Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

श्रवण गर्ग

सोशल मीडिया – कल हो, न भी हो ?

भारत में जिस तरह का सरकार-नियंत्रित ‘नव-बाज़ारवाद’ आकार ले रहा है उसमें यह नामुमकिन नहीं कि सूचना के प्रसारण और उसकी प्राप्ति के सूत्र बाज़ार और सत्ता के संयुक्त नियंत्रण (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) में चले जाएँ और आम जनता को उसका…

प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का टूटता तिलिस्म !

कहा जा रहा है कि मरने वालों के आँकड़े जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, नदियों के तटों पर बिखरी हुई लाशों के बड़े-बड़े चित्र दुनिया भर में प्रसारित हो रहे हैं, प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ भी उतनी ही तेज़ी से…

नागरिकों को अब किस तरह की लहर से लड़ाई के लिए तैयारी करना चाहिए ?

जिन लहरों से हम अब मुख़ातिब होने वाले हैं उनका ‘पीक’ कभी भी शायद इसलिए नहीं आएगा कि वह नागरिक को नागरिक के ख़िलाफ़ खड़ा करने वाली साबित हो सकती है। जो नागरिक अभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा है वही…

छवि बनाने के क्रूर अभियान के बीच अनुपम खेर का ‘सारांश’!

कोरोना की त्रासदी के बीच इससे ज़्यादा तकलीफ़ की बात और क्या हो सकती है कि सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े चारणों की तात्कालिक चिंता, मौतों पर नियंत्रण की कम और प्रधानमंत्री की गिरती साख को थामे रखने की ज़्यादा है।…

स्वास्थ्य ‘आपातकाल’ के बीच न्यायपालिका का अवकाश कितना न्यायोचित ?

चिंता का मुद्दा यहाँ यह है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में उपजी मौजूदा आपातकालीन परिस्थितियों में जब देश का प्रत्येक नागरिक साँसों की लड़ाई लड़ रहा है, तब क्या न्यायपालिका को एक दिन के लिए भी अवकाश पर…

मोदी को सत्ता में बनाए रखना राष्ट्रीय जरूरत है !

इस कठिन समय में इस्तीफ़े की मांग करने की बजाय देश का नेतृत्व करते रहने के लिए प्रधानमंत्री को इसलिए भी बाध्य किया जाना चाहिए कि आपातकालीन परिस्थितियों में भी अपने स्थान पर किसी और विकल्प की स्थापना के लिए…

जनादेश ममता के पक्ष में नहीं, प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ है

दुनिया भर की नज़रें यह देखने के लिए अब भारत पर और ज़्यादा टिक जाएँगी कि अपने जीवन में किसी भी तरह की पराजय स्वीकार नहीं करने वाले नरेंद्र मोदी बंगाल के सदमे को किस अन्दाज़ में प्रदर्शित करते हैं…

प्रधानमंत्री के अंदर भी झांकने की जरूरत है !

देश और दुनिया की बदलती हुई परिस्थितियों में नागरिकों के लिए अब ज़रूरी हो गया है कि वे अपने नायकों की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से अलग उनके/उनमें मानवीय गुणों और संवेदनाओं की तलाश भी करें। ऐसा इसलिए कि अब जो निश्चित…

बताइए ! सबसे पहले किसे बचाया जाना चाहिए ?

व्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन समाप्त होकर मौत के भय में बदलता जा रहा है। सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो तब होगी जब ज़िम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग सांत्वना के दो शब्द कहने के बजाय जनता में व्याप्त…

मौतों के ‘तांडव’ के बीच निर्मम चुनावी स्नान ?

इस समय हमारे शासक अपने ही नागरिकों से हरेक चीज़ या तो छुपा रहे हैं। धोखे में रखा जा रहा है कि किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं है। वैक्सीन, ऑक्सिजन, रेमडेसिविर इंजेक्शन, अस्पतालों में बेड्स, डाक्टर्स आदि का…