गांधी की कस्तूरबा

अरुण कुमार डनायक

ऐसा कहा और माना जाता है कि मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा गांधी में तब्दील होने का अधिकांश श्रेय उनकी पत्नी कस्तूरबा को जाता है। कैसा था, गांधी के संग-साथ का उनका जीवन? कैसे वे खुद कस्तूर बाई से बा बनीं? प्रस्तुत है, बा की 78वीं पुण्यतिथि पर उनके जीवन पर प्रकाश डालता अरुण कुमार डनायक का यह लेख।

कस्तूरबा गांधी : 78वीं पुण्यतिथि

वर्ष 1944 की 22 फरवरी को कस्तूरबा गांधी का निधन आगा खान महल में नजरबंदी के दौरान हुआ था। कैसी थीं, वे? दुबला-पतला शरीर, ठिगना कद, गोल चेहरा, माथे पर सुहाग का प्रतीक चिन्ह लाल टीका और सुघड़ता से पहनी हुई सूती साड़ी। बा पोरबंदर के धनाढ्य व्यवसाई गोकुलदास माकन की पुत्री, पोरबंदर और राजकोट के दीवान करमचंद गांधी की पुत्र-वधू और बैरिस्टर मोहनदास गांधी की पत्नी थीं। उनके मायके और फिर ससुराल में किसी तरह की कमी न थी। बैरिस्टर गांधी के दक्षिण-अफ्रीका प्रवास के दौरान बा के अनेक छायाचित्र हैं जिन्हें देखकर लगता है कि पति-पत्नी का जीवन वैभव सम्पन्न था। फिर बा इतनी सादगी पसंद आम भारतीय नारी कब और कैसे हो गईं? चार पुत्रों की बा और एक दर्जन पौत्र-पौत्रियों की मोटी बा कब सारे हिंदुस्तानियों की बा बन गई? यह दिलचस्प कहानी है।

जब बैरिस्टर गांधी, आम जनों के गांधी भाई हो गए और 1899 में दक्षिण-अफ्रीका से भारत वापस आने लगे तो लोगों ने उन्हें अनेकानेक उपहार दिए। इनमें से कुछ स्वर्ण आभूषण बा को भी मिले। गांधी भाई इन उपहारों का बोझ लिए रात भर सो न सके और सुबह उन्होंने पहले अपने पुत्रों और फिर पत्नी को निर्णय सुनाया कि इन सभी उपहारों का उपयोग आम जनता के लिए हो, इसलिए इन्हें मैं सार्वजनिक ट्रस्ट को सौंपना चाहता हूँ। पुत्र तैयार हो गए पर बा को तो अपनी पुत्र-वधुओं को देने के लिए आभूषण चाहिए थे, वे आसानी से तैयार नहीं हो रही थीं। गांधी भाई और उनके पुत्र बा के सामने अपने तर्क देते और बा अश्रुधारा बहाते हुए उनका प्रतिकार करतीं। अंततः परिवार की इच्छा के आगे वे नतमस्तक हुईं और अपरिग्रह जीवन बिताने का संकल्प पति-पत्नी ने लिया।

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डरबन (दक्षिण-अफ्रीका) के बैरिस्टर गांधी को कुछ-न-कुछ सूझता रहता। उनके बंगले में उनके साथ व्यवसाय से जुड़े कारिंदे भी रहते। एक रोज बैरिस्टर गांधी को ख्याल आया कि हमें अपना पाखाना-पेशाब का बर्तन खुद साफ करना चाहिए। बा के जिम्मे एक ईसाई, जिसके माता-पिता पंचम कुल के थे, का पाखाना व अन्य बर्तन साफ करने का दायित्व आया। सनातनी हिन्दू बा के लिए यह असह्य था। वे बैरिस्टर गांधी के आदेश का पालन अनमने भाव से रोते हुए कर रही थीं। पुरुषत्व जागृत हो उठा, सिंह गर्जना हुई “यह कलह मेरे घर में नहीं चलेगा।“ स्त्री के स्वाभिमान को चोट लगी, भड़कते सुर में आवाज निकली “तो अपना घर अपने पास रखो। मैं यह चली।’’

वाद-विवाद बढ़ा तो पुरुष ने स्त्री का हाथ पकड़ा और उसे घर के बाहर निकाल दिया। गंगा-जमुना बहाते हुए स्त्री ने कहा “तुम्हें तो शरम नहीं है, लेकिन मुझे है। जरा तो शरमाओ। मैं बाहर निकलकर कहाँ जा सकती हूँ? यहाँ मेरे माँ-बाप भी नहीं हैं कि उनके घर चली जाऊं। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, इसलिए मुझे तुम्हारी डांट-फटकार सहनी ही होगी। अब शरमाओ और दरवाजा बंद करो। कोई देखेगा तो दो में से एक की भी शोभा नहीं रहेगी।’’ इस अहिंसक प्रतिकार ने बैरिस्टर साहब के विचारों में परिवर्तन ला दिया। नारी भोग की वस्तु न रहकर गृहस्थी को शांत, निर्मल और सुखी ढंग से चलाने की सहधर्मिणी बन गई।   

बैरिस्टर गांधी भारत आ गए थे। वे पहले महात्मा कहलाए और फिर बापू हो गए। पति का साथ निभाते-निभाते कस्तूर बाई भी सारे हिंदुस्तानियों की बा बन गईं। ममतामई माँ की रसोई के दरवाजे आश्रमवासियों और मेहमानों के लिए सदैव खुले रहते। बापू ने हरिजन उद्धार के अपने सामाजिक संकल्प के लिए प्रतिज्ञा ले ली थी कि उन मंदिरों में नहीं जाऊंगा जिसके दरवाजे हरिजनों/अछूतों के लिए बंद हैं। मार्च 1938 के अंतिम सप्ताह बा, महादेव देसाई की पत्नी दुर्गा बहन व एक अन्य स्त्री बेला बहन के साथ पुरी के जगन्नाथ स्वामी के मंदिर गईं। गांधीजी को जब इस बात का पता चला तो वे बहुत दुखी हुए और एक दिन के उपवास व मौनव्रत का ऐलान कर प्रायश्चित किया। बा ने भी सरल हृदय से अपनी भूल स्वीकार करते हुए उपवास किया और गांधीजी ने भी उनकी क्षमा याचना से यह माना कि बा ने ऐसा करके अपने 55 वर्ष के वैवाहिक जीवन को और पवित्र बना दिया है।

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बा के जीवन के अंतिम वर्ष आगाखां महल, पूना में नजरबंदी में व्यतीत हुए। पुत्रवत महादेव भाई देसाई का भी निधन हो गया। पहले से अस्वस्थ बा को मलेरिया और निमोनिया हो गया। उनके मन से स्वस्थ होने की आशा ही उठ गई। उन्हें बहुत कम नींद आती, पावों में सूजन और कब्जियत की भी शिकायत रहती, रक्तचाप भी ठीक न रहता। एलोपैथिक चिकित्सा से लाभ न हुआ तो आयुर्वेद से इलाज की अनुमति सरकार ने दी। बीमारी की वजह से मानसिक अवसाद की शिकार बा चिड़चिड़ी भी हो गईं। ऐसे में बापू और अन्य साथी बहुत धैर्य से बा को समझाते और किसी तरह से दवाई खिलाते।

बा की बीमारी बढ़ती जा रही थी और वैद्य भी अब निराश हो गए थे। तभी 18 फरवरी को ज्ञात हुआ कि उन्हें निमोनिया भी है। बा की दिनों-दिन बिगड़ती हालत, उनका दारुण कष्ट देखकर बापू भी निराश हो गए और उन्होंने बा को राम नाम का मंत्र जपते रहने की सलाह दी। चिकित्सकों ने पेनिसिलीन इंजेक्शन देने की सलाह दी, पर फौजी अस्पताल में भी वह अनुपलब्ध  था। 21 फरवरी को जब पेनिसिलीन इंजेक्शन प्राप्त हुआ तब बा मृत्यु-शैया पर थीं और ऐसे में गांधीजी द्विविधा में थे। वे उन्हें यह इंजेक्शन बार-बार देने के पक्ष में नहीं थे। बा से मिलने उनके तीनों पुत्र हरिलाल, रामदास और देवदास आए। सभी से बा स्नेह से मिलीं और भजन सुनाए।   

22 फरवरी को बा ने बापू को बुलवाया, थोड़ी देर के लिए बा बैठी और फिर बापू की गोदी में सिर रखकर लेट गई। एक बार फिर उठने की कोशिश की, लेकिन बापू ने मना कर दिया और सायंकाल सात बजकर पैतीस मिनिट पर बा के प्राण, गीता के श्लोक सुनते हुए, ईश्वर में विलीन हो गए। डॉ. सुशीला नैयर ने पेनिसिलीन लगाने इंजेक्शन को उबालने रखा ही था कि बा रामधुन सुनते-सुनते राम में लीन हो गईं। अगले दिन बा का शरीर अग्नि को समर्पित हो गया। (सप्रेस)

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