हिंसा केवल बंदूक या संघर्ष का नाम नहीं, बल्कि शोषण, असमानता और अन्याय भी उसके रूप हैं। ऐसे में अहिंसक समाज की स्थापना केवल विचार नहीं, बल्कि निरंतर सामाजिक अभ्यास की मांग करती है। चंबल की धरती से प्रस्तावित ‘अहिंसा विद्यालय’ इसी दिशा में युवाओं को संवेदनशील, सक्रिय और परिवर्तनकारी बनाने का एक अभिनव प्रयास है।
हिंसा मुक्त समाज की रचना एक लंबी दौड़ है। हिंसा की कई परतें हैं और हर परत को समझना, उसको हल करते हुए आगे बढ़ना आसान नहीं है। कहीं-कहीं इस काम में आपको सहयोग मिलेगा तो कहीं-कहीं विरोध होगा। एक परत में साथ देने वाले, हो सकता है दूसरी परत में विरोध करना शुरू कर दें। उदाहरण के लिए चंबल घाटी में बागियों के समर्पण में जिन लोगों ने साथ दिया वही आदिवासियों को जमीन दिलाने के मसले पर विरोधी हो गए। जो आदिवासियों के मसले पर साथ दिए वही शराब मुक्ति के मुद्दे पर विरोधी हो गए। सबको साथ लेकर अहिंसात्मक समाज की रचना की ओर बढ़ना काल्पनिक रूप से सुंदर होने के बावजूद व्यवहारिक धरातल पर चुनौतियों से भरा हुआ है। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं को हिंसा, अहिंसा की समझ पर गहराई से काम करना होगा। हर कदम पर कौन साथ देगा या कौन साथ नहीं देगा – इसका विश्लेषण करना होगा। जो साथ नहीं चलने वाले हैं उन्हें विश्वास में लेने के लिए कई तैयारियों की आवश्यकता होगी।
विनोबा भावे अपने व्यक्तित्व के कारण करुणा के माध्यम से भूमि समस्या हल करने में कुछ हद तक सफल हुए। अहिंसा के प्रयोग में व्यक्तित्व मायने रखता है। गांधी जी ने जो किया वो शायद हर व्यक्ति नहीं कर पाएगा। विनोबा जी ने जो किया वो भी हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है। अहिंसात्मक आंदोलनों के माध्यम से जो परिवर्तन आजकल दिखाई पड़ रहे हैं, वो भी विशेष व्यक्तियों के विशेष परिणाम का फल हैं। हो सकता है जिस गहराई से गांधी जी या विनोबा जी ने अहिंसा का प्रयोग किया, उतनी समझ आंदोलनकारियों में न हो। फिर भी अहिंसात्मक तरीके से छोटी-मोटी सफलताएं प्राप्त कर रहे हैं वह अपने आप में प्रशंसनीय है। कम-से-कम उन साथियों में अहिंसा के प्रति एक श्रद्धा तो है।
समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति या तो मान लेते हैं, कि अहिंसात्मक रास्ते से बदलाव की संभावना नहीं है या वे तय करते हैं कि हिंसा ही सही रास्ता है। अहिंसा विद्यालय की स्थापना की कल्पना इसी भूमिका से बनती है।
‘अहिंसा विद्यालय’ का संकल्प पत्र
किताब के माध्यम से, चर्चा के माध्यम से, भ्रमण के माध्यम से युवा साथियों को अहिंसा की ताकत को पहचानने व समझने में मदद कर सकें। तमाम प्रचार-प्रसार के शिकार बनने के पहले उन्हें अहिंसा की ताकत से परिचित करा सकें। हर व्यक्ति इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे एक ऐसे समाज में जीना चाहते हैं, जहां शांति व अमन-चैन हो। जो ऐसे समाज में जीना चाहते हैं उन्हें समाज रचना के लिए काम भी करना पड़ेगा। ‘अहिंसा विद्यालय’ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जो भी इस विद्यालय का भाग बनेगा वह सिर्फ ज्ञान से नहीं, लेकिन व्यवहार से भी एक अहिंसात्मक दुनिया की संरचना में भागीदार बन सकेगा।
चंबल घाटी का माहौल ‘अहिंसा विद्यालय’ के लिए अनुकूल है। सन् 1972 व 74 के दौरान चंबल घाटी में बागी समर्पण से जो माहौल बना उस पर ‘अहिंसा विद्यालय’ के संकल्प को खड़ा कर सकते हैं। देश-दुनिया के तमाम लोग जो चंबल घाटी के प्रयोग से सबक लेते हैं या लेना चाहते हैं उनके लिए ‘गांधी आश्रम’ द्वारा संचालित ‘अहिंसा विद्यालय’ एक वरदान होगा। बागी समर्पण अपने आप में एक बड़ी कहानी है, लेकिन समर्पण के बाद पूरी चंबल घाटी में जो शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक बदलाव देखने को मिला है वो भी समझने व सीखने लायक है।
यह समझने की बात होगी कि जो समाज अहिंसा के रास्ते पर दो-तीन कदम चलने में सफल हुए वो आगे चलने में झिझक रहे हैं। शायद इस बात को समझने में उन्हें कठिनाई हो रही है कि हिंसा मुक्त समाज की कल्पना सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि शोषण, दमन, अत्याचार से भी है। शोषण मुक्त समाज ही अहिंसात्मक समाज होगा। सिर्फ बंदूक की हिंसा खतम होने से अगर हम ये मान बैठें कि अहिंसात्मक समाज की रचना हो गई है तो हम बडी भूल कर रहे हैं। हिंसा के अन्य स्वरूपों को समाप्त करके ही सही अहिंसात्मक समाज की रचना कर सकेंगे। इस गहराई को समझने के लिए ‘अहिंसा विद्यालय’ मदद कर सकता है, गहरी समझ के साथ देश-भर में अहिंसात्मक समाज रचना की दिशा में काम करने वाले हजारों युवाओं की कल्पना अपने मन में करके देखिए। ये अद्भुत प्रक्रिया है।
यह अद्भुत प्रक्रिया पूरी दुनिया को अपनी ओर खींच के लाएगी। इसकी तरंग सिर्फ भारत में नहीं अन्य देशों में भी भारत को सम्मानित होने का अवसर प्रदान करेगा। शायद दुनिया को आज अहिंसा और शांति की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। भारत से ये हवा चलनी चाहिए। शायद चंबल घाटी इस हवा का केंद्र बिन्दु बन सकती है। ‘बागी समर्पण’ के लिए जो समाज दिल खोलकर साथ दिए उनसे उम्मीद है। अपनी उपलब्धियों को राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पटल में लाने में दिल खोलकर साथ दें। मैं जानता हूं कि चंबल घाटी हमें निरुत्साहित नहीं करेगी। (सप्रेस) (


