मानसून : जंगल के बादलों से बरसात

डॉ.किशोर पंवार

सभी जानते हैं कि वाष्पीकरण के चलते बादल बनते हैं और बरसात होती है, लेकिन क्या ये बादल विशेष प्रकार की पत्तियों वाले जंगलों में भी बन सकते हैं? खासकर उन जंगलों में जो वाष्पीकरण वाले तटीय इलाकों से बहुत दूर हैं?

बारिश और बादल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जहां बादल, वहां वर्षा। हम मई-जून के महीनों की प्रचंड गर्मी के अंत और मानसून के आगमन का बेसब्री से इंतजार करते हैं, पर आपने कभी सोचा है कि बादल बनते कैसे हैं? और समुद्री तटों से हजारों किलोमीटर दूर मैदानी इलाकों में कैसे पहुंचते हैं? यह तो आपने सुना और अनुभव भी किया होगा कि जहां पेड़ ज्यादा होते हैं या घने जंगल होते हैं वहां बारिश भी ज्यादा होती है।

इन बादलों का बारिश से क्या रिश्ता है? पहाड़ी क्षेत्रों में आपने देखा होगा कि रोज शाम को बारिश होती है। सुबह जमीन पर और पेड़ों पर बादल बसे रहते हैं और जैसे-जैसे धूप चढ़ती है, बादल भी पेड़ों के ऊपर चढ़ना शुरू कर देते हैं। शाम के चार-पांच बजते ही वे बरसना शुरू कर देते हैं। बादल जहां बरसते हैं वहां न तो समुद्र है और ना ही मानसूनी बादल। तो फिर यह रोज-रोज बारिश कैसी? और क्यों? इन प्रश्नों के उत्तर हमें पीटर वोह्लेबेन की किताब ‘हिडन लाइफ ऑफ ट्रीज’  में मिलते हैं।

 जंगल में पानी कैसे पहुंचता है या एक कदम पीछे चलें तो पानी जमीन पर कैसे पहुंचता है? यह सवाल लगता तो एकदम सरल है, लेकिन इसका उत्तर उतना ही कठिन है। जमीन का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि यह जल से ऊंची होती है। गुरुत्व के कारण पानी सबसे निचले स्तर की ओर बहता चला जाता है। इसके कारण कालांतर में सारे महाद्वीप सूख सकते हैं, परंतु ऐसा होता नहीं है। इसके लिए बादलों द्वारा लगातार बरसाए जाने वाले पानी का हमें धन्यवाद करना चाहिए।

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जो बादल वाष्पीकरण के कारण समुद्र के ऊपर बनते और हवा द्वारा जमीन की ओर बढ़ा दिए जाते हैं, समुद्री तटों से कुछ किलोमीटर अंदर तक ही कार्यशील रहते हैं। जंगल के अंदर की ओर सूखा होता है, क्योंकि बादलों से पानी बरस चुका होता है और अब बादल गायब हो चुके होते हैं। जब आप समुद्री तट से करीब 650 किलोमीटर दूर जाते हैं तो वहां इतना सूखा होता है कि रेगिस्तान नजर आने लगता है।

सभी पौधों की तुलना में फूलधारी पौधों की चौड़ी पत्तियों से ढका क्षेत्रफल सर्वाधिक बड़ा होता है। जंगल के प्रत्येक वर्ग मीटर में पत्तियां और चीड़, देवदार की सुई-नुमा पत्तियां लगभग 27 वर्ग गज का एक बड़ा सा हरा छाता बनाती हैं। वर्षा  का प्रत्येक हिस्सा इस बड़े छाते द्वारा रोक लिया जाता है और तुरंत ही वाष्पीकृत भी हो जाता है। इसके अलावा अनुमान है कि हर गर्मी में पेड़ प्रति वर्ग किलोमीटर लगभग 4830 मीटर पानी वाष्प-उत्सर्जन की प्रक्रिया द्वारा हवा में छोड़ देते हैं। यह जल-वाष्प फिर बादल बनाती है जो जमीन के और भीतर की ओर यात्रा करते हुए पानी बरसाती है।

यह चक्र चलता रहता है और इसी तरह वर्षा बहुत दूरस्थ क्षेत्रों में भी पहुंच जाती है। पेड़ों द्वारा संचालित यह ‘जल पंप’ इतनी अच्छी तरह से कार्य करता है कि दुनिया के कुछ बड़े हिस्सों में, जैसे कि अमेजॉन बेसिन में, समुद्री तटों की तरह भारी बारिश होती है। इस ‘पंप’ के सुचारू रूप से कार्य करते रहने के लिए कुछ बुनियादी जरूरतें हैं। पहली, समुद्र से दूर जमीन के कोने-कोने तक जंगलों का होना। इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण है, ‘समुद्र तटीय वन’ जो इस तंत्र के मुख्य आधार होते हैं। यदि ये ना होंगे तो यह तंत्र  कार्य ही नहीं कर सकेगा।

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इन ‘जल पंपों’ और वनों के आपसी संबंधों के बारे में रूसी वैज्ञानिकों की जोड़ी – माकारीता और ग्रुशकोव ने 2007 में विस्तार से जानकारी दी थी। उन्होंने दुनियाभर के विभिन्न प्रकार के जंगलों का अध्ययन करके पाया था कि सभी जगह ऐसा होता है, अर्थात जमीन के अंदरूनी हिस्सों में बारिश जंगल के बादलों से ही होती है और समुद्री तटों से जमीन के अंदर तक वनों का लगातार होना जरूरी होता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया है कि यदि ‘समुद्र तटीय वनों’ का सफाया कर दिया गया हो तो यह तंत्र टूट जाता है और फिर यह कार्य नहीं करता।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप पानी के वितरण के लिए विद्युत पंप का उपयोग कर रहे हों और इनटेक पाइप को कुछ समय के लिए तालाब से बाहर खींच लें। ऐसा ब्राजील में होने भी लगा है जहां अमेजॉन के ‘वर्षा वन’ तेजी से सूखने लगे हैं। खुशकिस्मती से यहां जंगल अभी भी हैं, हालांकि वे तेजी से कम हो रहे हैं। उत्तरी गोलार्ध के शंकुधारी जंगल जलवायु को प्रभावित करते हैं और पानी का व्यवस्थापन अन्य तरीके से भी करते हैं।

शंकुधारी पेड़ ‘टेरपीन्स’ छोड़ते हैं जो ऐसे पदार्थ होते हैं जो प्रमुख रूप से बीमारी और कीटों के बचाव के लिए बने होते हैं। विंध्याचल और सतपुड़ा के ‘पर्णपाती’ जंगलों में गर्मी के दिनों में मैंने  इन ‘टेरपीन्स’ की ‘ब्लू हेज’ को देखा है। जब ये अणु हवा में मिलते हैं तब नमी इन पर घनीभूत हो जाती है। इन्हें ‘सीसीएन’ अर्थात ‘क्लाउड कंडेंसेशन न्यूक्लि’ कहते हैं। इनसे फिर बादल बनते हैं जो बिना जंगल वाले क्षेत्रों के बादलों की तुलना में दोगुने घने होते हैं।

इससे वर्षा की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और साथ ही सूर्य की लगभग 5% रोशनी जमीन से दूर, पहले ही ऊपर-के-ऊपर परावर्तित हो जाती है। इससे क्षेत्र का तापमान गिरकर ठंडा हो जाता है, जैसा कि इन पेड़ों को चाहिए। इसके चलते पेड़ और मौसम के बीच का यह परस्पर संबंध जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र में जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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जंगलों में पत्तियों की मोटी परत एक विशाल स्पंज की तरह कार्य करती है जो सारी बारिश को समेट लेती है। पेड़ और उनकी पत्तियां इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि वर्षा की बूंदे जमीन पर तेजी से सीधे ना गिरें, बल्कि उनकी शाखाओं, पत्तियों से होती हुई धीरे-धीरे नीचे की ओर टपकें। जंगल की सतह की ढीली-ढाली मिट्टी सारा पानी सोख लेती है। ऐसे में बारिश की बूंदें मिलकर छोटे-छोटे झरने, सोते बनाने की बजाय, जो पलक झपकते ही दौड़कर दूर-दूर चले जाते हैं, मिट्टी को बांधे रखती हैं।

जमीन के अंदरूनी हिस्सों में जंगलों के द्वारा बारिश होने की इस भूमिका के मद्देनजर आइए हम नए-नए जंगल लगाएं और जो हैं उन्हें कटने से बचाएं। बक्सवाहा में प्रस्तावित वन कटाई पर इन वनों की जल-चक्र में भूमिका और बारिश में योगदान के चलते क्या पुनर्विचार की जरूरत नहीं है? इस संदर्भ में हाल में ही हमसे विदा लेने वाले प्रसिद्ध पर्यावरणविद् श्री सुंदरलाल बहुगुणा की कुछ पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं – ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी,  पानी और बयार।’  (सप्रेस)

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