कठपुतली कला : विलुप्त होती लोक कला को पुनर्जीवित करने की जरूरत

डॉ. संजीव कुमार

21 मार्च : विश्व कठपुतली दिवस

डॉ. संजीव कुमार

विश्व कठपुतली दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। इसकी कल्पना ईरान के प्रसिद्ध पपेटियर जावद जोल्फाघरी में सन् 2000 में XVIII कांग्रेस यूनियन इंटरनेशनेल डे ला मैरियनेट (यूएनआईएमए) मैग्डेबर्ग में रखी। दो वर्ष इस पर विचार हुआ। और पहली बार 21 मार्च 2003 से विश्व कठपुतली दिवस मनाने की शुरुवात हुयी।

कठपुतली कला किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह हमारे बचपन की यादों का हिस्सा है। परंतु इधर कई दशकों तक हमने इसे भुला दिया था। हम सिनेमा व टेलीवीज़न की चकाचौंध से सम्मोहित थे। परंतु एक बार पुनः इस लुप्त होती लोक कला में जान आने लगी है। दर्शक कठपुतली शो देखने पहुंचने लगे हैं। वह पुनर्जीवित हो रही है। परंतु अब भी काफी प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। इसी प्रयास का नाम विश्व कठपुतली दिवस है।

विश्व कठपुतली दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। इसकी कल्पना ईरान के प्रसिद्ध पपेटियर जावद जोल्फाघरी में सन् 2000 में XVIII कांग्रेस यूनियन इंटरनेशनेल डे ला मैरियनेट (यूएनआईएमए) मैग्डेबर्ग में रखी। दो वर्ष इस पर विचार हुआ। और पहली बार 21 मार्च 2003 से विश्व कठपुतली दिवस मनाने की शुरुवात हुयी।

कठपुतली का खेल अत्यंत प्राचीन नाटकीय खेल है। यह समस्त विश्व में व्यापक रूप प्रचलित रहा है। यह खेल गुड़ियों अथवा पुतलियों या कहें तो पुत्तलिकाओं द्वारा खेला जाता है। हड़प्पा कालीन खुदायी में भी मिट्टी से निर्मित गुड़ियां मिली हैं। इस प्रकार हम अंदाजा लगा सकते हैं कि यह एक अति प्राचीन लोक कला है। यदि भारत की बात करें तो हमारे यहाँ कठपुतली कला की कथावस्तु में पौराणिक साहित्य लोककथाएँ व किवदंतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले अमर सिंह राठौड़ पृथ्वीराज हीर-रांझा लैला-मजनूं और शीरीं-फ़रहाद की कथाएँ ही कठपुतली खेल में दिखाई जाती थीं। परंतु अब इसमें परिवर्तन आया है। अब यह लोक शिक्षण का माध्यम बन चुकी है। हम देखते हैं कि किस प्रकार प्रौढ़ शिक्षा, महिला, स्वास्थ्य, स्वच्‍छता, देश भक्ति व राष्ट्रीय नायकों के जीवन चरित्र को हम कठपुतलियों के माध्यम से विद्यार्थियों व दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं। अब यह भारत में राजस्थान तक ही सीमित नहीं है। इसका विस्तार अखिल भारतीय हो चुका है।

कठपुतली कला में हम देखते हैं कि किस प्रकार कठपुतलियों को पुरुष, स्त्री, पक्षी, जानवर आदि के पात्रों का रुप देकर पपेटियर हमारे दैनिक जीवन व समाज के अनेकानेक प्रसंगों को मंच पर नाटकीय ढ़ग से संगीत व संवाद के माध्यम से प्रस्तुत करता है।

कई लोगों में यह भ्रम है कि कठपुतलियाँ सिर्फ लकडि़यों से बनी होती हैं। व इनका संचालन धागे द्वारा किया जाता है। पर सच्चाई अलग है। कठपुतलियां लकड़ी के अतिरिक्त प्लास्टर ऑफ पेरिस, काग़ज़ की लुग्दी, कपड़ो व अन्य सामग्रियों द्वारा बनायी जाती हैं। कठपुतलियों का संचालन धागे व लोहे अथवा लकड़ी से बनी छड़ी द्वारा किया जाता है। दस्तानों में पहनी जाने वाली कठपुतलियाँ तो काफी प्रसिद्ध हैं। वह बच्चों को बहुत अधिक भाती हैं। इस प्रकार कठपुतली कला एक विस्तृत रुप ले चुकी है व इसमें काफी विविधता है।

कई लोग कठपुतली कला को सिर्फ मनोरंजन का एक साधन मानते हैं जोकि गांवों अथवा मेलों में खेली जाती है। परंतु आज यह कला एक करियर का रूप लेती जा रही है। इसमें काफी संभावनायें हैं। विदेशों में कठपुतली कला की काफी मांग है। हमारे अनेक कलाकार कठपुतली का खेल दिखाने विदेशों के सांस्कृतिक महोत्सवों में जाते रहते हैं। इन्हें विदेशों में काफी सम्मान प्राप्त है। इस प्रकार कठपुतली कला की बढ़ती लोकप्रियता ने इसे एक करियर का रुप दे दिया है। हम देखते हैं कि अनेक टी.वी. शो में पपेटियर को अपनी कला प्रस्तुत करने के लिए बुलाया जाता है। दर्शक इसे पसंद करते हैं। अतः अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम एक विलुप्त होती भारत की प्राचीन लोक कला को पुनर्जीवित करने के प्रयास में  बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें। राज्य एंव केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह कठपुतली कलाकरों व कला को संरक्षित किये जाने का प्रयास करें। उन्हें अनुदान, पुरस्कार, शो का अवसर आदि देकर प्रोत्साहित करें। गैर सरकारी प्रयासों व समाज को भी आगे आ कर सहयोग करने की आवश्यकता है।

डॉ. संजीव कुमार वर्तमान में सहायक प्रोफेसर, पुरुषोत्तम थोटे समाज कार्य महाविद्यालय  नागपुर, महाराष्ट्र में कार्यरत हैं। आपकी प्रारंभिक शिक्षा कंद्रीय विद्यालय, स्नातक व स्‍नातकोत्‍तर  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी; एम. फिल.,जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली व पी.एच.डी. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा से की है।  

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