मूल्यहीन मीडिया और लोकतंत्र

डॉ.दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हमारे समय का मीडिया शायद सर्वाधिक सवालों का सामना करने वाला मीडिया है। इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड दें तो चहुंदिस उसे लेकर एक नकारात्मक छवि ही दिखाई पडती है। ऐसे में मीडिया की सबसे महत्वपूर्ण कडी की बदहाली में आखिर लोकतंत्र कैसे फल-फूल सकेगा?

हम लोगों ने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में देखा है और यह बात अभी बहुत पुरानी नहीं हुई है कि हमारी आज़ादी की लड़ाई के बहुत सारे पुरोधाओं ने अपने आदर्शों के प्रचार-प्रसार के लिए ही पत्रकारिता की थी। यह स्थिति आज़ादी के बाद के कुछ वर्षों तक भी रही और लम्बे समय तक लोगों के मन में यह भाव रहा कि अगर अखबार में छपा है तो सही ही होगा। जो लोग अखबार निकालते थे, भले ही उनके व्यावसायिक उपक्रम भी रहे थे, उन्होंने मोटे तौर पर अपने व्यवसाय और अखबार में घालमेल नहीं किया। तब संपादक की एक सत्ता होती थी और मालिक लोग प्राय: उस सत्ता का सम्मान करते और उसे पूरी आज़ादी देते थे। आहिस्ता-आहिस्ता स्थितियां बदलीं और आज हम जहां पहुंच गए हैं वहां लगता है कि अखबार (अब उसका रूप व्यापक होकर वह मीडिया बन चुका है) और व्यवसाय दोनों एक दूसरे में घुल-मिल गए हैं। पूंजीवाद की गोद में पलकर बड़ी हुई नई पीढ़ी को यह बात अजीब भी नहीं लगती है।  

आज का मीडिया देखें तो लगता है कि वहां अहर्निश, 24X7 राग दरबारी गाया बजाया जा रहा है। ज़्यादातर अख़बार, ज़्यादातर समाचार चैनल एक-सी चीज़ें परोस रहे हैं। सब जगह शक्तिमान का गौरव गान है। लगता है जैसे कवि इंदीवर ने यह गाना इन्हीं को ध्यान में रखकर लिखा था: जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे/ तुम दिन को अगर रात कहोरात कहेंगे। यह देखना बहुत रोचक और कष्टकारी भी लगता है कि वे सारे समाचार जिनसे शक्तिमान को तनिक भी असुविधा हो सकती हो,  सिरे से नदारद रहते हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि हमारे बहुत सारे सुधी मित्रों ने अखबार पढ़ना और टीवी पर समाचार देखना बंद कर दिया है। पढ़ने और देखने को बचा भी क्या है?

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बेशक, कुछ अख़बार ऐसे हैं, जो अपने व्यावसायिक हितों को दांव पर लगाकर अपने धर्म का पालन किये जा रहे हैं, लेकिन मामला दीये और तूफान की लड़ाई वाला है। सत्ता इतनी ताकतवर हो गई है कि उसे अपने खिलाफ़ चूं तक बर्दाश्त नहीं है और स्वतंत्र आवाज़ को दबाने में उसे तनिक भी हिचकिचाहट महसूस नहीं होती है। जो हाल अखबारों का है वही हाल समाचार चैनलों का भी है। आपके पास चैनलों की भरमार है, लेकिन अगर आप उनके समाचारों में विविधता तलाश करेंगे तो निराश ही होंगे। लगता है जैसे सबके समाचार एक ही फैक्ट्री में ढलकर निकले हैं। अगर कोई चैनल धारा के विरुद्ध बहने का प्रयास करता भी है तो उसे कुचलने के प्रयास शुरू हो जाते हैं। उस पर दुष्प्रचार के गोले दागे जाने लगते हैं और भाड़े के अथवा महामहिम के वफादार सैनिक उसकी छवि पर कालिख पोतने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।  

ऐसे में किसी भी विवेकशील व्यक्ति की मीडिया से निराशा स्वाभाविक है। यहां मीडिया से हमारा आशय मुख्यधारा के मीडिया से है। मुख्यधारा कहना इसलिए ज़रूरी है कि आगे हमें वैकल्पिक मीडिया की भी बात करनी है, जिसमें यह आश्वस्ति होती है कि सब कुछ अभी ख़त्म नहीं हो गया है। कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। मुख्यधारा के मीडिया की अधोगति ने वैकल्पिक मीडिया का पथ प्रशस्त किया है। आज यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि बावज़ूद घने अंधेरे के, उम्मीद की कुछ किरणें यहां-वहां झिलमिला रही हैं। ऐसे अनेक समाचार पत्र यहां-वहां से निकल कर हमें निराशा के गर्त में जाने से बचा रहे हैं।

इसी तरह कई अलाभकारी मीडिया संस्थाएं हैं जो विशुद्ध मिशनरी भाव से समाचार व सूचना प्रसार का काम करने में जुटी हैं। इनका आर्थिक आधार छोटे-मोटे दान या समानधर्मा व्यावसायिक संस्थानों से मिल जाने वाले छिटपुट विज्ञापन हैं। इनके पास इतनी पूंजी तो नहीं है कि ये अपने चैनल चला सकें इसलिए ये यू ट्यूब और विभिन्न सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से लोगों तक पहुंचते और सच्चाई को पहुंचाते हैं। इन्हीं का अगला चरण वे मीडिया वेबसाइट्स और यू ट्यूब चैनल हैं जो इनकी तरह अलाभकारी तो नहीं हैं, वे घोषित रूप से लाभ के लिए काम करते हैं, लेकिन उन्होंने अपने ईमान का सौदा नहीं किया है और सारे ख़तरे उठाकर सच को सामने लाने का काम करते हैं।  

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कुछ अन्य वैकल्पिक मीडिया चैनल भी हैं जो पूरी तरह पाठकीय/दर्शकीय सहयोग पर आधारित हैं। ये अपनी सामग्री केवल भुगतान करने वाले दर्शकों को सुलभ कराते हैं। अब क्योंकि हम लोग अभी तक पैसे देकर ख़बरें पाने के अभ्यस्त नहीं हुए हैं, इनकी पहुंच अपेक्षाकृत सीमित है। ये भी एक राह तो बना ही रहे हैं। आखिर समाचार पाने के लिए हमें कुछ खर्च क्यों नहीं करना चाहिए? वैकल्पिक मीडिया की एक और श्रेणी है जिसका संचालन कोई पत्रकार विशेष अकेले या अपनी छोटी-सी टीम के साथ मिलकर करता है। इस श्रेणी के काम की अनेक सराहनीय बानगियां हाल में हमने किसान आंदोलन के समय देखी हैं। जब सरकार येन-केन-प्रकारेण इस आंदोलन को कुचलने पर आमादा थी, तब इन जांबाज़ पत्रकारों ने तमाम खतरे उठाकर इस आंदोलन की ख़बरें हम तक पहुंचा कर उम्मीद की एक और लौ जगाई।  

इन अपेक्षाकृत व्यवस्थित मीडिया माध्यमों के साथ-साथ इधर सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर वैयक्तिक समाचार प्रेषण और अभिव्यक्तियां भी मीडिया के व्यावसायीकरण और उसके  बिक जाने के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज़ के रूप में सामने आ रही हैं। हाल के समय में यह बात देखना बहुत सुखद है कि बड़े माध्यम जिन समाचारों को छूने से भी डरते हैं, सामान्य नागरिक अपने-अपने सोशल मीडिया खातों से उन्हें समाचारों को आग की तरह फैला देते हैं। यह देखना बहुत रोचक है कि मुख्यधारा के मीडिया की प्रमुख ख़बरों और इन वैकल्पिक माध्यमों पर सुर्खियां पाने वाली ख़बरों में कितना अंतर है और ऐसा केवल सत्ता को चुनौती देने वाले समाचारों के मामले में ही नहीं हो रहा है। कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया की वे खबरें जो मुख्यधारा के मीडिया की स्वार्थी योजना में कहीं नहीं आ पाती हैं वे भी इन्हीं के कारण लोगों तक पहुंच पाती हैं।  

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लेकिन इसमें एक बड़ा ‘लेकिन’  भी है। पिछले कुछ समय से हमारे देश में अत्यधिक तीव्र गति से राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है। या तो आप समर्थक हैं या विरोधी। इस सोच का सीधा असर लोगों की निजी टिप्पणियों पर पड़ने लगा है। अब हम अपनी आंखों से नहीं देखकर ‘उनकी’ आंखों से देखने लगे हैं जिनके हम समर्थक हैं। इस दौर में पारस्परिक वैमनस्य भी बहुत बढ़ा है। अब विचार-विमर्श नहीं होता, सीधे गाली दी जाती है। शाब्दिक हिंसा अपवाद न रहकर आम हो गई है। इसी के साथ एक और गड़बड़ हुई है। राजनीतिक दलों के ‘आईटी सेल’ के वेतन भोगी कर्मचारियों ने भी यहां भारी घुसपैठ कर ली है। अब यहां नागरिक कम बोलते हैं, प्रचारक ज़्यादा बोलते हैं। नागरिक और नागरिक के बीच तो संवाद हो सकता है, नागरिक और प्रचारक के बीच क्या संवाद हो?

जो विवेकशील हैं उन्होंने एक रास्ता निकाला है। वे अपनी बात कहकर मौन हो जाते हैं, अनावश्यक और अनर्गल बातों का जवाब देने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करते, लेकिन इस सब में संवाद का पर्यावरण आहत हुआ है, इसे स्वीकार करना ज़रूरी है। कुल मिलाकर हालात बहुत सुखद नहीं हैं। अंधेरा ज़्यादा घना है, रोशनी की टिमटिमाहट भर है। यह तो समय ही बताएगा कि इस अंधियारी रात की सुबह कब होगी। तब तक आइये, फ़िराक़  गोरखपुरी को गुनगुनाएं: अभी तो ज़िक्र-ए-सहर दोस्तों है दूर की बात/ अभी तो देखते जाओ बड़ी उदास है रात। इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए/ इन्हीं से काम चलाओ, बड़ी उदास है रात। (सप्रेस) 

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