महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का विशेष सत्र बुलाना जहां एक ओर नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं इसके पीछे राजनीतिक रणनीति के सवाल भी उठ रहे हैं। परिसीमन, जनगणना और चुनावी समय को देखते हुए यह पहल कितनी पारदर्शी और वास्तविक है, इस पर बहस तेज हो गई है। असली चुनौती महिलाओं को अवसर नहीं, बल्कि समान और स्वतंत्र भागीदारी सुनिश्चित करना है।
कविता त्रिवेदी
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने आगामी लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों को मद्देनजर रखते हुए 16 अप्रैल को बुलाए गए विशेष सत्र में “विधायी संस्थाओं” में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संविधान संशोधन विधेयक 128 के प्रावधानों के तहत महिलाओं को 33% आरक्षण को साकार करने के लिए सभी दलों के सांसदों से समर्थन का अनुरोध किया है।
सवाल यह है – क्या विशेष सत्र बुलाने का निर्णय भाजपा सरकार का राजनीतिक रणनीति कौशल है? जो ठीक पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु के चुनाव से पहले किया जा रहा है। क्या यह ममता बनर्जी के उस अभेद्य दुर्ग को भेदने की कोशिश है, जिसे भाजपा दीदी के ‘नारी शक्ति वंदन’ के आगे चुनौती नहीं दे पाई? दूसरा, क्या परिसीमन की आड़ में तमिलनाडु में सेंध लगाकर अपने पैर पसारने की कोशिश है?
आरक्षण का मुद्दा नया नहीं, नीयत नई है
33% महिला आरक्षण का मुद्दा कोई नई राजनीतिक लड़ाई नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों के अंतर्विरोध के कारण ही यह लागू नहीं हुआ। आरक्षण देने का फ़ैसला यदि प्रधानमंत्री मोदी के नारी सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयास हैं, तो वह पिछले लोकसभा चुनाव में भी दिया जा सकता था। उसके साथ जनगणना एवं परिसीमन को लागू करने की बात केंद्र सरकार ने क्यों कही? आधी आबादी को उसका अधिकार देना होता तो लोकसभा की 543 सीटें पर्याप्त हैं। नीयत और पारदर्शिता होती तो सरकार तभी आरक्षण लागू करती।
क्या ज़रूरत है कि परिसीमन से 543 के स्थान पर 816 सांसद हों? यानी सरकारी ख़ज़ाने पर अवांछित भार। करीब 300 करोड़ रुपए सालाना की अनुमानित राशि, जबकि सत्र की अवधि और काम करने की अवधि सीमित है। क्या इतने सांसद, जो अधिकतर संसद से ग़ायब रहते हैं, यह प्रश्न विचारणीय नहीं है? कि राजनीतिक फायदे के लिए महिला आरक्षण के नाम पर सरकारी ख़ज़ाने पर भार डालना कितना न्यायसंगत है? और जुमला ‘नारी शक्ति वंदन’ का।
जवाबदेही कहां है? आदर्श ग्राम से आदर्श संसद तक
2014 में मोदी जी ने अपने सांसदों को ‘आदर्श ग्राम योजना’ का कार्यक्रम सौंपा था। क्या कोई सांसद बता सकता है कि किसके क्षेत्र में कोई ऐसा गाँव बना जो गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा से प्रेरित हो – चाहे वह स्वयं प्रधानमंत्री का गाँव हो या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का? जब कोई भी सांसद अपने क्षेत्र के विकास के लिए जवाबदेह नहीं, तो उन्हें प्रचारित करने का क्या औचित्य? जो 543 सांसद जवाबदेह नहीं, वो 816 होकर क्या कर लेंगे?
महिला आरक्षण या ‘परिवार वंदन‘? ज़मीन की हकीकत
जब से महिला आरक्षण लागू किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है, हर राजनीतिक दल की महिलाओं में एक जोश है, मानो वे सुमेरु पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आई हों। जबकि हकीकत कोसों दूर है। क्या ज़मीन से जुड़ी, वर्षों से काम कर रही कार्यकर्ता महिलाएँ अपने सपनों को साकार कर पायेंगी? जहां आज भी संसद में बैठने वाली 30% महिलाएँ राजनीतिक घरानों से आती हों – चाहे वह डिंपल यादव हों, सुप्रिया सुले हों, कनिमोझी हों, मीसा भारती हों, बाँसुरी स्वराज हों या प्रियंका गांधी।
आज गाँव, नगर निगम, विधानसभा या लोकसभा के मद्देनजर नेताओं ने अपने घरों की बहू-बेटियों, रिश्तेदारों को पद दिलाने शुरू कर दिए हैं, कि सीटों के बंटवारे में यदि महिला आरक्षण हो तो ‘घी थाली में ही रहे’!
आरक्षण नहीं, नीयत चाहिए
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उन्हें राजनीतिक अहमियत और अवसर मिले, यह सभी राजनीतिक दलों को ममता बनर्जी से सीखना चाहिए। उन्होंने लोकसभा हो, विधानसभा हो या राज्यसभा – महिलाओं को बिना भेदभाव के मौका दिया है। वही उनकी पार्टी का आधार है। वर्तमान में लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की 12 महिला सांसद हैं जो 34% हैं, बिना किसी आरक्षण के!
प्राथमिकता क्या हो?
महिलाओं के अधिकारों के लिए समर्पित होना, आधी आबादी को न्याय, सुरक्षा, सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए, न कि आरक्षण एवं परिसीमन के नाम पर सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ बढ़ाना।
जब देश का किसान, मज़दूर, युवा बेरोजगार और आम जन महंगाई व भ्रष्टाचार से जूझ रहा है, तब संसद का विशेष सत्र बुलाकर ‘नारी शक्ति वंदन’ का गुणगान करना मात्र अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है।
महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हमें अपनी प्रतिबद्धता को स्वीकार करना होगा। न कि ‘सांसद पति’ और ‘विधायक पति’ कहलाने में ही अपनी शक्ति समझें!


