घुमक्कड़ी का आनन्द
आजकल हमारे रोजमर्रा के जीवन में सुबह की सैर एक जरूरी क्रिया हो गई है, लेकिन क्या इसी घुमक्कडी को जीवन के व्यापक आनंद और ज्ञानार्जन में तब्दील किया जा सकता है ? संत विनोबा और आदि शंकराचार्य ने इसी…
सचिन पायलट का विद्रोह तो वास्तव में राहुल के ख़िलाफ़ है !
इसे अतिरंजित प्रचार माना जा सकता है कि सचिन की समस्या केवल गेहलोत को ही लेकर है। उनकी समस्या शायद राहुल गांधी को लेकर ज़्यादा बड़ी है। राहुल का कम्फ़र्ट लेवल या तो अपनी टीम के उन युवा साथियों के…
रोजगार की चुनौतियों के बीच युवा
रोजगार मुहैया कराने के लिए सरकारों की ओर से दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन रोजगार फिर भी दूर की कौड़ी ही साबित हो रहे हैं। संगठित और असंगठित क्षेत्रों में जो रोजगार थे, वे भी धीरे-धीरे खत्म हो…
व्यवस्था का ही ‘व्यवस्था’ की ज़रूरत से उठता यक़ीन !
वफ़ादारी के टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी व्यवस्था से जुड़े हुए लोग भी कई-कई हिस्सों में बंट गए हैं। इनमें एक वे हैं जो मानते हैं कि वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में अपराधियों को या तो सजा मिल ही नहीं पाती या फिर…
कोविड-19 राहत कोष को निरर्थक बनाते बैंक चार्जेस
बैंकिंग हमारी अनिवार्य ज़रूरत बन गई है। लेकिन आप जानते ही है कि ये ज़रूरत मुफ्त में पूरी नहीं होती। इसके लिए हर कदम पर चार्जेस लिये जाते है और खाते से पैसा कटता रहता है। हरेक सुविधा के लिए…
एनजीओ की बढती अप्रासंगिकता
‘सेवा,’ ‘विकास,’ ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ और ‘गैर-दलीय राजनीति’ के इन विभिन्न सोपानों से गुजरे और मौजूदा भेडियाधसान में ‘एनजीओ’ पुकारे जाने वाले इन व्यक्तियों, समूहों के बीच समझ, तेवर और उद्देश्यों को लेकर गहरी भिन्नता रही है। अव्वल तो, परिभाषा से…
हम किस ‘सीमा’ तक चीनी नाराज़गी की परवाह करना चाहते हैं ?
सवाल केवल इतना भर नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ प्रेषित नहीं कि जबकि पिछले वर्ष बौद्ध धार्मिक गुरु को उन्होंने फ़ोन करके ऐसा किया था। तो क्या पंद्रह जून को पूर्वी लद्दाख़ में…
हिमालय: “विकास” याने पागल दौड़
इन दिनों देश में विकास का प्रकृति, पर्यावरण के साथ जबरदस्त संघर्ष चल रहा है। मानो एक युद्ध ही अनवरत चल रहा हो। आज की इन परिस्थितियों में ’विकास’ हमारी दुनिया का सबसे अधिक भ्रमपूर्ण शब्द बन गया है। आँखों…
अपनी ही स्थापित छवि को खंडित करते नज़र आते नरेंद्र मोदी !
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले दिनों लेह से कोई पैंतीस किलो मीटर दूर नीमू नामक जगह की बहु-प्रचारित यात्रा है। प्रधानमंत्री की पोशाक, सैनिकों (राष्ट्र भी) के समक्ष उनके समूचे उद्बोधन की मुद्राएँ, गलवान घाटी में हुई झड़प में घायल…
दीया मिर्ज़ा ने तो पूछ लिया है ! आप क्या सोचते हैं ?
ये चित्र सत्ताओं में बैठे हुए लोगों को शर्मिंदा तो नहीं ही कर रहे हैं पर उनकी प्रजाओं को अपने होने के बावजूद कुछ भी न कर पाने को लेकर आत्म ग्लानि और क्षोभ में ज़रूर डूबा रहे हैं। इतना…









