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सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

शिक्षा : ‘एड-टेक’ की उठा-पटक !

प्रेरणा

शिक्षा,खासकर बुनियादी शिक्षा समाज और सरकार की नजरों में लगातार गैर-जरूरी होती जा रही है। इस बदहाली का लाभ उठाने के लिए अनेक निजी कंपनियां खडी हो रही हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य भरपूर मुनाफा कूटना होता है। ऐसे में विद्यार्थियों और व्यापक समाज का क्या होगा? विज्ञापनों में शिक्षा के प्रति समर्पित बताई जाने वाली कंपनियां आखिर विद्यार्थियों को कितना सक्षम बना पाती हैं?

शिक्षा जगत में कोहराम मचा है। कोहराम इसलिए नहीं मचा है कि सरकारी विद्यालय बंद हो रहे हैं कि योग्य शिक्षक नहीं मिल रहे हैं। कोहराम इस पर भी नहीं मचा है कि स्कूल हों या कॉलेज या कोचिंग संस्थान, सब मिलकर समाज में शिक्षा नहीं, नफरत के बीज बो रहे हैं। प्रतिभावान विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में नाकाम होकर आत्महत्या कर रहे हैं, यह भी कोहराम का विषय नहीं है। शिक्षा जगत में शिक्षा के किसी पहलू को लेकर कोई कोहराम नहीं है। कोहराम मचा है, ‘एड-टेक’ यानि ऑनलाइन शिक्षा की दुनिया में ! एजुकेशन का ‘एड’ और टेक्नॉलॉजी का ‘टेक।’ वहां भूचाल आया हुआ है – क्या विद्यार्थी, क्या शिक्षक और क्या अभिभावक सभी ऊब-डूब हो रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा में क्रांति लाने वाली कंपनी ‘बायजूस’ दिवालिया हो गयी है। ऑनलाइन जगत के दो ‘बड़े लोग’ – संदीप महेश्वरी और विवेक बिंद्रा के बीच तलवार खिंची हुई है। विवेक बिंद्रा हजारों रुपये की फीस लेकर उद्योगपति बनने का गुर सिखाता ऑनलाइन कोर्स चलाते हैं। दूसरी तरफ संदीप महेश्वरी हैं जो यूट्यूब पर ज्ञान बांटते हैं। इन दोनों के मिलाकर साढ़े चार करोड़ सब्सक्राइबर हैं। आपको याद ही होगा कि संदीप महेश्वरी कभी विवेक बिंद्रा को अपने चैनल पर बुला-बुलाकर हमारे बीच प्रतिष्ठित कर रहे थे; अब वे ही संदीप हमें बता रहे हैं कि विवेक बिंद्रा कितने बड़े धोखेबाज हैं ! मेरे लिए बायजूस, संदीप और विवेक तीनों एक ही समस्या के कई चेहरे हैं।

समस्या क्या है? एक अध्ययन के मुताबिक़ भारत में शिक्षा की उम्र के लगभग 24 करोड़ बच्चे हैं। 12वीं तक आते-आते इनकी संख्या 16 लाख रह जाती है और स्नातक तक यह संख्या घटकर 10 लाख तक पहुंचती है। उत्तरोत्तर घटती विद्यार्थियों की संख्या एक समस्या है तो दूसरी समस्या यह है कि भारत की शिक्षा-व्यवस्था कमोबेश खत्म हो चुकी है। सरकारी स्कूल बंद किये जा रहे हैं, योग्य शिक्षक नहीं हैं। कोचिंग का बिजनेस जितना भी फल-फूल रहा हो, परिक्षाएं हो नहीं रहीं,  पर्चे लीक हो रहे हैं। प्रतिभावान और आर्थिक रूप से सक्षम नौजवान शिक्षा और रोजगार के लिए विदेश जा रहे हैं। जिनके लिए विदेश संभव नहीं है, वे सब प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग के चक्रव्यूह में फंसे हैं। बाकी रह गए 23,90,00000 नौजवान ! वे कहां हैं, क्या करते हैं, कैसे जीते-मरते हैं, इसकी चर्चा कभी-कहीं नहीं होती।

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ऐसे समय में सामने आए रवींद्रन बायजू! बायजू इंजीनियरिंग के प्रतिभावान छात्र थे। 2006 में अपने ही आसपास के कुछ युवाओं को उन्होंने पढ़ाना शुरू किया और फिर 2011 में ‘बायजूस’ नामक कंपनी शुरू की जिसका काम ही ऑनलाइन शिक्षा देना था। वे निवेशकों को यह समझाने में कामयाब हुए कि शिक्षा का उनका मॉडल देश की टूटी-बिखरी शिक्षा-व्यवस्था में जरूरी क्रांति लाएगा। उनका दावा था कि देश के दूर-दराज इलाकों में, जहां न स्कूल हैं, न योग्य शिक्षक, शिक्षा पहुंचाने का काम उनका मॉडल ही कर सकता है। वे कहते थे : ‘सोचिए न, दुनिया का सबसे नौजवान देश भारत यदि अपने युवाओं को योग्य शिक्षा देने लगे तो विकास की दुनिया में कहां पहुंच जाएगा !’ रवींद्रन साहब का यह सपना खूब बिका – देश- दुनिया के कई बड़े निवेशकों ने ‘बायजूस’ की झोली में पैसा उड़ेल दिया।

‘बायजूस’ क्लासेज तेजी से खुलने लगीं; बात फैलने लगी ! कोविड के दौरान जब सब कुछ बंद था, ‘बायजूस’ खुला रहा, खुलता रहा। उसका दानवाकार तैयार हो गया, लेकिन गुलजार साहब ने लिखा है न : ‘वक्त रहता नहीं कहीं टिककर;’ तो ‘बायजूस’ का वक्त भी कैसे टिका रहता ! बताया गया कि जिस समय ‘बायजूस’ की कमाई 3,500 करोड़ थी, उसका घाटा 2,250 करोड़ था। पिछले दिनों यह सच्चाई चर्चा में आई कि ‘बायजूस’ का बिजनेस मॉडल इस कदर नुकसान कर रहा है कि रवींद्रन को अपना घर गिरवी रखना पड़ा है, लेकिन हमारी क्रांतिकारी सरकार लुटे-पिटे रवींद्रन-मॉडल की तरफ दौड़ रही है। उसका शिक्षा-मॉडल यह है कि छोटे-छोटे स्कूलों को बंद करो, ऑनलाइन क्लास को खूब बढ़ावा दो !

दूसरी तरफ हैं विवेक बिंद्रा, जो ऑनलाइन गुरु हैं। नौजवानों को 10 दिन में ‘एमबीए’ कराने का दावा करते हैं; प्रति माह लाखों कमाने की तरकीब सिखाते हैं। उनके ऑनलाइन कोर्स की फी हजारों में है तो लाखों में उनके सब्स्क्राइबर हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि विवेक बिंद्रा करोड़ों की कमाई करते हैं। संदीप महेश्वरी को इससे गहरा एतराज है। वे बिंद्रा को एक्सपोज करने में जुटे हैं। वे कहते हैं कि बिंद्रा के कोर्स से कोई कमाई नहीं हो रही है; कमाई कराने के लिए बिंद्रा सबको उनका कोर्स ही दूसरों को बेचने के लिए कह रहे हैं।

शिक्षा की ऑनलाइन दुनिया में जो हो रहा है, दरअसल वही हमारी असल जिंदगी में भी हो रहा है। शिक्षा का मतलब क्या है; शिक्षा कैसी हो और कैसे दी जाए आदि सवाल अब कोई पूछता नहीं है। सब पूछते हैं कि शिक्षा से कमाई कैसे होगी व कितनी? यही तो बिंद्रा, संदीप और रवींद्रन भी बता रहे थे; और यही हमारी पुराणपंथी सरकार की नई शिक्षा-नीति भी बता रही है। बगैर कोई सवाल पूछे अंग्रेजी राज चलाने वाले नौकरों की खोज में से निकली थी, यह शिक्षा-नीति ! उसे ही बिंद्रा-संदीप-रवींद्रन-मोदी सब जारी रखना चाहते हैं।

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‘मेक इन इंडिया’ जैसे फैंसी नारों के भीतर का सच यह है कि दुनिया भर की फैक्टरियां चलाने के लिए थोड़े-बहुत पढ़े-लिखे, पर सस्ते मजदूर मिलते रहें। ये फैक्ट्रियां भी ऐसी हों कि जिनमें मजदूरों की जरूरत कम-से-कम होती जाए। आदमी की जगह कम्प्यूटर और रोबोट की अधिकाधिक मदद कैसे मिलती रहे, इसकी खोज में हमारे समाज के बेहतरीन दिमाग जुटे रहें तथा कृत्रिम मेधा – आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस- का काम आगे-से-आगे बढ़ाया जाता रहे।

बिंद्रा-संदीप-रवींद्रन-मोदी लगाएं-न-लगाएं, हम सब तो जरा दिमाग लगाएं। खुद लखपति-करोड़पति बनने के लिए हजारों बिंद्रा-संदीप-रवींद्रन-मोदी अपनी-अपनी कोचिंग चला रहे हैं। कोचिंग का मतलब शिक्षा नहीं है। हम शिक्षा और शिक्षण का महत्त्व आज भी समझ नहीं पा रहे हैं। गुलाम भारत में ही गांधीजी ने आजाद भारत की शिक्षा का खाका बनाना शुरू कर दिया था। उनसे प्रेरणा पाकर चीन में माओ ने ‘हाफ-हाफ स्कूल’ बनाए जिनमें शिक्षा और उत्पादन को बराबर का महत्व दिया। चीन को गुलामी की मानसिकता से बाहर लाने में शिक्षा की इस नई संकल्पना का बड़ा हाथ था।  

नई तालीम की शिक्षा-पद्धति में गांधीजी तीन ‘द’ के विकास की बात कहते हैं – देह, दिमाग और दिल। देह का विकास मतलब श्रम के प्रति सम्मान का भाव रखने वाला स्वस्थ और मजबूत शरीर ! हाथ हिलाने का श्रम भी हम न करें तो चेहरे पर बैठी मक्खी भी भगा नहीं सकते। श्रम इतना जरूरी और स्वाभाविक है कि इसका फल तुरंत मिलता है। जो सभ्यता, शैली, अविष्कार या यंत्र हमें इस श्रम से दूर ले जाता है, वह अहितकारी है, त्याज्य है, मानव विरोधी है, लेकिन श्रम विवेकशून्य नहीं होना चाहिए। जहां जब, जितना और ज़रूरी हो, वहां तब, उतना श्रम करना चाहिए। श्रम बड़ा या छोटा नहीं होता, वह ज़रूरी होता है।

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इस समझ को बनाने के लिए दिमाग का तार्किक विकास जरूरी है। इतना ही जरूरी है, मानवीय संवेदनाओं का विकास। इस मामले में हम जिस तरह चूके हैं, उसका ही नतीजा भुगत रहे हैं। ऐसी शिक्षा हो तो हम कह सकेंगे कि बायजू, बिंद्रा, संदीप, मोदी करोड़ों लेकर अपने घर जाइए, हमारे पास पर्याप्त संतोष-धन है जिसके लिए रहीम कह गए हैं : ‘जब आवे संतोष-धन, सब धन धूरि समान !’ कोई बताए, इससे बड़ी शिक्षा-नीति क्या हो सकती है? (सप्रेस)

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