खेती का खाका बदलने का मौका

राकेश दीवान

किसान और किसानी की इस बदहाली में नीति-निर्माताओं और सत्‍ताधारियों की उन मान्‍यताओं ने और रंग चढाया जिनके मुताबिक किसानों की बदहाली कम उत्‍पादन, बाजारों से दूरी और कृषि-क्षेत्र पर अधिक दबाव के कारण हो रही है। नतीजे में सरकारी स्‍तर पर इसी तर्ज की योजनाएं बनी और क्रियान्वित की गईं। बेंगन, सरसों सरीखी फसलों के भरपूर उत्‍पादन के बावजूद उनका उत्‍पादन बढ़ाने के लिए ‘बीज संवर्धन’ (जीनेटिकली मॉडाफाइड) तकनीक से तैयार बीजों को परोसा गया। साल-दर-साल कृषि-क्षेत्र और बोनी बढ़ाकर उत्‍पादन में गैर-जरूरी इजाफा किया गया। किसानी से कोसों दूर बैठे व्‍यापारियों, बिचौलियों को बाजार बढ़ाने-फैलाने और मुनाफा कमाने की खुली छूट दी गई।

नरेन्‍द्र मोदी और उनकी सरकार ने हडबड़ी में कृषि संबंधी तीन कानूनों को पारित कर और कुछ भले ही किया, ना किया हो, देश में आजादी के बाद के सबसे बड़े किसान आंदोलन की अलख जरूर जगा दी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देशभर के किसान 20 और 22 सितम्बर को संसद में ध्‍वनिमत से पारित तीन कृषि बिलों के विरोध में लामबंद हुए हैं। ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक – 2020,’ ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन, कृषि सेवा पर करार विधेयक – 2020’ और ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक – 2020‘ के विरोध ने ‘न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य’ (एमएसपी) को कानूनी रूप देने से लगाकर ‘संविदा खेती’ तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन क्‍या सरकार को अपने ही फैसलों को वापस लेने को मजबूर करने भर से कृषि के संकटों से निजात मिल सकेगी? क्‍या खेती के मौजूदा तौर-तरीके वापस इसी संकट में नहीं ले जाएंगे? मसलन-क्‍या विवादास्‍पद तीनों कानूनों को वापस लेने से देशभर में किसान आत्‍महत्‍याओं पर रोक लग जाएगी?

किसानी की बदहाली की कहानी आजादी के पहले तब से ही शुरु हो गई थी जब खेती के अतिरिक्‍त उत्‍पादन से उद्योगों को पाला-पोसा गया था। साठ का दशक आते-आते सभी के गले यह बात उतार दी गई थी कि अपनी भुखमरी के लिए अपने बेपानी-खेत और उनमें कम-से-कमतर होता उत्‍पादन जिम्‍मेदार हैं। भुखमरी की इस बदहाली पर पक्‍का ठप्पा लगाने की खातिर अमरीका से ‘पब्लिक लॉ – 480’ (पीएल-480) के तहत ‘कांस’-(जिसे ‘कांग्रेस घास’ के नाम से प्रसिद्धि मिली थी)-युक्‍त गेहूं मंगवाया गया। अमरीका का यह कानून डॉलर की बजाए भारतीय रुपयों में भुगतान करने की छूट देता था। भुखमरी के संकट के इसी दौर में विशालकाय भाखरा-नंगल की योजना बनी जिससे आधुनिक संकर गेहूं, धान आदि की पैदावार बढ़ सके। आयातित अनाज पर निर्भरता और ‘नए भारत के तीर्थ’ के दर्जे के सिंचाई बांध की पृष्‍ठभूमि में साठ के दशक में कृषि के वैश्विक ज्ञाता नार्मन बोरलाग की सीख-सलाहों पर ‘हरित क्रांति’ को खड़ा किया गया। अनाज उत्‍पादन के नाम पर गेहूं, धान उगाने वाली यह ‘हरित क्रांति’ भारी लागत के बदले भारी पैदावार को बढ़ावा देती थी।

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विडम्‍बना यह थी कि ना तो भुखमरी और ना ही सिंचाई और उत्‍पादन में कोई कमी थी जिसके लिए दुनियाभर से कर्जों और अनुदानों के बल पर विशालकाय सिंचाई परियोजनाएं और आधुनिक तकनीक क्रियान्वित की जाएं। आजादी के शुरुआती सालों में भुखमरी की वजहों पर अर्मत्‍य सेन सरीखे ख्‍यात अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि उन दिनों की भुखमरी की वजहें अनाज की कमी की बजाए योजनागत राजनीति की गफलतें थीं। बंगाल के भीषण अकाल पर तो अब साफ उजागर हो गया है कि इसकी वजहें तत्‍कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्‍सटन चर्चिल की अमानवीय, कूटनीतिक चालें थीं। ठीक इसी तरह ‘मन्‍थन अध्‍ययन केन्‍द्र’ के श्रीपाद धर्माधिकारी, स्‍वाती शेषाद्री, रेहमत मंसूरी और मुकेश जाट का भाखरा-नंगल परियोजना का अध्‍ययन बताता है कि वहां उस जमाने में सिंचाई और उसके चलते होने वाले उत्‍पादन में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसकी वजह से उन्‍हें बढ़ाने की जरूरत हो।

पचास और साठ के दशकों के इन कृषि सुधारों ने ‘हरित क्रांति’ के क्षेत्रों में अव्‍वल तो उत्‍पादन में खासी बढौतरी की। बढ़े उत्‍पादनों के कारण उनकी कीमतों पर नियंत्रण रखने की खातिर ‘न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य’ (एमएसपी) की अवधारणा अस्तित्‍व में आई। दूसरे, आधुनिक कही जाने वाली इस खेती में लागत-निवेश बढ़ गया। इस बढे लागत-निवेश के चलते किसानों को कर्जों की चपेट में फंसना पडा। तीसरे, ‘हरित क्रांति’ ने सीमित नस्‍लों के अनाजों को प्राथमिकता दी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी-उत्‍तरप्रदेश, मध्‍यप्रदेश, आंध्रप्रदेश जैसे ‘हरित क्रांति’ के इलाकों में तो केवल गेहूं, धान और कभी-कभार मक्‍का पैदा की गईं। तरह-तरह के रासायनिक खाद-दवाओं-कीटनाशकों से लदी-फंदी भारी लागत वाली इस आधुनिक खेती ने एक तरफ तो जरूरत से ज्‍यादा उत्‍पादन दिया और दूसरी तरफ, किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम नहीं मिलने दिए। नतीजे में एक तरफ, लाखों टन अनाज खुले मैदानों में सडता रहा और दूसरी तरफ, किसान अपनी फसलों, खासकर फलों-सब्जियों-दूध आदि को खुले आम सडकों पर फैंकने लगे। इसी तरह एक तरफ, भंडारण के आभाव में करीब दस फीसदी उत्‍पादन कीट-पतिंगों और चूहों को होम होने लगा और दूसरी तरफ, खरीदने की क्षमता नहीं होने के कारण देशभर में तीखी भुखमरी बढ़ी।

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किसान और किसानी की इस बदहाली में नीति-निर्माताओं और सत्‍ताधारियों की उन मान्‍यताओं ने और रंग चढाया जिनके मुताबिक किसानों की बदहाली कम उत्‍पादन, बाजारों से दूरी और कृषि-क्षेत्र पर अधिक दबाव के कारण हो रही है। नतीजे में सरकारी स्‍तर पर इसी तर्ज की योजनाएं बनी और क्रियान्वित की गईं। बेंगन, सरसों सरीखी फसलों के भरपूर उत्‍पादन के बावजूद उनका उत्‍पादन बढ़ाने के लिए ‘बीज संवर्धन’ (जीनेटिकली मॉडाफाइड) तकनीक से तैयार बीजों को परोसा गया। साल-दर-साल कृषि-क्षेत्र और बोनी बढ़ाकर उत्‍पादन में गैर-जरूरी इजाफा किया गया। किसानी से कोसों दूर बैठे व्‍यापारियों, बिचौलियों को बाजार बढ़ाने-फैलाने और मुनाफा कमाने की खुली छूट दी गई। इस गोरखधंधे में बात यहां तक आ गई कि कृषि-क्षेत्र का दबाव कम करने की खातिर बडे पैमाने पर खेतिहर आबादी को उद्योगों के हवाले किया जाने लगा। सन् 1996 में विश्‍वबैंक ने इन नीतियों की तस्‍दीक की और फिर 2005 में रिमॉइन्‍डर भेजकर गांवों को शहरों में हकालने की चेतावनी दी। कांग्रेस, भाजपा सरकारों के सभी वित्‍तमंत्रियों को गांवों और ग्रामीण आबादी की लगातार होती कमी और शहरी ‘मलिन’ बस्तियों की बढ़ती आबादी ने खुश किया।

जाहिर है, इन और ऐसी ही अनेक गफलतों को सुलझाने की खातिर इन नीतियों, योजनाओं पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। मसलन – आंदोलनरत किसानों को उन 94 फीसदी लघु और सीमांत किसानों को भी अपनी लडाई से जोडना होगा जिन्हें ‘शांताकुमार समिति’ के अनुसार ‘एमएसपी’ और मंडी से कोई लेना-देना नहीं होता। ‘नीति आयोग’ के कृषि विशेषज्ञ रमेश कुमार ने लघु और सीमान्‍त किसानों को लेकर एक अध्‍ययन किया है जिसकी अनुशंसाओं में अनेक बेहद महत्‍वपूर्ण हैं और उन पर विचार करना जरूरी है। आज देशभर का किसान कृषि संबंधी कानूनों को लेकर सडकों पर उतरा है, लेकिन क्‍या उसका संघर्ष देश के तीन-चौथाई से अधिक किसानों की बात भी सुन रहा है? क्‍या वे भी उनके संघर्ष में शामिल हैं? यह मौका है जब हम अपनी खेती का खाका बदलने की शुरुआत कर सकते हैं। यदि यह नहीं हुआ, तो किसानों की यह लडाई भी आधी-अधूरी ही रह जाएगी। (सप्रेस)

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