Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

Month: August 2020

एक प्रवक्ता की मौत और मीडिया की कथित मजबूरियाँ !

बेबाक टिप्‍पणी एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अख़बारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक…

आत्मनिर्भर भारत में बंद होता ‘हथकरघा बोर्ड’

हमारे यहां समाज, संस्‍कृति और श्रम की एक धुरी हस्‍तशिल्‍प भी रही है। इसीलिए आजादी के पहले और बाद में भी हथकरघा उत्‍पादन स्‍थानीय संसाधनों के उपयोग, निजी श्रम और आपसी लेन-देन की खातिर अहमियत पाते रहे हैं। अब हस्‍तशिल्‍प…

क्‍या हैं, ‘नई शिक्षा नीति’ के लक्ष्‍य : ‘विश्‍वगुरु’ या सस्‍ता श्रम?

कोविड-19 से बदहाल देश के सामने, बिना किसी संतोषजनक संवाद, बातचीत के, हड़बड़ी में लाई गई ‘शिक्षा नीति-2020’ आखिर क्‍या उपलब्‍ध करना चाहती है? क्‍या यह तेजी से बढ़ती निजी पूंजी को और बढाने की खातिर सस्‍ते मजदूरों की व्‍यवस्‍था…

संविधान के संकट

73वें ‘स्‍वतंत्रता दिवस’ (15 अगस्‍त) पर विशेष व्‍यक्ति के ब्‍याह और जन्‍म आदि की वर्षगांठ की तरह किसी देश की आजादी की वर्षगांठ में अव्‍वल तो खुशी और समारोह होना ही चाहिए, लेकिन फिर इन अवसरों पर आत्‍म–समीक्षा भी की जानी चाहिए ताकि…

अहिंसक समाज रचना में सर्वसम्मत निर्णय की प्रक्रिया जरूरी

15 अगस्‍त को विनोबा विचार प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय संगीति में मोहनभाई हीराबाई हीरालाल आज हम जिसे स्वराज समझते हैं, वह स्वराज नहीं है। स्वराज के लिए निर्णय प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। बहुमत से होने वाला निर्णय का स्वराज से विरोध है। अहिंसा…

पिंजरे चुनने की आजादी

आजादी बहुत अधिक सजगता की मांग भी करती है। अक्सर तो हमें इसका अहसास भी नहीं होता कि वह वास्तव में हम आजाद नहीं या फिर जिसे आजादी समझ रहे हैं वह गुलामी का ही एक परिष्कृत रूप है। सुसज्जित…

साम्ययोगी समाज का आधार विकेंद्रित अर्थरचना है

14 अगस्‍त को विनोबा विचार प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय संगीति में डॉ.पुष्पेंद्र दुबे समाज में अशांति का कारण श्रम को टालना है। विषमता का मूल कारण यही है। विज्ञान के साधन इसे दूर करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। गलत आर्थिक…

राजनीतिक शून्‍य से बनता है, बेपरवाह समाज

तमाम अटकल-पच्चियों के बावजूद सवाल है कि क्‍या हमारा समाज आजादी के बाद के सबसे बडे पलायन को भोगने की तकलीफों को महसूस करना भी छोड़ चुका है? या फिर ‘पहचान,’ ‘धर्म’,’ ‘बहु-संख्‍यकवाद’ जैसी कोई और बात है जिसके चलते…

भय-मुक्ति स्वाधीनता का मूल है

73वें ‘स्‍वतंत्रता दिवस’ (15 अगस्‍त) पर विशेष स्‍वाधीनता, स्‍वावलंबन और भय-मुक्ति मानव सभ्‍यता की बुनियाद हैं। इन्‍हें साधना, एक सम्‍पन्‍न समाज और सभ्‍यता के निर्माण के लिए बेहद जरूरी है। प्रस्‍तुत है, इसी विषय पर प्रकाश डालता अनिल त्रिवेदी का यह लेख। आज़ादी, स्वाधीनता, फ्रीडम, स्वतंत्रता…

बीमारी और मौत के आँकड़ों से अब डर ख़त्म हो गया है ?

वर्तमान महामारी ने व्यक्ति, परिवार, समाज,राष्ट्र और एक विश्व नागरिक के रूप में सभी को किस कदर बदलकर रख दिया है, अंदर से निचोड़कर भी। हमें पता ही नहीं चल पाया कि पिछले पाँच महीनों के दौरान हम कितने बदल…