुद इस तरह के लंबे और शांतिपूर्ण आंदोलन…

लोकतंत्र में लालफीताशाही

तरह-तरह के कानून-कायदों को बनाते हुए सरकारों का एक तर्क यह भी रहता है कि इससे लालफीताशाही या इंस्पेक्टर-राज काबू में आ जाएगा। तो क्‍या लालफीताशाही और इंस्‍पेक्‍टर-राज को लोकतंत्र की ही कमजोरी माना जा सकता है? आम जनता, अर्थशास्त्रियों और…

एक सदी का ‘एटक’

विदेशी सत्‍ता के दौर में सौ साल पहले जन्‍मा भारत का मजदूर आंदोलन आजकल तरह-तरह के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हमलों का शिकार हो रहा है। लेकिन क्‍या मजदूर-किसान संगठनों को समाप्‍त करके हम अपना विकास कर लेंगे? क्‍या रहा…

स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के अहिंसात्मक परिवेश को समझने का मौक़ा देती गो रूर्बन यात्रा

यात्रा वृत्तांत लगभग 8 महीने घर के भीतर बंधे रहने के बाद यह पहला मौक़ा था जब फिर से यात्रा में निकल पड़ना था I इन 8-9 महीनों में दुनिया में कितनी सारी उथल-पुथल हो गयी I जैसे दुनिया ने…