क्या गांधीवादियों को राजनैतिक दलों से सहयोग लेना चाहिए?

इस्लाम हुसैन

आम धारणा है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं,खासकर गांधीवादियों को राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहिए, लेकिन क्या बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के कोई सामाजिक काम किया जा सकता है? कई गांधीवादियों का मानना है कि सत्ता की राजनीति में लगे दलों का साथ-सहयोग लेना चाहिए, लेकिन क्या यह बिना सहयोग दिए संभव है? विषय की पड़ताल करता इस्लाम हुसैन का लेख।

पिछले साल, जब से उत्तराखंड के गांधीवादियों ने क़ौमी-एकता और समाज की गंगा-जमुनी तहजीब को बचाए और बढाए रखने के कार्यक्रम आरम्भ किए हैं, तब से यह बहस और शंकाएं चल रही हैं कि गांधीवादियों को इस मुहीम में धर्मनिरपेक्षता को मानने वाले राजनैतिक दलों और उनके नेताओं से सहयोग लेना चाहिए या नहीं।

गांधीवादियों और राजनीति के सम्बन्ध में कई सवाल आजादी के दौर से अब तक अक्सर उठाए जाते रहे हैं। गांधीवादी संस्थाओं और गांधी-विनोबा को मानने वालों को राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए, राजनीति नहीं करना चाहिए, राजनैतिक नेताओं से सम्पर्क नहीं रखना चाहिए, अपने कार्यक्रमों में राजनैतिक नेताओं नहीं बुलाना चाहिए, उनसे दूरी बनाए रखना चाहिए और राजनैतिक दलों के कार्यक्रमों में गांधीवादियों को नहीं जाना चाहिए। ये सारे सवाल गांधीवादियों के बीच चलते रहते हैं।

अभी हाल में हमने वर्तमान परिस्थितियों में साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर, खासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे घातक एक-पक्षीय प्रचार पर गांधीवादी दृष्टिकोण से स्टैंड लेने पर विचार करना शुरू किया तो गांधीवादियों के सामने फिर यह मुद्दा सामने आया और इस पर विचार – विमर्श भी हुआ।

संयोग से इसी समय सर्वोदय और गांधीवादियों की शीर्ष संस्था ‘सर्व सेवा संघ’ के बनारस परिसर पर सरकारी पंजा पड़ गया। इस परिसर के साथ गांधी-विनोबा की विरासत जुड़ी है, यह परिसर जेपी से लेकर लालबहादुर शास्त्री सहित सैकड़ों गांधीवादियों के कार्यों और स्मृति से जुड़ा है। इस परिसर को सरकार ने गांधी-विनोबा के रचनात्मक कार्यों को चलाने के लिए छः दशक पहले बाक़ायदा बेचा था, लेकिन आज की सरकार उस पर गैरकानूनी ढंग से कब्जा करने पर तुली है। जेपी द्वारा स्थापित ‘गांधी विद्या संस्थान’ की ज़मीन पर कब्जा कर लिया है, अब पूरे परिसर को कब्जाने का खेल शुरू हो गया है।

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इस परिसर को बचाने के लिए गांधीवादियों और गांधी को चाहने वालों का आंदोलन हो रहा है। इसमें लगभग सभी विपक्षी दल-कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, आप और स्वराज पार्टी सहयोग कर रहे हैं। जो गांधीवादी यह कहते हैं कि उन्हें राजनैतिक दलों और नेताओं से दूरी रखनी चाहिए उनकी आंख खोलने के लिए यह बताना ज़रूरी है कि राजनीति से इतर हर मुद्दे पर राजनैतिक दलों से परहेज़ नहीं हो सकता।

ऐसा नहीं है कि ‘सर्व सेवा संघ’ के परिसर को बचाने के लिए राजनैतिक दल बिन-बुलाए मेहमान हैं। वे गांधी को जानने, मानने या चाहने वाले तो हैं ही, उनसे गांधीवादियों ने समर्थन भी मांगा है। स्वेच्छा से आए हों या उन्हें बुलाया गया हो, वे गांधी की विरासत को बचाने के लिए आंदोलन का साथ दे रहे हैं और गांधीवादी मंच पर उनके साथ हैं। 

वैसे भी व्यापक समाज-हित में कार्य करने के लिए किसी को भी अछूत नहीं समझा जा सकता। इसके लिए हमारे सामने गांधी के दिशा-निर्देश उनके रचनात्मक कामों की प्राथमिकता के रूप में सामने हैं। आजादी के दौरान और उसके बाद की परिस्थितियों में गांधीवादियों के लिए जो काम निर्धारित हुए वो ही स्वीकार किए जाते हैं। हालांकि इसमें राजनैतिक दलों और नेताओं के साथ सम्पर्क करने, न करने के कोई निर्देश नहीं हैं, लेकिन जो काम हैं वो व्यापक समाज के हित में हैं। उसमें ज्यादातर काम ऐसे हैं जिनको करने के लिए समाज के सभी पक्षों से सहयोग लेना और देना ज़रूरी है। इसमें राजनैतिक दल और उसके नेताओं से सम्पर्क करना और उनसे सहयोग लेना भी शामिल है।

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गांधी के रचनात्मक कार्य हैं -1. क़ौमी एकता, 2. अस्पृश्यता निवारण, 3. शराबबंदी, 4. खादी, 5. ग्रामोद्योग, 6. गांव की सफाई, 7. बुनियादी तालीम, 8. आरोग्य शिक्षा, 9. प्रान्तीय भाषाएं, 10. राष्ट्रभाषा, 11. आर्थिक समानता, 12. किसान, 13. मजदूर, 14. आदिवासी, 15. कुष्ठ सेवा, 16. स्त्री, 17. विद्यार्थी, 18. बड़ों को तालीम (प्रौढ़ शिक्षा)। स्वतंत्रता के बाद यह विचार हुआ कि गांधीवादियों को सक्रिय राजनीति न करके समाज को बदलने का काम करना चाहिए। इन मुद्दों को लेकर समाज जब सकारात्मक रूप से बदलेगा, तब राजनीति में शुचिता आएगी, उसमें स्वार्थ सिद्धि की जगह समाज और देशहित आएगा जो स्वराज और ग्राम-स्वराज का लक्ष्य है।

इस तरह ये 18 रचनात्मक कार्य, जो समन्वयवादी समाज के व्यापक हित और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए ज़रूरी थे, सामाजिक कार्य का साधन माने गए। सक्रिय राजनीति से परहेज़ का आलम यह रहा है कि गांधीवादी और सर्वोदयी कार्यकर्ताओं ने चुनाव में वोट देने से किनारा कर लिया। इस बारे में विनोबा जी की वैचारिकी सबसे बड़ा उदाहरण है, लेकिन गांधीजी के बताए 18 रचनात्मक कार्य ऐसे नहीं थे जिससे समाज और देश से कटकर और राग-द्वेष से दूर होकर काम किया जा सके। इसी समाज में रहकर समाज को बेहतर बनाने के लिए निजी राग-द्वेष और हित छोड़कर समाज हित में काम करना होगा।

इन रचनात्मक कामों में सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम क़ौमी-एकता का था। गांधी जी भारतीय समाज में इसकी महत्ता जानते और समझते थे। बिना क़ौमी-एकता के न तो देश मजबूत हो सकता है और न उम्मीद के मुताबिक तरक्की ही हो सकती है। आजादी के 75 साल बाद यह बात सही साबित हो रही है। क़ौमी-एकता में कमज़ोरी की वजह से हमारा देश पिछड़ता जा रहा है इसलिए इसको ख़त्म करने वाली वैचारिकी से हर स्तर पर लड़ना ज़रूरी है।

गांधी जी ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में जो प्रमुख काम किया वो क़ौमी-एकता का ही था। आजादी से पहले, आजादी के वक्त और आज़ादी के फ़ौरन बाद मुल्क के हालात बहुत ख़राब हो चुके थे। गांधी जी ने उस समय हालात को क़ाबू करने के लिए समाज के सभी लोगों का सहयोग लिया था, जिसमें राजनैतिक दलों के लोग भी थे और सरकार भी। यह बात और है कि उस वक्त सरकार दूसरे मसलों में भी उलझी हुई थी, फिर भी सरकार ने और व्यक्तिगत रूचि लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस दिशा में बहुत काम किए। इसी के नतीजे में समाज में सुकून और शांति हो सकी।

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उसके बाद भी बहुत से ऐसे मौके आए जब गांधीवादियों ने देश के राजनैतिक दलों के साथ मिलकर देश और समाज के हित में काम किए। ग्रामीण विकास कार्यों से लेकर शराबबंदी तक में गांधीवादियों ने राजनैतिक जुगलबंदी की। गांधीवादियों के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों में राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम करना, मंच साझा करना मना नहीं है। चुनाव की दृष्टि से या राजनैतिक लाभ लेने की दृष्टि से उनका साथ देना मना है, इसीलिए सर्वोदयी किसी राजनैतिक दल का सक्रिय सदस्य नहीं हो सकता। यह स्पष्टता आज भी यथावत है।

अब इस बात को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो गांधीवादियों पर सबसे बड़ा आरोप आपातकाल से पहले जेपी की ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ में राजनीतिक दलों से जुगलबंदी और आपातकाल के बाद गांधीवादियों द्वारा विपक्षी दलों के सहयोग से कांग्रेस को हराने का है। जब गांधीवादी राजनैतिक मुद्दों, जैसे-तानाशाही रोकने, लोकतंत्र बचाने, देशहित व समाज हित के नाम पर खुद ही यह लाइन तोड़ चुके हैं, तब क़ौमी-एकता, तानाशाही और अत्याचार उत्पीड़न के प्रतिरोध के लिए राजनैतिक दलों का साथ लेना और उनके साथ मंच साझा करना ग़लत कैसे हो सकता है? जब देश में लोकतंत्र नहीं बचेगा, मिली-जुली संस्कृति नहीं बचेगी तो रचनात्मक काम किसके लिए किए जाएंगे? गांधीवादियों के लिए यह विचारणीय है (सप्रेस)

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