यदि बाजार को छोड़कर खेती उदरपूर्ति का जरिया बन जाए तो क्या हो? क्या हमारी मौजूदा उत्पादन पद्धति इंसानी वजूद को बरकरार रखने के काबिल हो पाएगी? क्या बदलाव करने होंगे, स्वास्थ्यवर्धक तरीकों से अपनी भूख भगाने के लिए?
भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण आजीविका आज भी कृषि है। छोटे व मध्यम किसानों की संख्या भारत में सर्वाधिक है और उनके लिए संतोषजनक व टिकाऊ आजीविका का समाधान आवश्यक है। इसके साथ ही पूरे देश के लिए पर्याप्त व स्वास्थ्य के लिए अनुकूल खाद्यों का उत्पादन आवश्यक है, वह भी टिकाऊ तौर पर।
इन महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को एक साथ प्राप्त करने के लिए अनुकूल कृषि नीतियों की बहुत जरूरत है। इनके आधार पर देश में जगह-जगह पर अच्छे मॉडल प्रस्तुत किए जा सकते हैं व इसके आधार पर एक व्यापक अभियान उत्साहवर्धक माहौल में फैल सकता है।
एक बड़ी जरूरत यह है कि कृषि का आधार पर्यावरण रक्षा में होना चाहिए। रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशक व खरपतवारनाशक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से व कई बार खतरनाक मिश्रणों में उपयोग से पर्यावरण व स्वास्थ्य की बहुत क्षति हुई है तथा साथ में किसानों का खर्च बहुत तेजी से बढ़ा है। भविष्य में हमें इन पर निर्भरता को निरंतर कम करना है।
इसके लिए जरूरी है कि प्राकृतिक खेती के विकास को वैज्ञानिक ढंग से स्थापित किया जाए जिससे उत्पादन में कमी लाए बिना कृषि व ग्रामीण पर्यावरण की रक्षा हो सके। यदि एक बार किसान रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं पर निर्भर हो चुका है, तो प्राकृतिक खेती की ओर आने के लिए इसे कुछ समय व सहायता चाहिए व अनुकूल नीतियां अपनाकर उनकी मदद करना जरूरी है।
दूसरी बड़ी जरूरत इस पहली आवश्यकता से मिली हुई है। वह यह है कि किसानों के खर्च को कम किया जाए। तरह-तरह के बढ़ते खर्च ने किसानों को कर्जग्रस्त कर दिया है। वैज्ञानिक ढंग से सोचा जाए तो रासायनिक खाद, कीटनाशक व खरपतवारनाशक दवा के खर्च को बहुत कम किया जा सकता है। अनेक किसान तो अनुकूल व्यवहारिक नीतियों को अपनाकर इसे समाप्त ही कर चुके हैं।
कई छोटे किसानों ने महंगे ट्रैक्टर को छोड़कर ‘पावर टिलर’ को अपनाया है। सोलर सिंचाई अपना कर भी अनेक किसानों ने डीजल के खर्च को बहुत कम किया है। इस तरह की विभिन्न खर्च कम करने के अनुकूल नीतियां को अपनाना चाहिए। इन नीतियों के अपनाने से पहले ही जो किसान कर्जग्रस्त हो गए हैं, उन्हें कर्ज व कम-से-कम ब्याज से राहत देने के उपाय सामने आने चाहिए।
तीसरी बड़ी जरूरत यह है कि जल व मिट्टी संरक्षण के कार्यों को बेहतर ढंग से आगे बढ़ाया जाए। अनेक गांवों में मैंने देखा है कि मात्र कुछ चेक डैम या पहले से हुए इससे मिलते-जुलते कार्य की मरम्मत करने से, वह भी बहुत कम खर्च पर, किसानों को बहुत लाभ मिला है। मुझे कुछ गांवों में स्वयं यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इस तरह का केवल सही ढंग से 10 लाख रुपए तक का खर्च लोगों की भागेदारी से ग्रामीण हित में करने से स्थिति बहुत सुधर सकती है।
वर्षा का पानी बहने के नालों में छोटे गड्डे या स्टोरेज बनाकर ही बहुत से पानी को रोका जा सकता है व किसानों को व प्यासे पशुओं को भी वर्षा के बाद अनेक महीनों तक पानी मिलता रहता है। उपजाऊ मिट्टी तो देश की सबसे बड़ी संपत्ति है व प्राकृतिक खेती अपनाकर व जल संरक्षण से मिट्टी की गुणवत्ता सुधारनी चाहिए। भली-भांति खेतों का बंधीकरण कर, हरियाली बढ़ाकर, पेड़ लगाकर, हम मिट्टी का कटाव रोक सकते हैं। साथ में समतलीकरण से भी कृषि में सहायता मिलती है।
मिश्रित खेती का महत्त्व भी निरंतर स्पष्ट होता जा रहा है, विशेषकर जलवायु बदलाव के दौर में। यदि किसान ने एक-दो फसल ही लगाई है, तो मौसम जरा भी इधर-उधर होने से अधिक क्षति हो जाती है, जबकि मिश्रित खेती में एक नहीं तो दूसरी उपज से आय अर्जन व जीवन-निर्वाह की संभावनाएं बनी रहती हैं। मात्र दो एकड़ का छोटा किसान भी अनुकूल स्थितियां मिलने पर अनाज, मिलेट, दलहन, तिलहन के साथ छोटे बगीचे में सब्जियां, फल, कुछ मसाले व फूल लगा सकता है।
जब अनेक गांवों में मैं ऐसे किसानों को 2 या 3 एकड़ पर 40 तरह के विभिन्न खाद्य प्राकृतिक खेती से उगाते हुए देखता हूं, तो बहुत संतोष मिलता है। इसके साथ पशुपालन होता ही है जिससे प्राकृतिक खेती के लिए खाद भी मिल जाती है। गाय, बैल, भैंस, बकरी सभी पशुओं का अपना-अपना महत्त्व किसान की मिश्रित अर्थव्यवस्था में है।
किसानों के प्रति न्याय-संगत नीतियां अपनाना बहुत आवश्यक है। विशेषकर यदि वे स्वास्थ्य के अनुकूल खाद्य का उत्पादन प्राकृतिक कृषि से करते हैं, तो इसके लिए न्याय-संगत व अच्छे मूल्य की व्यवस्था सरकार को अवश्य करनी चाहिए। प्राकृतिक खेती, जल व मिट्टी संरक्षण के लिए बजट अधिक बढ़ना चाहिए। किसान समूहों का गठन होना चाहिए व उनके स्वतंत्र प्रयासों को अधिक महत्त्व देना चाहिए। किसानों को कर्ज व ब्याज से राहत मिलनी चाहिए। उन्हें आत्म-निर्भरता की राह पर विकास के बेहतर अवसर मिलने चाहिए। गांववासियों के समूहों के स्वामित्वों में खाद्य प्रोसेसिंग की अधिक ईकाइयां गांव में लगनी चाहिए। (सप्रेस)

