लखीमपुर खीरी की घटना हैवानियत की मिसाल है- सर्व सेवा संघ का प्रस्ताव

सेवाग्राम । सर्वोदय समाज की शीर्षस्‍थ संस्‍था सर्व सेवा संघ ने गांधी की 152 वीं जयंती के दूसरे ही दिन 3 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना हैवानियत की मिसाल है। संघ के अध्‍यक्ष वरिष्ठ सर्वोदय नेता चंदन पाल ने कहा कि इस घटना ने हम सबों को झकझोर कर रख दिया है। सर्व सेवा संघ और देश भर के गाँधीजन विचलित एवं मर्माहत हैं और सभी पक्षों के मृतकों के परिजनों के अपार दुख में शामिल हैं।

उन्‍होंने कहा कि यह वारदात असंवेदनशीलता,बर्बरता और अमानयीय क्रूरता का चरम उदाहरण है। इस हत्याकांड में केंद्र की भाजपा सरकार के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा व उनके पुत्र आशीष मिश्रा की प्रत्यक्ष संलिप्तता संविधान, कानून के शासन के सिद्धांत, इंसानियत और सत्ता की गरिमा का निर्लज्ज उल्लंघन है।

सर्व सेवा संघ ने यहां पारित प्रस्‍ताव में कहा कि इस इलाके के किसान उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कार्यक्रम का विरोध करने और काले झंडे दिखाने के लिए इकट्ठा हुए थे। जब उन्हें पता चला कि उनके आने का मार्ग बदल दिया गया है, तब वे लौटने लगे। खबर है कि इसी समय मंत्री पुत्र आशीष मिश्रा अपने गाड़ियों के काफिले के साथ तेज रफ्तार में दनदनाते हुए आए और किसानों को रौंदते हुए उनपर गाड़ियां चढ़ा दीं जिसमें 4 किसानों की मौके पर ही मौत हो गई। क्षोभ और गुस्से की प्रतिक्रिया में किसानों की ओर से जो हिंसा हुई, उसमें भी 4 लोग मारे गए। इस हादसे में एक स्वतंत्र पत्रकार रमन कश्यप की भी मृत्यु हो गई। इन मौतों के जिम्मेवार मंत्री पुत्र और उनके संरक्षक पिता हैं।

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अध्‍यक्ष चंदन पाल ने कहा कि इस घटना के खिलाफ पूरे देश में प्रतिवाद शुरू हो गया। जब किसान और विरोधी पक्ष के नेता लखीमपुर खीरी जाना चाहे, तो उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से हिरासत में ले लिया गया और रोका गया। किसी की मौत के बाद उसके घर जाकर संवेदना प्रकट करना भारतीय परंपरा का अंग है। साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को अपनी राय या प्रतिवाद जाहिर करने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन सरकार की दमनकारी कार्रवाई न केवल मनमानी है बल्कि दोषियों को बचाने की कवायद भी है।

सर्व सेवा संघ ने केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया है कि किसानों के साथ टकराव का रास्ता छोड़कर बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशे। सबसे जरूरी है कि तीनों कृषि कानूनों को तत्काल वापस लिया जाए। साथ ही किसानों, नागरिकों, सामाजिक संगठनों एवं राजनैतिक दलों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित किया जाये। संघ ने किसानों से भी निवेदन किया हैं कि वे अब तक जिस प्रकार शांति एवं अहिंसा के रास्ते पर कायम रहे हैं, उसी प्रकार उसपर अडिग रहे, क्योंकि किंचित विचलन भी आत्मघाती साबित हो सकता है।

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