सम सामयिक : आज़ादी का अमृत

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

आज़ाद भारत की इन 75 वर्षों की यात्रा बहुत रोमांचक, उत्तेजक, आह्लादक और प्रेरक रही है। लम्बी पराधीनता के बाद स्वाधीन हुए देश के सामने अनगिनत चुनौतियां थीं। यह देश का सौभाग्य है कि इसे अपने स्वाधीन होने के तुरंत बाद जिन नेताओं का नेतृत्व प्राप्त हुआ वे न केवल अपनी देशभक्ति में अतुलनीय थे, उनके पास एक सुलझी हुई दृष्टि और बड़ा सोच भी था। उनके नेतृत्व में देश ने विकास की जो यात्रा प्रारम्भ की, वह अभी भी अनवरत ज़ारी है।

देश की बागडोर अनेक राजनीतिक दलों और भिन्न-भिन्न सोच वाले नेताओं ने थामी। बेशक उनके दृष्टिकोण अलग-अलग थे, लेकिन इस बात में कोई संशय नहीं है कि वे सभी देश को आगे ले जाना चाहते थे। आज जब देश की स्वाधीनता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर हम पीछे मुड़कर देखते हैं और यह याद करने का प्रयास करते हैं कि उस समय देश किस अवस्था में था और फिर स्मृति में निर्मित उस तस्वीर की तुलना आज के भारत से करते हैं तो हमें अपनी विकास यात्रा पर संतोष और गर्व की अनुभूति होती है। यह सच है कि बहुत बार हम उदास भी होते हैं, निराश भी और कभी-कभी नाराज़ भी, लेकिन यह सब हर विकास यात्रा में होता है।  

इन पचहत्तर वर्षों की उपलब्धियों को याद करना कोई आसान नहीं है। हमने बहुत कुछ किया है, फिर भी अगर इन चीज़ों पर एक नज़र डालें तो आप जान पाएंगे कि हमारी यह यात्रा कितनी उपलब्धि पूर्ण रही है। आज़ादी के तुरन्त बाद हमने योजनाबद्ध आर्थिक विकास की राह चुनी और विभिन्न ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ द्वारा विकास का राजमार्ग निर्मित किया। हमारे इस सोच की परिणति यह हुई कि जहां 1947 में हमारे देश में सुई तक नहीं बनती थी, आज न केवल अपनी आवश्यकता की तमाम चीज़ें हम बना रहे हैं, बल्कि  उनका निर्यात भी कर रहे हैं।

भाखड़ा नांगल जैसे बड़े बांध और भिलाई, राउरकेला जैसे अनेक इस्पात संयंत्र उसी काल की देन हैं। आज़ादी के बाद के कई वर्ष हम समाजवादी ढांचे पर काम करते रहे जिसकी वजह से देश के दूरस्थ इलाकों तक आधारभूत सुविधाएं पहुंचाई जा सकीं। सड़कों का निर्माण हुआ, देश के अधिकांश लोगों तक बिजली और पानी पहुंचा। चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करके अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की दिशा में खूब काम किया गया। बड़े अभियान चलाकर चेचक और पोलियो का उन्मूलन किया गया और हाल में कोविड जैसी बड़ी महामारी से लड़ने के लिए स्वदेशी टीके का निर्माण किया गया। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की वजह से लोगों की औसत आयु में वृद्धि हुई।  

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स्वास्थ्य के साथ-साथ हमने शिक्षा के क्षेत्र में भी खूब काम किया। नए स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले गए, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान बनाए गए। ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ जैसे संस्थानों ने गुणवत्ता-पूर्ण शिक्षा के मानक स्थापित किए। ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम,’ ‘मिड डे मील योजना,’ ‘सर्व शिक्षा अभियान’ आदि के माध्यम से हमने शिक्षा की सुलभता को नए पंख दिए।  

देश के नागरिकों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए हमने अनेक काम किए। रोज़गार के अवसर सृजित किए गए, कृषि, व्यवसाय, उद्योग आदि का खूब विस्तार किया और आर्थिक सुधारों वाली ऐसी नीतियां बनाई जिनसे कतार के अंत में खड़ा व्यक्ति भी लाभान्वित हुआ। ‘हरित’ और ‘श्वेत क्रांति’ ने इस देश के आम नागरिक को समुचित पोषण प्रदान किया। राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त कर असमानता पर प्रहार किया गया तो रेलों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें बेहतर सेवा-प्रदाता बनाया गया। बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगाकर मानवीय गरिमा को पुनर्स्थापित किया गया तो ‘मनरेगा’ के अंतर्गत ग्रामीणों को सौ दिन के रोज़गार की गारण्टी देकर उनकी जीवन स्थितियों को बेहतर बनाया गया। ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ जैसी पहल भी हमने की। 

 

यह बात रेखांकित की जाने काबिल है कि नव-स्वाधीन देश के पहले प्रधानमंत्री ने कला, साहित्य, संस्कृति को भी अपनी प्राथमिकता में रखा। इनके विकास के लिए अकादमियों की स्थापना की और इन्होंने तो खूब काम किया ही, भारतीय कलाकारों और विद्वानों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस देश का नाम रोशन किया। सत्यजित राय ने ‘ऑस्कर’ पाकर, अमर्त्य सेन ने ‘नोबल पुरस्कार’ पाकर और पण्डित रवि शंकर और उस्ताद अली अकबर खान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जगह दिलाकर, आकाशवाणी और दूरदर्शन ने जनरुचि का परिष्कार करके और बॉलीवुड सहित सभी क्षेत्रीय सिनेमाओं ने बेहतरीन फ़िल्में बनाकर देश का मान बढ़ाया। हाल में गीतांजलि श्री ने ‘बुकर’ पाकर देश का गौरव बढ़ाया है।

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इसी तरह खेलों के क्षेत्र में भी हमने अनेक उपलब्धियां अर्जित की हैं। हॉकी में स्वर्ण पदकों के अलावा शतरंज, एयर राइफल, मुक्केबाजी के साथ-साथ  देश के सर्वाधिक लोकप्रिय खेल क्रिकेट में हमने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। विभिन्न बड़ी खेल  स्पर्धाओं जैसे ‘एशियाई खेलों’ का अपने यहां आयोजन कर हमने खेल सुविधाओं का भी काफी विस्तार किया है। जितना काम कला, साहित्य, संस्कृति और खेलों के क्षेत्र में हुआ उससे कम विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नहीं हुआ। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, ‘इसरो’ की स्थापना, परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ का निर्माण, चंद्रयान, पहले भारतीय उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ का प्रक्षेपण, पहले उपग्रह ‘रोहिणी’ का कक्षा में स्थापित होना, स्वदेशी संचार उपग्रह का निर्माण, राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना, देश के पहले और दुनिया के दूसरे परखनली शिशु का जन्म ऐसी कुछ उपलब्धियां हैं जो तुरंत याद आ रही हैं।  

इस बात को कभी नहीं भूला जा सकता है कि भारत ने आज़ाद होते ही अपने सभी नागरिकों को बग़ैर किसी भेदभाव के ‘वयस्क नागरिक मताधिकार’ प्रदान किया। आज़ादी के तुरंत बाद पांच सौ साठ से ज़्यादा देशी रियासतों को भारत संघ में विलीन करने के बड़े काम के बाद भी हमारी राजनीतिक गतिविधियां एक के बाद एक मंज़िलें तय करती गई हैं। हमारे यहां लोकतंत्र न केवल जीवित है, फल-फूल रहा है। समय पर चुनाव होते हैं और जनता  अपने प्रतिनिधि चुनती है। वे प्रतिनिधि यथावश्यकता कानून बनाते हैं। पंचायती राज के लिए संवैधानिक संशोधन, बंधुआ मज़दूरी पर प्रतिबंध, सूचना का अधिकार, धारा 377 में बदलाव ऐसे ही कुछ मील के पत्थर हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं। राजनीतिक रूप से हमने गोआ और पॉण्डिचेरी को भारत में मिलाया तो बांग्लादेश के निर्माण में हम सहयोगी बने। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘गुट-निरपेक्ष आंदोलन’ में हमारी भूमिका और ‘पंचशील’ की हमारी परिकल्पना अविस्मरणीय है।  

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पचहत्तर वर्षों की उपलब्धियों के इन संकेतों से अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारी यह यात्रा कैसी रही है। फिर भी, इस बात को स्मरण रखा जाना ज़रूरी है कि कोई भी यात्रा सदा सीधे-सपाट मार्ग पर नहीं होती। बीच-बीच में ऐसी बहुत सारी चीज़ें आती हैं जो उस यात्रा को सरल-सुगम नहीं रहने देती। अब यह यात्रा करने वालों पर निर्भर करता है कि वे इन कठिनाइयों का सामना कैसे करते हैं। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर यह कहा गया होगा कि सतत जागरूकता ही स्वाधीनता का मोल है. 

हिंदी कवि नंद चतुर्वेदी ने अपनी कविता ‘पराधीनता मुक्ति का दिन’ में लिखा है:  

कितने कठिन दिन हैं स्वाधीनता के/ कभी धुंधले होते हैं शिखरकभी अनंत रोशनी से चमकते/ कभी मिलते हैं प्रश्नों के उत्तर/ कभी जान दे देनी पड़ती हैप्रश्न पूछने वालों को/ कभी लगता है समय अपरिचितअनात्मीयहिंसकआततायी/ कभी सौम्यउदारआत्मीयमृदुभाषी/ कभी सब लगते हैं ताकतवर धक्का-मुक्की करते/ सभी जगह फ़ैले-पसरे/ कभी सब लगते हैं उदासकंधों पर फटा कम्बल डाले दीन/ अभी असीम आशा के दौड़ते रथ पर बैठे/ 

स्वाधीनता कहती है/ मुझे परिभाषित करो/ यदि मैं तुम्हारा सपना हूं तो तुम्हारा यथार्थ भी हूं/ तुम्हारा रोज़ खटखटाती हूं दरवाज़ा/ तुम्हारा घर आंगन मेरी संसद है/ यहीं भटकती रहती हूं तुम्हारी यातनाएं लेकर/ मैं तुम्हारी इच्छा-शक्ति हूं/ तुम्हारी विजय की अकुण्ठित कामना।  (सप्रेस) 

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