Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

समसामयिक

लोकतंत्र में लालफीताशाही

तरह-तरह के कानून-कायदों को बनाते हुए सरकारों का एक तर्क यह भी रहता है कि इससे लालफीताशाही या इंस्पेक्टर-राज काबू में आ जाएगा। तो क्‍या लालफीताशाही और इंस्‍पेक्‍टर-राज को लोकतंत्र की ही कमजोरी माना जा सकता है? आम जनता, अर्थशास्त्रियों और…

एक सदी का ‘एटक’

विदेशी सत्‍ता के दौर में सौ साल पहले जन्‍मा भारत का मजदूर आंदोलन आजकल तरह-तरह के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हमलों का शिकार हो रहा है। लेकिन क्‍या मजदूर-किसान संगठनों को समाप्‍त करके हम अपना विकास कर लेंगे? क्‍या रहा…

स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के अहिंसात्मक परिवेश को समझने का मौक़ा देती गो रूर्बन यात्रा

यात्रा वृत्तांत लगभग 8 महीने घर के भीतर बंधे रहने के बाद यह पहला मौक़ा था जब फिर से यात्रा में निकल पड़ना था I इन 8-9 महीनों में दुनिया में कितनी सारी उथल-पुथल हो गयी I जैसे दुनिया ने…

तरुणाई ने सम्पूर्ण क्रांति से प्रौढ़ता पायी है

अहिंसा का रास्ता ही लोकनायक जे.पी. ने पकड़ा था। उनके बनाये सम्पूर्ण क्रांतिदूतों ने भी अहिंसा को ही अपनाया है। इनके जीवन में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्यचर्य, असंग्रह, शरीर-श्रम, अस्वाद, सर्वत्र भयवर्जन, सर्वधर्म समानत्व, स्वदेशी स्पर्श भावना को विनम्रतापूर्ण से…

नतीजों के निहितार्थ

पिछली सदी में जहां अनेक देशों ने लोकतंत्र को एक बेहतर शासन-प्रणाली की तरह अंगीकार किया गया था, अब उसी लोकतंत्र की चपेट में पड़े कराह रहे हैं। जगह-जगह लोकतंत्र के नाम पर तानाशाहों, एक-आयामी विचारधाराओं और फर्जी सत्‍ताओं ने…

बाजार को बरकाने लायक विकल्‍प

कोविड-19 महामारी से उपजी आर्थिक महामंदी ने बाजारों में खलबली मचा दी है। इससे निपटने के लिए तरह-तरह की सरकारी राहतों के अलावा नोट छापकर बांटने तक के सुझाव दिए जा रहे हैं। क्‍या महात्‍मा गांधी, जिन्‍होंने 1930 की पिछली…

विविधता : राष्ट्र निर्माण में कितनी सहायक?

साम्‍प्रदायिक और नस्‍लीय अलगाव के इस दौर में ब्रिटेन का यह उदाहरण काबिल-ए-तारीफ है जिसमें पचास पेंस का ‘डायवर्सिटी क्‍वाइन’ जारी करके वहां की सरकार ने बता दिया है कि वह देश किसी एक जाति, धर्म, भाषा, खान-पान और रहन-सहन…

हमें अर्नब से और अधिक डरने के लिए तैयार रहना चाहिए ?

तमाम लोग जो अर्नब को एक आपराधिक पर ग़ैर-पत्रकारिक प्रकरण में हिरासत में भेजे जाने पर संतोष ज़ाहिर कर रहे हैं उन्हें शायद दूर का दृश्य अभी दिखाई नहीं पड़ रहा है। उन्हें उस दृश्य को लेकर भय और चिंता…

लोकतंत्र के लटके-झटके

सर्कस के लिए ‘घोडों के’ जिस ‘चलते-फिरते घेरे’ की बात की गई है उसमें मनोरंजन होना एक जरूरी शर्त है। ध्‍यान से देखें तो सबसे बडे और पुराने, दोनों छोरों पर लोकतंत्र यही करता दिखाई देता है। चुनावों को अपनी…

आखिर क्‍या है, ‘जीएसटी’ की हकीकत?

तीन साल पहले एकरूपता की खातिर लगाए गए ‘जीएसटी’ ने तमाम छोटे-बडे व्‍यापारियों, आम खरीददारों और सरकारी अमले में से किसी को संतुष्‍ट नहीं किया है। आखिर क्‍या है, ‘जीएसटी’ का तिलिस्म? प्रस्‍तुत है, इस विषय की विस्‍तृत पड़ताल करता…