Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विकास

नर्मदा : बूँद- बूँद जल का दोहन

सौंदर्य की नदी नर्मदा में जितना भी सौंदर्य बचा है, वह भी यात्रा वृत्तांत के पन्नों में सिमटने वाला है। नर्मदा नदी के किनारे प्रस्तावित 18 थर्मल एवं परमाणु बिजली परियोजना की स्थापित क्षमता 25 हजार 260 मेगावाट है। 22…

पर्यावरण, धर्म तथा विकास के अन्‍तर्संबंध

डॉ. भारतेन्दु प्रकाश भारत में पर्यावरण व धर्म को अत्यन्त व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया है। इन दोनों की व्यवस्थित समझ से ही विकास संभव है। परंतु आधुनिक योजनाकारों ने इन तीनों की अलग-अलग व्याख्या कर पूरी मानवता को ही…

कैसे बसेंगे, लौटते प्रवासियों के गांव

‘कोविड-19’ के कारण लगे ‘लॉक डाउन’ का सर्वाधिक व्‍यापक और गंभीर असर उन मजदूरों पर पडा है जो गांवों की अपनी दुनिया छोडकर रोजी-रोटी की खातिर शहरों में बसे थे और अब वापस गांवों की ओर भागे जा रहे हैं।…

निरंतर विकासमान हिन्दी पत्रकारिता

30 मई : हिन्दी पत्रकारिता दिवस हिंदी पत्रकारिता का इतिहास एक माने में राष्ट्रीय चेतना की विकास गाथा है। स्वतन्त्रता के बाद हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में नए आयाम स्थापित हुए और समाचार पत्रों में विषय वैविध्य भी आया। स्वाधीनता के पश्चात…

मजदूरों का दुख-दर्द और सोनू सूद की समझदारी

कमजोर और छितरी हुई सांगठनिक, राजनीतिक ताकत को अनदेखा करने की बेशर्म हरकत का ही नतीजा है कि महानगरों में सीवर-लाइन सुधारने वाले सैकडों लोग सालाना जान गंवाते हैं और कोई किसी तरह की चूं भी नहीं करता। यहां तक…

‘विकास’ नहीं ‘विनाश’ का टापू है बरगी बांध

भारत वर्ष में अभी तक विभिन्न परियोजनाओं से लगभग 5 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके हैं। मध्य प्रदेश में नर्मदा परियोजना के अन्तर्गत नर्मदा नदी पर 30 बड़े बाँध, 135 मझोले बाँध और 3000 छोटे बाँध बनाने की योजना प्रस्तावित…

कंपनी के लिए टाला जाता, पर्यावरणीय प्रभावों का आंकलन

अस्‍सी के दशक में जिस पर्यावरण के दुख में सरकार और समाज दूबरा हुआ जाता था, अब वही पर्यावरण आंख की किरकिरी बनकर महज टालने योग्‍य प्रक्रिया बनकर रह गया है। नर्मदा की मुख्‍यधारा पर बने पहले बडे बांध ‘रानी…

कम्पनियों का मुनाफा रोकने से लौट सकती है, आर्थिक खुशहाली?

कोरोना के बाद हमें अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्‍यवस्‍थाएं पटरी पर लाने के लिए क्‍या–क्‍या करना होगा? मसलन-क्‍या हम मजदूरों के काम के घंटों समेत कई तरह की कानूनी सुविधाओं को निरस्‍त करने की तर्ज पर कंपनियों के मुनाफे…

आर्थिक हित पोषक बनने के स्थान पर शोषक बन जाते है, तब कोरोना जैसे प्रलय की घंटी

कोरोना के बाद विश्‍व को टिकाने का रास्ता प्रकृति अनुकूलन ही है। प्रकृति के विपरीत समाजवाद में भी पूंजी की परिभाषा अच्छी नहीं थी, इसलिए पूंजीवाद और समाजवाद दोनों में ही प्राकृतिक आस्था नहीं है और प्राकृतिक संरक्षण सिमटा है। जब भी विश्‍व में प्रकृति के विपरीत ही सब काम होने लगे तो प्रकृति का बडा हुआ क्रोध महाविस्फोट बनता है और उससे प्राकृतिक आपदाएं निर्मित होती है। कोरोना को आपदा भी मान सकते है। महामारी केा प्रलय भी कहा जा सकता है। भारत इस महामारी से अपने परंपरागत ज्ञान आयुर्वेद द्वारा बहुत से कोरोना प्रभावितों को स्वस्थ बना सका है। बहुत लोगों के प्राण बचे है। इस आधुनिक आर्थिक तंत्र ने आयुर्वेद जैसी आरोग्य रक्षण पद्धति को सफल बनने का मौका ही नहीं दिया गया। उसने आर्थिक लाभ के लिए केवल चिकित्सा तंत्र को ही बढावा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरफ लौटने का वक्त

सुरेंद्रसिंह शेखावत कोविड-19 से बचने के लिए लगाए गए ‘लॉक डाउन’ के तीसरे चरण में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब कोरोना के बाद क्‍या? आजादी के सत्‍तर सालों में हमने उद्योग, शहरीकरण और मशीनीकरण का उपयोग करके देख…