जल संरक्षण की असली सफलता किसी संरचना के निर्माण में नहीं, बल्कि उसके सामुदायिक स्वामित्व में है। मुंगेर के किशोर जायसवाल ने अपने तीन दशक से अधिक के काम में इसी विचार को आधार बनाया। जलग्रहण विकास से लेकर टिकाऊ कृषि और ग्रामीण आजीविका तक उनका प्रयास पानी को बचाने के साथ गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में रहा है।
पानी की एक बूंद धरती पर गिरती है तो वह सिर्फ पानी नहीं होती। उसमें खेत की हरियाली, किसान की उम्मीद, गांव की अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों का जीवन छिपा होता है। लेकिन आज वही बूंद संकट में है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, गिरता भूजल, सूखते तालाब, मिट्टी का क्षरण और प्रदूषित होती नदियां लगातार यह चेतावनी दे रही हैं कि आने वाले समय का सबसे बड़ा सवाल पानी हो सकता है।
ऐसे समय में कुछ लोग जल संकट पर चिंता करते हैं और कुछ लोग उसके समाधान की जमीन तैयार करते हैं। मुंगेर के किशोर जायसवाल दूसरी श्रेणी के लोगों में हैं। तीन दशकों से अधिक समय से जल संरक्षण, जलग्रहण विकास, वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, टिकाऊ कृषि और ग्रामीण आजीविका को अपने सार्वजनिक जीवन का आधार बनाने वाले जायसवाल की यात्रा बताती है कि जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं है। यह समाज, विज्ञान, प्रकृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की प्रक्रिया है।
स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर मुंगेर जिला प्रशासन की ओर से उन्हें प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया जाना इसी लंबी यात्रा की एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वीकृति है। जिला प्रशासन की प्रशस्ति में उनके निरंतर और अनुकरणीय जल संरक्षण कार्य, मृदा स्वास्थ्य सुधार तथा प्राकृतिक संसाधन विकास में योगदान को रेखांकित किया गया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है जिसमें पानी को बचाना गांव के भविष्य को बचाने के बराबर माना जाता है।
मुंगेर के ग्रामीण परिवेश में पानी की कठिनाइयों को करीब से देखने वाले किशोर जायसवाल ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि जल संकट केवल कम बारिश का परिणाम नहीं है। असली सवाल यह भी है कि बारिश का पानी कहां गिरता है, कितना बह जाता है, कितना मिट्टी को अपने साथ ले जाता है और कितना जमीन के भीतर पहुंच पाता है। वर्षा को बह जाने देने के बजाय उसे धरती में रोकना और उसका उपयोग करना उनकी कार्य-दृष्टि का केंद्रीय आधार बना।
सुविधाजनक करियर के बजाय उन्होंने समाज और पर्यावरण के लिए काम करने का रास्ता चुना। सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट (स्वार्ड) के माध्यम से जलग्रहण विकास और ग्रामीण परिवर्तन की उनकी पहल आगे बढ़ी। उनका विश्वास रहा कि जिस गांव में पानी सुरक्षित नहीं है, वहां खेती, पशुपालन, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सुरक्षित नहीं रह सकती।

यही कारण है कि उनका काम केवल चेक डैम, खेत-तालाब, कुएं, मेड़बंदी अथवा जल संचयन संरचनाएं बनाने तक सीमित नहीं रहा। उनका असली योगदान उस सामुदायिक व्यवस्था को खड़ा करने में रहा, जो इन परिसंपत्तियों को लंबे समय तक जीवित रख सके। सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन, किसान प्रशिक्षण, सामुदायिक योगदान, श्रमदान, संस्थागत निर्माण और स्थानीय स्तर पर परिसंपत्तियों के रखरखाव की जिम्मेदारी—इन सबको उन्होंने जल संरक्षण का अभिन्न हिस्सा बनाया।
उनकी कार्य-दृष्टि को एक सरल क्रम में समझा जा सकता है—वर्षा से बहाव, बहाव से मिट्टी का क्षरण, पानी का भूजल पुनर्भरण, मिट्टी में नमी, फसल योजना, कृषि उत्पादकता और अंततः आजीविका सुरक्षा। इसीलिए उनके लिए जलग्रहण विकास केवल संरचना निर्माण नहीं, बल्कि समाज को अपनी धरती और पानी को समझने तथा उसकी सामूहिक जिम्मेदारी लेने की प्रक्रिया है।
विभिन्न जलग्रहण परियोजनाओं और जल संरक्षण पहलों के माध्यम से उनकी पहुंच 105 से अधिक परियोजनाओं और करीब 600 गांवों तक बनी है। सरकारी योजनाओं, नाबार्ड, पंचायतों, तकनीकी संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व और समुदाय की भागीदारी को एक साझा लक्ष्य से जोड़ना उनकी कार्यशैली की खासियत रही है। अलग-अलग योजनाओं और संस्थाओं को एक ही जल-दृष्टि के तहत लाने का यह प्रयास जल संरक्षण को परियोजना से आंदोलन में बदलने की क्षमता रखता है।
जिला प्रशासन की प्रशस्ति में भी उनके कार्य को ग्रामीण समुदायों को आधुनिक सिंचाई तकनीकों और जल-बचत वाली कृषि पद्धतियों से जोड़ने तथा कृषि उत्पादकता और स्थानीय आजीविका को बेहतर बनाने के संदर्भ में रेखांकित किया गया है। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि जल संरक्षण का अंतिम उद्देश्य केवल पानी जमा करना नहीं, बल्कि पानी को जीवन और उत्पादन की स्थायी शक्ति बनाना है।
जायसवाल ग्राम पंचायत को जल सुरक्षा की महत्वपूर्ण स्थानीय संस्था मानते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं को तालाब, कुएं, चेक डैम, पारंपरिक जल स्रोतों और भूजल पुनर्भरण से जोड़ने की उनकी सोच ग्रामीण विकास को अधिक टिकाऊ बनाती है। उनका अनुभव बताता है कि यदि जल संरक्षण गांव की योजना का हिस्सा बन जाए तो रोजगार, कृषि और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
उनकी दृष्टि में परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। पूर्वी भारत की आहर-पईन जैसी पारंपरिक जल प्रणालियों और स्थानीय जल संचयन पद्धतियों को हाइड्रोलॉजी, भौगोलिक सूचना प्रणाली, रिमोट सेंसिंग, मौसम संबंधी आंकड़ों, मृदा परीक्षण, जल गुणवत्ता जांच और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ना समय की जरूरत है।
उनके काम में जल संचयन से आगे बढ़कर जल बजट की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है। कितना पानी आया, कितना बह गया, कितना जमीन के भीतर गया, कितना उपलब्ध है और किस फसल को कितने पानी की जरूरत है—इन सवालों के आधार पर खेती की योजना बनाना बदलती जलवायु में बेहद जरूरी है। अनियमित वर्षा और लंबे शुष्क दौर के बीच जल बजट गांवों को जलवायु-सक्षम बनाने का आधार बन सकता है।

उनकी दृष्टि में जल सुरक्षा का अर्थ केवल पानी की मात्रा नहीं, उसकी गुणवत्ता भी है। जिम्मेदार उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य, संतुलित सिंचाई, फसल विविधीकरण और सुरक्षित खाद्य उत्पादन को जल संरक्षण से जोड़ना उनके काम को व्यापक आयाम देता है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितना उत्पादन हुआ, बल्कि यह भी है कि किस मिट्टी में, किस पानी से और किस पर्यावरणीय कीमत पर उत्पादन हुआ।
कृषि विविधीकरण और बागवानी में भी उनके प्रयास उल्लेखनीय रहे हैं। हवेली खड़गपुर के पहाड़पुर जैसे क्षेत्रों में सामुदायिक पहल को कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र और सरकारी संस्थाओं के सहयोग से आगे बढ़ाने का अनुभव बताता है कि वैज्ञानिक जानकारी और संस्थागत सहयोग मिलने पर किसान अपनी भूमि को अधिक उत्पादक और जलवायु-सक्षम बना सकते हैं। बागवानी केवल अतिरिक्त आय का साधन नहीं, बल्कि रोजगार, पर्यावरण और ग्रामीण उद्यमिता का आधार भी बन सकती है।
बांका का उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र उनके समेकित दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। लगभग 989.92 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इस परियोजना में जल संचयन, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, खेत-तालाब, चेक डैम, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, चारा विकास, सिंचाई सुधार, कृषि विविधीकरण और आजीविका संवर्धन को एक साथ जोड़ा गया। इसका महत्व केवल पानी की उपलब्धता बढ़ाने में नहीं, बल्कि खेती, पशुपालन, जैव विविधता और ग्रामीण आय को मजबूत करने में है।
मुंगेर, जमुई, बांका और अन्य जल-संकटग्रस्त इलाकों में उनका क्षेत्रीय अनुभव बताता है कि हर भू-दृश्य का अपना जल-विज्ञान होता है। इसलिए एक जैसी योजना हर जगह लागू नहीं की जा सकती। स्थानीय भूगोल, मिट्टी, वर्षा, खेती और समुदाय की जरूरतों को समझकर समाधान तैयार करना ही टिकाऊ रास्ता है।
यही सोच आगे चलकर नदी तक पहुंचती है। अतुल्य गंगा जैसे नदी-पुनर्जीवन प्रयासों से जुड़कर जायसवाल ने जलग्रहण और नदी को एक ही जल-चक्र के हिस्से के रूप में देखने की कोशिश की। उनका मूल संदेश स्पष्ट है—स्वस्थ नदी की शुरुआत स्वस्थ जलग्रहण क्षेत्र से होती है। यदि बारिश का पानी गांव में नहीं रुकेगा, भूजल का पुनर्भरण नहीं होगा, खेतों में रासायनिक दबाव कम नहीं होगा और प्रदूषण नियंत्रित नहीं होगा तो केवल नदी की सफाई से नदी पुनर्जीवित नहीं हो सकती।
जल और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले जल पुरुष राजेंद्र सिंह, पद्मश्री राधा भट्ट जैसे व्यक्तित्वों से संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान भी उनकी यात्रा का हिस्सा रहा है। इससे उनका विश्वास और मजबूत हुआ कि भारत की जल सुरक्षा के लिए सामुदायिक कार्रवाई, वैज्ञानिक ज्ञान, नीति-समन्वय और नागरिक समाज की सक्रियता को साथ लाना होगा।
उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। उन्हें राष्ट्रीय जल पुरस्कार 2024 के व्यक्तिगत वर्ग में पूर्वी क्षेत्र के स्तर पर पहचान मिली और इससे पहले राष्ट्रीय मंच पर भी उनके कार्य की सराहना हुई। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों मिला राष्ट्रीय सम्मान उनके तीन दशक से अधिक के श्रम की व्यापक राष्ट्रीय स्वीकृति का हिस्सा बना। राष्ट्रीय पहचान के बाद भी उनकी कार्य-दृष्टि का केंद्र वही गांव और वही समुदाय हैं, जहां जल संकट रोजमर्रा की जिंदगी का प्रश्न है।
नाबार्ड का दीर्घकालीन सहयोग भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। जलग्रहण विकास कोष और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन जैसी संस्थागत पहलों ने सामुदायिक स्तर पर पर्यावरणीय प्रयासों को स्थायित्व और विस्तार देने में मदद की। इसी तरह जल शक्ति मंत्रालय और पूर्व योजना आयोग की राष्ट्रीय सम विकास योजना जैसी विकासपरक पहलों से जुड़ी सोच ने यह स्थापित किया कि जल सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और पर्यावरणीय स्थिरता अलग-अलग लक्ष्य नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हुए लक्ष्य हैं।
किशोर जायसवाल अपने काम का श्रेय अकेले लेने के बजाय ग्रामीण समुदायों, किसान समूहों, तकनीकी संस्थानों और साझेदार संस्थाओं के सामूहिक प्रयास को देते हैं। यही उनके काम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। वे मानते हैं कि जल संरक्षण का असली स्वामित्व समुदाय के पास होना चाहिए। जब ग्रामीण श्रमदान करते हैं, योजना बनाने में भाग लेते हैं, योगदान देते हैं और परिसंपत्तियों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाते हैं, तभी कोई जल संरचना स्थायी बनती है। किसान और ग्रामीण लाभार्थी नहीं, सह-निर्माता और संरक्षक बनते हैं।
यही कारण है कि उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी पुरस्कार से बड़ी है—सिर्फ ढांचा बनाना पर्याप्त नहीं, स्वामित्व पैदा करना जरूरी है।
तीन दशकों की उनकी यात्रा में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है—संरचना से व्यवस्था तक, लाभार्थी से भागीदार तक, जल संचयन से जल बजट तक, जलग्रहण से भू-दृश्य पुनर्जीवन तक और कृषि उत्पादन से सुरक्षित एवं टिकाऊ खाद्य व्यवस्था तक।
भविष्य के लिए उनकी दृष्टि में मौसम की सूचना, भौगोलिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय-सहायता, मृदा परीक्षण, जल गुणवत्ता निगरानी, सूक्ष्म सिंचाई और डिजिटल बाजार जैसी तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन उनका मूल सिद्धांत स्पष्ट है—तकनीक समुदाय के ज्ञान की सहयोगी हो, उसका विकल्प नहीं।
मुंगेर के पोलो मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान जिला प्रशासन की ओर से किशोर जायसवाल को सम्मानित किया जाना इसलिए भी अर्थपूर्ण है कि स्वतंत्रता दिवस हमें केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह सवाल भी पूछता है कि क्या हमारा गांव अपने प्राकृतिक संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर और सुरक्षित है? जिस समाज को पानी के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, उसकी स्वतंत्रता अधूरी है।
किशोर जायसवाल की कहानी इसीलिए केवल एक जल कार्यकर्ता की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो अपने भविष्य को बड़े-बड़े नारों में नहीं, छोटी-छोटी बूंदों में तलाश रहा है।
एक बूंद बचती है तो मिट्टी बचती है।मिट्टी बचती है तो फसल बचती है।फसल बचती है तो किसान बचता है।किसान बचता है तो गांव बचता है।और गांव बचता है तो सभ्यता बचती है।
इस अर्थ में किशोर जायसवाल केवल जल संरक्षण के कार्यकर्ता नहीं, भविष्य के प्रहरी हैं। उनकी तीन दशक लंबी यात्रा हमें याद दिलाती है कि जल संकट का समाधान किसी एक सरकार, किसी एक योजना या किसी एक व्यक्ति के पास नहीं है। समाधान तब बनेगा जब विज्ञान की समझ, स्थानीय अनुभव, सरकारी संसाधन और समुदाय की जिम्मेदारी एक साथ आएंगे।
उनका संदेश सरल है, लेकिन समय की सबसे बड़ी जरूरत भी यही है—
वर्षा को समझिए।
पानी बचाइए।
मिट्टी को पुनर्जीवित कीजिए।
खेत को मजबूत कीजिए।
समुदाय को सहभागी बनाइए।
और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कीजिए।
क्योंकि पानी आज बचाया जाएगा, तभी कल जीवन को बचाने के लिए संघर्ष करने की नौबत नहीं आएगी।


