सप्रेस फीचर्स

हाथरस घटना : यह जातिवादी जहर हिंदू समाज को खोखला कर देगा

शैलेश शुक्ला हाथरस की घटना के बाद पहले सोचा कि बेटी – बेटी है दलित हो या सवर्ण की। इसलिए  जो इस मुद्दे पर जातिवादी विमर्श को हवा दे रहे थे मैंने उनको इग्नोर करना उचित समझा। अपने जीवन में कभी…

गुम होता गांधीजी का ‘जंतर’

महात्‍मा गांधी के समूचे जीवन को देखें तो उस पर एक ‘जंतर’ का प्रभाव साफ दिखाई पडता है। सबसे गरीब और कमजोर आदमी को ध्‍यान में रखकर अपने कामकाज और भविष्‍य को तय करने के इस ‘जंतर’ ने गांधीजी के…

‘कोरोना’ से ज्‍यादा खतरनाक है, लालची इंसान?

कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 बीमारी ने और कुछ किया, ना किया हो, इंसानों के सामने उसकी बनाई दुनिया की पोलपट्टी जरूर उजागर कर दी है। महामारी के दर्जे की इस विपदा ने बता दिया है कि हमारी दुनिया के दैनिक कारनामे…

एक पहल-अंधविश्वासों के खिलाफ

20 अगस्त’ : ‘नेशनल साइंटिफिक-टेम्पर दिवस’ श्याम बोहरे कई घटनाओं को देखकर हमारे मन में कई सवाल उठते होगें। उन सवालों को दबाने की बजाय उन पर और विचार करना, उन्हें और विकसित होने देना और उनसे सीख पाना एक तार्किक तरीका है जो…

गांधी से मुलाकात

तकनीक-आधारित औद्योगीकरण, पूंजी का केन्‍द्रीकरण और उनके नतीजे में दो बडे युद्धों के बावजूद 20वीं और 21वीं शताब्दियां गांधीजी के नाम से जानी जाती हैं। कैसे थे वे और उनका जीवन? प्रस्‍तुत है, इसका खुलासा करता पत्रकार के. विक्रम सिंह…

‘डूबत खातों’ की भरपाई के लिए बैंकों ने लगाए मनमाने शुल्क

विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे (कु) ख्यात व्यापारियों की मार्फत डूबे बैंकों के हजारों करोड़ रुपयों ने ‘एनपीए’ यानि डूबत खाते को सार्वजनिक बहस-मुबाहिसों का मुद्दा बना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ हुए इस खुले खेल ने बैंकों…

‘देख लो आज हमको जी भर के, कोई आता नहीं फिर मर के’

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस (29 जुलाई) पर ‘बाघ’  के बहाने शेरखान ‘शेर’ का विशेष साक्षात्‍कार अवनीश सोमकुंवर भारत में फिलहाल पूरी दुनिया की कुल बाघों की आबादी का 70 प्रतिशत है। देश में अभी 30,000 हाथी, 3000 एक सींग वाले गैंडे…

मनुष्‍य और मुद्रा का मूल्‍य

दिनेश कोठारी कोविड-19 की मार्फत आए लॉकडाउन ने इंसानी नस्‍ल को पूंजी, मुद्रा आदि की असल कीमत भी बता दी है। पिछले तीन-साढे तीन महीनों में हमने जिस तरह का जीवन जिया है, उसने कम-से-कम हमें मुद्रा, मनुष्‍य और उत्‍पादन…

निजी कोल खनन के विरोध से लोक जुम्बिश की शुरूआत

राजेंद्र सिंह लोकतंत्र में जब ’तंत्र’ ही ’लोक’ के विरोध में खड़ा हो जाता है, तो लोक भी संगठित होकर अपने को मजबूत बना लेता है। लेकिन सरकार ने यह काम एक महामारी के दौरान किया है; जिसमें सामाजिक दूरियों…

कोविड-19 राहत कोष को निरर्थक बनाते बैंक चार्जेस

बैंकिंग हमारी अनिवार्य ज़रूरत बन गई है। लेकिन आप जानते ही है कि ये ज़रूरत मुफ्त में पूरी नहीं होती। इसके लिए हर कदम पर चार्जेस लिये जाते है और खाते से पैसा कटता रहता है। हरेक सुविधा के लिए…