Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

अभी दो बोल रहे हैं, फिर सिर्फ़ एक की आवाज़ ही सुनाई देगी !

जब देश को ही सरकार से कुछ जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी है तो फिर राहुल गांधी अकेले को चीनी हस्तक्षेप और पीएम कैयर्स फंड आदि की जानकारी को लेकर अपना करियर और कांग्रेस का भविष्य दांव पर क्यों लगाना…

मनुष्‍य और मुद्रा का मूल्‍य

दिनेश कोठारी कोविड-19 की मार्फत आए लॉकडाउन ने इंसानी नस्‍ल को पूंजी, मुद्रा आदि की असल कीमत भी बता दी है। पिछले तीन-साढे तीन महीनों में हमने जिस तरह का जीवन जिया है, उसने कम-से-कम हमें मुद्रा, मनुष्‍य और उत्‍पादन…

कहाँ जन्में थे भगवान राम ?

समृद्ध विविधता से पता चलता है कि भगवान राम की कथा दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी लोकप्रिय है और इसके कई रूप हैं. राममंदिर आन्दोलन पूरी तरह से रामकथा के उस आख्यान पर केन्द्रित है जिसे वाल्मीकि, तुलसीदास और…

आजीविका के साधनों को नष्ट करना सभ्य और लोककल्याणकारी तरीका नहीं

करोना काल में लोभ, लालच, लूट- खसोंठ, पद का दुरुपयोग और दुखी दर्दी,बिमार भूखे रोजगारविहीन लोगों के साथ व्यवस्था के नाम पर अराजकता जैसे दृश्य खड़े करना न तो राज की सभ्यता हो सकती है न सामाजिक राजनैतिक और व्यावसायिक…

क्या ऐसी ‘हिंसक अराजकता’ के साथ ही जीना पड़ेगा ?

क्या पत्रकार होना न होना भी पत्रकारिता जगत की वे सत्ताएँ ही तय करेंगी जो मीडिया को संचालित करती हैं, जैसा कि अभिनेता के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए फ़िल्म उद्योग में ज़रूरी है ?अगर आप सुशांत सिंह…

श्रमिक वर्ग पर बैंक चार्जेस का सबसे बुरा असर

अपर्याप्त बचत के कारण श्रमिक वर्ग व छोटे कामकाज में संलग्‍न व्‍यक्ति अपने खातों में न्यूनतम राशि नहीं रख पाते। इस वजह से विभिन्न सेवाओं के नाम पर बेंकों ने चार्ज वसूलना शुरू कर दिया। श्रमिक व कमजोर तबके के…

मौत के भय की समाप्ति या व्यवस्था के प्रति तिरस्कार!

आत्म निर्भर बनाए जा रहे देश के लोग इस समय बड़ी संख्या में कोरोना की अंधेरी गुफा में प्रवेश करते जा रहे हैं, पर उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं है कि प्रार्थनाएँ और अनुशासन क्या होता है ! जो पीड़ित हैं…

‘गुना’ से फिर गूंजी, पुलिस-सुधारों की बात !

देशभर में आए दिन पुलिस वालों के कारनामे उजागर होते रहते हैं और यदि बवाल न मचे तो ठंडे भी पड जाते हैं, लेकिन क्‍या पुलिस की मौजूदा बनक में ये कारनामे कोई अजूबा माने जा सकते हैं? क्‍या किसी…

राजनीति से रुसवाई के स्वयंसेवी पडाव

राजनीति से रुसवाई की एक और कमजोरी अपने समाज को कम-से-कम जानने के रूप में उभरती है। यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि अधिकांश ‘एनजीओ’ अपने आसपास रहने, गुजर-बसर करने वाले समाज को न्यूनतम जानते हैं। समाज-कार्य में लगे…

राजनीति विचार

‘तुम हमें समर्थन दो, हम तुम्हें सत्ता देंगे’

भाजपा की गंगा में एक तरफ़ तो कांग्रेसी विचारधारा की नहरों का पानी मिल रहा है और दूसरी तरफ़ मंत्रालयों का काम राज नेताओं की जगह सेवा-निवृत नौकरशाहों के हवाले हो रहा है। यानि पार्टी का पारम्परिक नेतृत्व अपनी ‘किसी…