विश्व पवन दिवस पर दुनिया भर में स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में पवन ऊर्जा की महत्ता को रेखांकित किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि महासागरों में विशाल विंड फार्म स्थापित कर वैश्विक ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा किया जा सकता है। भारत भी पवन ऊर्जा उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
15 जून : विश्व पवन ऊर्जा दिवस
अरविंद जयतिलक
आज विश्व पवन दिवस (ग्लोबल विंड दिवस) है। इस दिवस पर पवन ऊर्जा एवं उसके विभिन्न उपयोगों के बारे में जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले अमेरिकी शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि अगर उत्तर अटलांटिक महासागर में भारत जितने क्षेत्रफल का विंड फार्म स्थापित कर दिए जाएं तो उससे संपूर्ण विश्व की ऊर्जा जरुरत पूरी की जा सकती है। शोधकर्ताओं की मानें तो विश्व की ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए उत्तरी अटलांटिक महासागर में 30 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में विंड फॉर्म स्थापित किया जा सकता है। विंड फॉर्म लगाने के लिए उत्तर अटलांटिक महासागर सबसे उपयुक्त स्थान है। इस विंड से सालाना 18 टेरावाट बिजली का उत्पादन होगा और एक अनुमान के मुताबिक विश्व में करीब इतनी ही बिजली का उपभोग भी होता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि जमीन पर विंड फॉर्म से 105 वाट प्रति वर्ग मीटर बिजली उत्पादन संभव होता है। लेकिन उत्तर अटलांटिक महासागर में विंड फॉर्म स्थापित करने से 6 वाट प्रति वर्ग मीटर की दर से बिजली उत्पादन संभव होगा। यहां समझना जरुरी है कि जमीन के मुकाबले समुद्र में हवाओं की गति और बल 70 प्रतिशत अधिक होता है और वहां तूफान भी अधिक आते हैं। इसलिए टरबाइन को अधिक हवा मिलती है।
भारत की बात करें तो यहां पवन ऊर्जा का विकास 1990 के दशक में प्रारंभ हुआ और पिछले कुछ वर्षों में कमाल की सफलता हासिल हुई है। वर्तमान समय में भारत में पवन ऊर्जा का कुल उत्पादन तकरीबन 56807 मेगावाट से अधिक हो चुका है। भारत में राज्यस्तरी पवन ऊर्जा की दृष्टि से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल शीर्ष पर हैं। भारत में पवन टरबाइनों की स्थापित करने की लघु अवधि और पवन ऊर्जा मशीनों पर बढ़ती निर्भरता और उनके प्रदर्शन ने पवन ऊर्जा को भारत की क्षमता वृद्धि के लिए एक पसंदीदा बना दिया है। भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी के रुप में सुजलॉन पिछले दशक में वैश्विक परिदृश्य पर उभरी है और भारतीय बाजार के लिए पवन टरबाइन की अग्रणी कंपनी बन गयी है। सुजलॉन की सफलता ने भारत को उन्नत पवन टरबाइन प्रौद्योगिकी में विकासशील देश का नेता बना दिया है।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 1,75000 मेगावाट करने का लक्ष्य सुनिश्चित किया था। इसमें सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 100,000 मेगावाट तथा पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता 60,000 मेगावाट करने का लक्ष्य था। इस दिशा में प्रगति जोरों पर है। पवन ऊर्जा के इतिहास में जाएं तो इसका उपयोग पहली बार स्कॉटलैंड में जुलाई 1887 में किया गया और विद्युत बनाया गया। इसके बाद इसका उपयोग वहां की कंपनी ने 1888 से 1900 तक किया। तब इसे डाइनेमो के द्वारा विद्युत बनाने के लिए उपयोग किया जाता था। लेकिन तब यह कुछ ऊर्जा बनाने के ही काम में आता था। इसके उपरांत इसे और भी बड़ा बनाया गया और इसे बैटरी से आवेशित कर बाद में उपयोग के लिए बनाया गया जिससे कि रात में इसका उपयोग किया जा सके।
पवन ऊर्जा के वैज्ञानिक तकनीकी पक्ष पर गौर करें तो सूर्य प्रति सेकेंड 50 लाख टन पदार्थ को ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इस ऊर्जा का जो थोड़ा-सा अंश पृथ्वी पर पहुंचता है वह यहां कई रुपों में प्राप्त होता है। सौर विकिरण सर्वप्रथम पृथ्वी की सतह या भूपृष्ठ द्वारा आवेशित किया जाता है तत्पश्चात वह विभिन्न रुपों में आसपास के वायुमंडल में स्थानांतरित हो जाता है। चूंकि पृथ्वी की सतह एक समान या समतल नहीं है अतः अवशोषित ऊर्जा की मात्रा भी स्थान व समय के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। फिर यह ऐसे बलों को उत्पन करती है, जो वायु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवाहित होने के लिए विवश कर देती है। गर्मी होने से विस्तारित वायु, जो गर्म होने से हल्की हो जाती है, ऊपर की ओर उठती है तथा ऊपर की ठंडी वायु नीचे आकर उसका स्थान ले लेती है। इसके फलस्वरुप वायुमंडल में अर्द्ध-स्थायी पैटर्न उत्पन हो जाते हैं। वायु का चलन, सतह के असमान गर्म होने के कारण होता है। बहती वायु से उत्पन की गयी इसी ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं।
गौरतलब है कि पवन ऊर्जा बनाने के लिए हवादार जगहों पर पवन चक्कियों को लगाया जाता है जिनके द्वारा वायु को गतिज ऊर्जा, यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इस यांत्रिक ऊर्जा को जनित्र की मदद से विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। कह सकते हैं कि पवन ऊर्जा का आशय वायु से गतिज ऊर्जा को लेकर उसे उपयोगी यांत्रिक अथवा विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करना है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि वायु का ऊर्जा उत्पादन करने हेतु उपयोग में न तो किसी प्रकार की प्रदूषण की समस्या या खानों के अपवाह या विषाक्त प्रदूषक पदार्थों जैसी समस्या आती है। न ही इसके कारण विस्तृत क्षेत्र में फैली भूमि को किसी तरह नुकसान पहुंचता है। वास्तव में मानव की पर्यावरणीय आवश्यकताओं की पूर्ण आपूर्ति पवन ऊर्जा रुपांतरण तंत्रों द्वारा हो जाती है। तथ्य यह भी कि कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए उपलब्ध कुछ एक तकनीकी विकल्पों में पवन ऊर्जा महत्वपूर्ण है। इसमें गैसी प्रदूषकों के उत्सर्जन जैसी कोई समस्या नहीं है जो कि ग्रीन हाउस प्रभाव को उत्पन करके पर्यावरणीय समस्याओं को बढ़ाए। सच कहें तो यह नवीकरण योग्य ऊर्जा ही विश्वव्यापी उष्णता और अम्लीय वर्षा से संघर्ष कर सकती है। ऐसे में गौर करें तो विद्युत उत्पादन हेतु पवन ऊर्जा सबसे अधिक स्वीकृत स्रोतों में से एक है। जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह यह कि पवन निःशुल्क तथा प्रचुरता में उपलब्ध है। यह सरलता से प्राप्य और कभी न समाप्त होने वाली है। इसकी आपूर्ति भी निर्बाध है। पवन पर किसी भी देश या वाणिज्यिक प्रतिष्ठान का एकाधिकार नहीं है जैसा कि जीवाश्मीय ईंधनों के साथ है। चूंकि ऊर्जा की मांग सतत रुप से बढ़ती ही जाएगी, इसलिए कच्चे तेल के बढ़ते हुए मूल्यों के साथ निश्चित रुप से पवन ऊर्जा ही एकमात्र आसान विकल्प साबित होगा। ध्यान देने वाली बात यह कि जहां जीवाश्मीय ईंधन सीमित है वहीं पवन कभी समाप्त नहीं होने वाली है।
जीवाश्मीय ईंधनों की तुलना में पवन ऊर्जा संयंत्रों का परिचालन भी अति सुरक्षित है। ध्यान दें तो यह बात तापीय या नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों पर लागू नहीं होती। आधुनिक पवन संयंत्रों में प्रयुक्त प्रभावी सुरक्षा यांत्रिकी से यहां तक संभव हो गया है कि इन्हें सार्वजनिक स्थलों पर भी थोड़ी-सी क्षति के बिना भी स्थापित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए इसे पहाड़ी के शिखर पर, समतल सपाट भू-प्रदेश, वनों तथा मरुस्थलों तक में लगाया जा सकता है। संयंत्र को अपतटीय क्षेत्रों तथा छिछले पानी में भी लगाया जा सकता है। यदि पवन संयंत्रों को कृषि भूमि में भी लगाया जाता है तो मीनार के आधार स्थान तक खेती की जा सकती है।
हालांकि पवन ऊर्जा की बढ़ती जरुरत और उपयोगिता के बावजूद भी कुछ पर्यावरणविदों का तर्क है कि पवन ऊर्जा से कई तरह की समस्याएं उत्पन हो रही हैं। मसलन उत्पादक संयंत्र विद्युत चुंबकीय संकेत वातावरण में प्रसारित होने से कठिनाई उत्पन हो रही है।
पर्यावरणविदों का यह भी कहना है कि क्षैतिज अक्ष वाले पवन चालित टरबाइनों के घूमते हुए ब्लेड दूरदर्शन संकेतों के दृश्य अंश विरुपित करके निकटवर्तीय क्षेत्रों में व्यवधान उत्पन कर रहे हैं। अनेक विकसित देशों में शोर की समस्या को पवन ऊर्जा के विकास के विरुद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। अनेक प्रकृति प्रेमियों को आशंका है कि पवन चालित संयंत्रों की उपस्थिति प्रवासी पक्षियों तथा सामान्य पक्षियों को भयभीत करती है। लेकिन आंकडें बताते हैं कि पक्षी टकराने की घटनाएं निचली उड़ान के स्तर पर ही होती है और ऐसे पक्षियों की संख्या बहुत ही कम होती है। गौर करें तो इन विरोध के इन दलीलों में कोई खास दम नहीं है। सच तो यह है कि ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए पवन ऊर्जा अति सुरक्षित व महत्वपूर्ण विकल्प है।


