भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान को समझने का प्रयास है।
प्रो. पुनीत कुमार
यह यात्रा-वृत्तांत कुछ अलग तरह का है। अलग इसलिए कि इसमें यात्रा से अधिक उस भूभाग, उसके लोगों और उसकी संस्कृति को समझने का प्रयास है। एक यात्री और शोधार्थी के रूप में मेरी कोशिश रहेगी कि इस अनुभव को पूरी निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करूँ। फिर भी मेरा ज्ञान, मेरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और मेरी भाषा कहीं-न-कहीं इस लेखन को प्रभावित कर सकती है। पिछले डेढ़ वर्ष से मैं भारत की भू-संस्कृतियों को समझने और उनका दस्तावेजीकरण करने के कार्य में लगा हूँ। इसी क्रम में मुझे मध्यप्रदेश के बैतूल जाने का अवसर मिला।
दिल्ली से ट्रेन पकड़कर मैं घोड़ाडोंगरी पहुँचा। यह एक छोटा-सा कस्बा है, जहाँ लोगों के जीवन में कहीं पहुँचने की कोई हड़बड़ी दिखाई नहीं देती। दिल्ली जैसे महानगर से आने वाले व्यक्ति के लिए यह अनुभव अपने आप में नया था। यहाँ से मुझे रानीपुर गाँव स्थित नया उदासीन अखाड़े के आश्रम पहुँचना था, जहाँ बोरी वाले बाबा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन था।
इस यात्रा का निमंत्रण मुझे महाराज सीताराम जी ने दिया था, जिनसे मेरी मुलाकात उज्जैन में हुई थी। सीताराम जी सामान्य साधुओं से कुछ अलग लगे। वे अत्यंत तार्किक, व्यावहारिक और संवादप्रिय व्यक्ति हैं। उनसे बातचीत के दौरान महसूस हुआ कि अध्यात्म और तर्क एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक भी हो सकते हैं।
भू-संस्कृति को समझने का एक प्रयास
‘भू-संस्कृति’ किसी क्षेत्र को समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है। इसमें केवल भूगोल नहीं, बल्कि मिट्टी, जल, खेती, लोकजीवन, खान-पान, आस्था, संस्कृति और जीवन-दर्शन—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। किसी भी क्षेत्र की संस्कृति को समझने के लिए वहाँ की भूमि और वहाँ के लोगों के संबंध को समझना आवश्यक है।
मध्यप्रदेश को मोटे तौर पर छह प्रमुख भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है—मालवा, बुंदेलखंड, बघेलखंड, निमाड़, चंबल और महाकोशल-गोंडवाना। बैतूल जिला महाकोशल-गोंडवाना क्षेत्र का हिस्सा है, जहाँ गोंड और कोरकू जनजातियों की उल्लेखनीय आबादी निवास करती है।
बैतूल की खेती और जल-दृष्टि

बैतूल की मिट्टी सचमुच सोने जैसी है। यहाँ की काली चिकनी मिट्टी पानी को लंबे समय तक सँजोकर रखती है और अत्यंत उपजाऊ मानी जाती है। गेहूँ के साथ-साथ धान और मक्का यहाँ की प्रमुख फसलें हैं।
जल की दृष्टि से भी यह क्षेत्र समृद्ध है। ताप्ती नदी का उद्गम इसी अंचल में है। सतपुड़ा के घने जंगल और पहाड़ आज भी इस नदी की निर्मलता और अविरलता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्थानीय आदिवासी समुदाय की नदी के प्रति गहरी आस्था भी इसके संरक्षण का आधार रही है। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में इसके प्रवाह में कुछ कमी अवश्य महसूस की गई है।
बरसात के बाद बैतूल का स्वरूप और भी मनोहारी हो उठता है। छोटे-छोटे तालाब लबालब भर जाते हैं, झरने जीवंत हो उठते हैं और नदियाँ मधुर कल-कल के साथ बहने लगती हैं। जल और खेती की दृष्टि से यह धरती किसी स्वर्ग से कम नहीं लगती।
प्रकृति में रची-बसी आस्था

बैतूल की सांस्कृतिक पहचान उसकी प्रकृति-निष्ठ जीवन शैली में दिखाई देती है। यहाँ के आदिवासी समुदाय पंचतत्त्वों को ही अपना आराध्य मानते हैं और प्रकृति-पूजन को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा समझते हैं। उनकी आस्था किसी औपचारिक धार्मिक प्रदर्शन से अधिक प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में दिखाई देती है।
यह क्षेत्र शिवभक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के लोगों के जीवन में शिव के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है। बैतूल के अनेक प्राचीन मंदिरों में भोपाली महादेव, जिन्हें छोटा महादेव भी कहा जाता है, विशेष महत्त्व रखते हैं। एक छोटी-सी चढ़ाई के बाद गुफा में स्थित यह प्राचीन मंदिर स्थानीय लोककथाओं से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव ने इसी गुफा में शरण ली थी और बाद में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर का अंत किया।
प्रकृति-पूजन का एक और सुंदर उदाहरण ताप्ती नदी के तट पर देखने को मिला। भारत के अनेक हिस्सों की तरह यहाँ भी नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजित है। राजस्थान की यात्रा के दौरान मैंने सरसा नदी का मंदिर देखा था। उसी तरह बैतूल में ताप्ती के किनारे परिवारों को एक साथ स्नान, पूजा और सामूहिक समय बिताते देखना किसी जीवंत सांस्कृतिक उत्सव से कम नहीं लगा।
बैतूल का स्वाद और सामुदायिक जीवन
यदि आप भोजन के शौकीन हैं, तो बैतूल आपको निराश नहीं करेगा। भीमपुर आश्रम में रहने के दौरान महाराज सीताराम जी ने मुझे यहाँ के अनेक स्थानीय व्यंजनों से परिचित कराया। उनमें गड़माल की दाल मुझे विशेष रूप से पसंद आई। कम मसालों में बना यह भोजन स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी था। आश्रम का सादा भोजन कई पाँच सितारा होटलों के भोजन से कहीं अधिक आत्मीय लगा।
जून का महीना था। आश्रम परिसर में आम और जामुन के पेड़ों की भरमार थी। जब भी मन करता, पेड़ से ताज़े फल तोड़कर खा लेता। प्रकृति के इतने निकट भोजन करने का आनंद अलग ही था।
भारतीय भोजन संस्कृति की एक परंपरा मुझे हमेशा आकर्षित करती है—भंडारा। यहाँ सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, जाति या वर्ग का कोई अंतर नहीं। बैतूल में भी यही भावना देखने को मिली। भोजन केवल प्रसाद नहीं था, बल्कि समानता और साझेदारी का उत्सव था।
भंडारे की एक और खूबसूरती सेवा-भाव है। यहाँ किसी को अलग से काम सौंपना नहीं पड़ता। हर व्यक्ति स्वयं आगे बढ़कर सहयोग करता है। भोजन बनाना केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं माना जाता, बल्कि सभी मिलकर काम करते हैं। यही हमारी सामुदायिक संस्कृति की सबसे सुंदर पहचान है।

सुस्तकदमी का सौन्दर्यशास्त्र
बैतूल की दुनिया छोटी नहीं है; वह अपने भीतर एक संपूर्ण संसार समेटे हुए है। यहाँ जीवन में अनावश्यक भागदौड़ नहीं, बल्कि एक सहज लय है। लोग समय को दौड़ाकर नहीं, जीकर बिताते हैं। अपनों के साथ बैठना, बातचीत करना और संबंधों को निभाना यहाँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।
दिल्ली जैसे महानगर की तेज़ रफ्तार के मुकाबले बैतूल की यह सुस्तकदमी ही उसका सबसे बड़ा सौन्दर्य है। यहाँ आर्थिक संसाधन भले सीमित हों, लेकिन जीवन की आवश्यकताएँ भी उतनी ही सादी हैं। सबसे बड़ी बात यह कि गाँवों में आज भी अपनापन और परस्पर सहयोग जीवित है।
दिल्ली से आए एक अनजान यात्री के रूप में मुझे यहाँ जिस आत्मीयता से स्वीकार किया गया, वह मेरे लिए इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। किसी ने भोजन कराया, किसी ने बाज़ार तक साथ दिया, कोई स्टेशन छोड़ने आया तो कोई लेने पहुँचा। शायद इसी मानवीय स्पर्श की तलाश मुझे बार-बार यात्राओं की ओर खींचती है। शायद इसी प्रेम के अहसास के लिए मुझे घुमक्कड़ी पसंद है। ऐसे अनुभव केवल स्थानों का परिचय नहीं कराते, बल्कि जीवन के गहरे अर्थों से भी परिचित कराते हैं।

