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शहादत की वह सुबह : सतीश प्रसाद झा और पटना सचिवालय कांड

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11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय के पूर्वी द्वार पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़े सात विद्यार्थियों पर चली अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों ने बिहार के स्वतंत्रता संग्राम को अमर शहादत की कथा दी। इनमें खरहरा गांव के सतीश प्रसाद झा भी थे। देशभक्ति से ओतप्रोत इस किशोर ने मात्र अपने प्राण ही नहीं दिए, बल्कि स्वतंत्रता के उस संकल्प को सींचा, जिसकी कीमत एक पूरी पीढ़ी ने चुकाई।


डा. रविशंकर कुमार चौधरी

11 अगस्त 1942 की वह मनहूस शाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गई। किसे पता था कि पटना सचिवालय के पूर्वी द्वार पर बिहार के सात नौनिहाल भारतमाता की स्वतंत्रता के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर देंगे। इन अमर शहीदों में बांका-भागलपुर की धरती के लाल सतीश प्रसाद झा अग्रणी थे। उनके बलिदान ने बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया, जिसकी स्मृति आज भी मातृभूमि के प्रति समर्पण और अदम्य साहस की प्रेरणा देती है।

इन अमर शहीदों के बारे में जानने की प्रबल इच्छा मुझे उसी दिन हुई, जब पहली बार पटना सचिवालय के पूर्वी द्वार पर स्थित शहीद स्मारक के दर्शन किए। स्मारक पर अंकित नामों ने मन में अनेक प्रश्न खड़े किए। लंबे प्रयास के बाद भी इन शहीदों के जीवन से संबंधित विस्तृत जानकारी सहज उपलब्ध नहीं हो सकी। शहीद स्मारक से प्राप्त पते के आधार पर खोज आगे बढ़ी और डॉ. के. के. दत्त की प्रसिद्ध पुस्तक ‘बिहार में स्वातंत्र्य आंदोलन का इतिहास’ से महत्वपूर्ण जानकारी मिली। इसके बाद मैंने बांका के निकट स्थित खरहरा गांव का भ्रमण किया और शहीद सतीश प्रसाद झा से जुड़े लोगों तथा उनके सहपाठियों से बातचीत कर उनके जीवन से संबंधित अनेक तथ्यों को संकलित किया। यह प्रयास उन अमर शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने की एक विनम्र कोशिश है।

इसी प्रसंग में रामगोपाल रुद्र की कविता ‘शहीद गीत’ की पंक्तियां बरबस स्मृति-पटल पर उभर आती हैं—

> यह मजार है किसी शहीद का,

दर्शनीय था जो चांद ईद का,

देश का सपूत था गुमान था,

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सत्य का स्वरूप नौजवान था।

जगमगा रहा दिया मजार पर।

सतीश प्रसाद झा का जन्म भागलपुर के तत्कालीन बांका अनुमंडल के खरहरा गांव में हुआ था। उनके जन्म की निश्चित तिथि और वर्ष की जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके बाबा स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद झा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनकी माता श्रीमती त्रिपुरा देवी का भी निधन हो चुका था।

सतीश के प्रारंभिक गुरु मिश्रजी बताते थे कि उस समय देश में स्वतंत्रता की चिंगारी धीरे-धीरे जनमानस में फैल रही थी। सतीश के भीतर भी देशभक्ति की भावना बचपन से ही आकार लेने लगी थी। वे प्रतिदिन कक्षा में गांधीजी की प्रार्थना ‘रघुपति राघव राजा राम’ का पाठ करते थे। उनकी कक्षा में कुल पांच विद्यार्थी थे। उनके साथ पढ़ने वाले अन्य चार विद्यार्थी थे—राधाकांत झा, निशिकांत मिश्रा, कमलापति मिश्रा और भवानी प्रसाद झा।

सतीश के सहपाठी भवानी प्रसाद झा उनसे लगभग एक वर्ष बड़े थे। उन्होंने बताया कि उनके पिता नवगछिया में कांग्रेस के स्थानीय अध्यक्ष थे। इसलिए उनके घर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्वतंत्रता सेनानियों का लगातार आना-जाना लगा रहता था। बालक सतीश चुपचाप इन लोगों की बातचीत सुना करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन की बातें उन्हें इतनी आकर्षित करती थीं कि वे छिपकर कांग्रेसियों की चर्चाएं सुनते। घरवालों को जब इसका पता चलता तो कई बार उन्हें डांट और मार भी खानी पड़ती थी। लेकिन देश की आजादी के प्रति उनके मन में पैदा हुई जिज्ञासा और उत्कंठा को कोई रोक नहीं सका।

भवानी प्रसाद झा ने अपने सहपाठी और शहीद मित्र की स्मृति में लिखा—

> इस सतीश की पुण्य स्मृति में

ऐसा कुछ निर्माण करें।

हो चरित्र आदर्श हमारा,

जग को किरण प्रदान करें।

सतीश के पिता जगदीश झा मुंगेर में जिला निरीक्षक के कार्यालय में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। पांचवीं कक्षा के बाद सतीश अपने छोटे भाई गोपीकांत झा के साथ मुंगेर चले गए। कुछ समय बाद उनके पिता का स्थानांतरण पटना कॉलेज में लेखा-लिपिक के पद पर हो गया। पूरा परिवार पटना आ गया। सतीश और उनके छोटे भाई का दाखिला पटना कॉलेजिएट स्कूल में कराया गया।

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यह वह दौर था जब देश का राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा था। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी और बिहार के अनेक अग्रणी नेताओं की गिरफ्तारी ने स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक उग्र बना दिया था। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की पुकार गांवों, कस्बों, विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुंच चुकी थी। विद्यार्थियों में भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष गहराता जा रहा था।

11 अगस्त 1942 की सुबह से ही सतीश प्रसाद झा विद्यार्थियों को आंदोलन के लिए प्रेरित करने में जुटे हुए थे। पटना सचिवालय के सामने विद्यार्थियों की भारी भीड़ जमा थी। आंदोलनकारी छात्र सचिवालय के असेंबली भवन पर तिरंगा फहराने के लिए आतुर थे। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देना और यह संदेश देना कि भारत अब गुलामी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाता देखकर तत्कालीन जिला अधिकारी पटना आर्चर ने गोली चलाने का आदेश दिया। गोलियां चलीं और देखते ही देखते सात युवा विद्यार्थी मातृभूमि के लिए शहीद हो गए।

तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ने वाले इन वीरों में सतीश प्रसाद झा तीसरे क्रम पर थे। उनके साथ उमाकांत प्रसाद सिंह, रामानंद सिंह, जगपति कुमार, देवी पद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। वे सभी भारतमाता की गोद में सदा के लिए सो गए, लेकिन उनका बलिदान स्वतंत्रता की उस लौ को और प्रखर कर गया, जिसे अंग्रेजी शासन की गोलियां बुझा नहीं सकीं।

सतीश प्रसाद झा की शहादत केवल एक विद्यार्थी की मृत्यु नहीं थी। वह उस पीढ़ी के साहस का प्रतीक थी, जिसने अपनी उम्र, भविष्य और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की चिंता किए बिना देश को सर्वोपरि माना। वे जिस उम्र में जीवन के सपने देखने वाले थे, उसी उम्र में उन्होंने राष्ट्र के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।

उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए खरहरा गांव के प्रबुद्ध लोगों ने कुछ समय तक ‘शहीद सतीश’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। इसका संपादन उनके सहपाठी भवानी प्रसाद मिश्र करते थे। आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह पत्रिका अधिक समय तक प्रकाशित नहीं हो सकी, लेकिन इसके माध्यम से सतीश के विचारों और बलिदान को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।

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बिहार सरकार ने शहीद सतीश प्रसाद झा की स्मृति में खरहरा गांव में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की। यह विद्यालय आज भी कार्यरत है और उनकी स्मृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम बना हुआ है। गांव के लोगों ने ढाका मोड़ पर उनकी प्रतिमा भी स्थापित की है। सड़क से गुजरने वाला हर व्यक्ति उस प्रतिमा के सामने एक ऐसे युवा को देख सकता है, जिसने अपने वर्तमान को देश के भविष्य के लिए न्योछावर कर दिया।

खरहरा के लोग आज भी सतीश प्रसाद झा को ‘शहीद शिरोमणि’ के रूप में सम्मान देते हैं। यह सम्मान केवल किसी व्यक्ति की स्मृति का सम्मान नहीं है; यह उस आदर्श का सम्मान है, जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि था।

आज जब स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं, तब सतीश प्रसाद झा जैसे शहीदों की जीवनगाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और भी जरूरी हो जाता है। इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं का संकलन नहीं होता। इतिहास उन चेहरों, सपनों और बलिदानों का भी नाम है, जिनकी कीमत पर वर्तमान निर्मित हुआ है।

पटना सचिवालय के पूर्वी द्वार पर आज भी उन सात शहीदों के नाम अंकित हैं। वह स्मारक हमें बताता है कि आजादी केवल किसी राजनीतिक समझौते का परिणाम नहीं थी। उसके पीछे अनगिनत युवाओं का रक्त, असंख्य परिवारों का त्याग और हजारों-लाखों लोगों का संघर्ष था।

सतीश प्रसाद झा की कहानी इसी अमर संघर्ष की कहानी है। खरहरा की मिट्टी में जन्मा यह युवा पटना की धरती पर शहीद हुआ और बिहार के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। उनकी प्रतिमा पर जलता दीप केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक प्रश्न भी है—क्या हम उस स्वतंत्रता के मूल्य को समझ पा रहे हैं, जिसके लिए सतीश जैसे नौजवानों ने अपने जीवन का दीपक बुझा दिया था?

लेखक तेज नारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर में  इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।

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