सचमुच वे गुमनाम नींव की ईंटें भी प्रणम्य हैं

अजय कुमार पाण्डेय

किसी व्यक्ति की महानता उसके समय, परिवेश और परिजनों पर भी निर्भर करती है। महात्मा गांधी को भी अपने सबसे बड़े भाई से ऐसा साथ, सहयोग, सहायता मिलती रही।

बुलन्द इमारत पर रीझना स्वाभाविक है, लेकिन नींव की वे ईंटें भी धन्य हैं जिन्होंने इमारत को बुलन्दी देने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। अपने को दुनिया की नजरों से ओझल कर लिया। सारा भार वहन करके भी आह तक नहीं की। उल्टे इमारत को मजबूती देना अपना फर्ज समझा। कभी श्रेय लेने की होड़ नहीं की। सचमुच वे गुमनाम नींव की ईंटें भी प्रणम्य हैं।

ऐसी ही एक ईंट का नाम है, लक्ष्मीदास। करमचन्द गाँधी अथवा कबा गाँधी के एक-के-बाद-एक, यों कुल चार विवाह हुए थे। अन्तिम पत्नी पुतलीबाई से एक कन्या और तीन पुत्र हुये थे। कन्या रलियत की शादी वृन्दावन दास से हुई। मोहनदास करमचन्द गाँधी सबसे छोटे थे। लक्ष्मीदास, करसन और मोहनदास, तीनों भाई एक ही स्कूल में पढ़ते थे। बड़े भाई लक्ष्मीदास के प्रति गाँधी जी की अपार श्रद्धा थी। लक्ष्मीदास का भी  गाँधी जी के प्रति प्रेम पिता के समान था। वे अपनी अन्तिम साँस तक गाँधी जी की मदद करते रहे।

गाँधी परिवार के पुराने मित्र और सलाहकार एक विद्वान ब्राहमण मावजी दवे थे। पिता करमचन्द गाँधी के स्वर्गवास के बाद वे गाँधी जी के घर आये। लक्ष्मीदास के साथ बातचीत में उन्होंने परामर्श दिया कि मोहनदास को विलायत भेजा जाय, ताकि दीवानगिरी का प्रतिष्ठापूर्ण पद पुनः परिवार में आ सके। लक्ष्मीदास सोच में पड़ गये। पैसा कहाँ से आयेगा? जहाँ से मदद की उम्मीद थी, वहाँ से निराशा मिली, लेकिन बड़े भाई ने रूपयों का प्रबन्ध करने का बीड़ा उठाया। उनकी उदारता की सीमा न थी। पैसों का इन्तजाम हुआ। इंग्लैण्ड जाने के लिए बड़े भाई के साथ मोहनदास बम्बई आये। बम्बई में परिचितों ने जून-जुलाई में लन्दन यात्रा के लिए मना किया। यह सागर में तूफान का समय होता है। लक्ष्मीदास बम्बई में अपने मित्र के घर मोहनदास को छोडकर राजकोट वापस चले गये।

इसी बीच मोहनदास के विलायत जाने की खबर जाति वालों को लगी। पंचायत बुलायी गयी और उन्हें विलायत जाने से मना किया गया। मोहनदास ने पंचायत के निर्णय को नहीं माना तो पंचायत ने उन्हें जाति बहिष्कृत कर दिया। सगे बहनोई वृन्दावन दास भी पंचायत के निर्णय से डर गये, लेकिन बड़े भाई दृढ़ रहे और उन्होंने मोहनदास को लिखा कि जाति के निर्णय के बावजूद विलायत जाने से मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। चार सितम्बर, 1888 को एक जहाज रवाना होने वाला था। उससे यात्रा के लिये बड़े भाई की इजाजत मिल गयी, किन्तु जातिच्युत होने के डर से लक्ष्मीदास द्वारा दिये गये पैसे भी बहनोई ने देने से इन्कार कर दिया। ऐसी स्थिति में पुनः भाई के नाम पर ही एक परिजन ने पैसा उपलब्ध कराया। मोहनदास ने टिकट खरीदा और विलायत रवाना हुये। उस समय उनकी उम्र लगभग 18 वर्ष थी। 

विलायत में रहने के दौरान थोड़े समय के लिए मोहनदास में ‘सभ्यता’ सीखने की ललक पैदा हुयी और उन्होंने छिछला रास्ता पकड़ा। जहाँ शौकीन लोगों के कपड़े सिले जाते थे, वहीं मोहनदास ने भी कपडे़ सिलवाये। ‘‘चिमनी‘‘ टोपी सिर पर पहनी। नाचना सीखा। वायलिन खरीदा। सभ्य बनने की यह सनक तीन महीने तक चली। स्वाभाविक है इस पर खर्च आया होगा। ये सभी खर्च बडे़-भाई को वहन करना होता था। मंझले करसन भाई से कोई मतलब नहीं था। मोहनदास की पत्नी एवं उनका कुछ माह का छोटा बच्चा,सबकी देखभाल भी लक्ष्मीदास को करनी थी। सभ्य बनने के दौर में ही मोहनदास ने बादशाही दिलवाले बडे़-भाई से दोनों जेबों में लटकाने लायक सोने की एक बढ़िया चेन मँगवायी। बडे़-भाई ने उसे भी उपलब्ध करवाया।

लगभग तीन वर्ष बाद मोहनदास जब विलायत से लौटे तो बम्बई बन्दरगाह पर बडे़-भाई मौजूद थे। वे छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते थे। माताजी के देहावसान की खबर विलायत में उन्होंने इसलिए नहीं दी कि मोहनदास को आघात न लगे। घर पहुँचने पर उनको इसकी खबर दी गयी।

बडे़-भाई को पैसे का, कीर्ति का और पद का बहुत लोभ था। मोहनदास के विलायत से लौटने के कारण उन्होंने बड़ी-बड़ी आशायें बाँध रखीं थी। उनका दिल बादशाही था। गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उदारता उन्हें फिजूलखर्ची की हद तक ले जाती थी। उन्होंने मान लिया था कि इंग्लैण्ड से बैरिस्ट्री पढ़कर छोटा भाई आयेगा तो खूब पैसा कमायेगा। इसी उम्मीद में उन्होने घर खर्च बढ़ा लिया था। चीनी मिट्टी के बरतन आ गये। चाय, काफी के बाद कोको भी बढ़ गया। बूट-मोजा और कोट पतलून भी घर में आ गया। खर्च बढ़ा। नवीनतायें आयीं पर खर्च की धनराशि का स्रोत कहीं नहीं था। सारा भार बड़े भाई के कंधों पर पड़ा। यहाँ तक की गाँधी की वकालत के लिए मुवक्किल खोजना, राजकोट से बम्बई वकालत के लिए सारी व्यवस्था करना भी बड़े भाई के ही जिम्मे था।

अभी जाति का झगड़ा मौजूद ही था। जाति में लेने को लेकर दो पक्ष हो गये थे। एक पक्ष, जो गाँधी जी को जाति में लेने के लिए सहमत हो गया था, उसे राजकोट पहुँचने पर लक्ष्मीदास ने जातिभोज दिया। गाँधी जी को इसमें कोई रूचि नहीं थी। बड़े भाई का अपने प्रति अगाध प्रेम देखकर गाँधी जी की सहमति बन गई। गाँधी जी की उनके प्रति भी अगाध भक्ति थी।

इन तमाम प्रयासों में खर्चा बढ़ रहा था। आमदनी कुछ भी नहीं थी। फिर वकालत न चलने के कारण निराशा की स्थिति में गाँधी जी को बम्बई से राजकोट वापस आना पड़ा। वहाँ बडे़-भाई के ही प्रयास से गरीब मुवक्किलों के अर्जी-दावे लिखने का काम मिलता था। थोड़ी आमदनी हो जाती थी किन्तु अनुपात में खर्च ज्यादा था। भाई को ही लेकर एक अंग्रेज अधिकारी से गाँधी जी का विवाद हो गया। फलस्वरूप दोनों भाई दुःखी रहने लगे।

इसी बीच गांधी जी के लिए लक्ष्मीदास के पास एक प्रस्ताव आया। दक्षिण अफ्रीका जाना था। निवास तथा भोजन के खर्चे के अतिरिक्त सालभर में 105 पौण्ड मिलेगा। गाँधी जी प्रसन्न हो गये। उनके मन में विचार आया, भाई को 105 पौण्ड भेजूँगा तो घर का खर्च चलाने में कुछ मदद मिलेगी। अप्रैल 1893 में अपना भाग्य आजमाने के लिए गाँधी जी अपनी पत्नी और दो बच्चों का भार फिर अपने बडे़-भाई को सौंपकर दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए। 

विवशता में गाँधी जी नौकरी करने दक्षिण अफ्रीका गये। बाद में परिस्थितियाँ बदलीं। गाँधी महात्मा बनने लगे। पैसे तो हजारों पौण्ड में आने लगे, लेकिन अब उनका परिवार बड़ा होने लगा। उन्हीं के शब्दों में पितृतुल्य भाई को लिखा- ‘‘आज तक तो मेरे पास जो बचा, वह मैंने आपको अर्पण किया। अब मेरी आशा आप छोड़ दीजिये। अब जो बचेगा यहीं, हिन्दुस्तानी समाज के हित में खर्च होगा।’’

गाँधी जी आगे लिखते हैं, ‘‘भाई ने मेरी आशा छोड़ दी। एक प्रकार से बोलना ही बन्द कर दिया। पर जिसे मैं अपना धर्म मानता था, उसे छोड़ने से कहीं अधिक दुःख होता था। मैने कम दुःख सहन कर लिया। फिर भी भाई के प्रति मेरी भक्ति निर्मल और प्रचण्ड बनी रही। भाई का दुःख उनके प्रेम में से उत्पन्न हुआ था। उन्हें मेरे पैसों से अधिक आवश्यकता मेरे सद्व्‍यवहार की थी।’’

गाँधी अपने पितृतुल्य भाई के लिए फिर लिखते हैं, ‘‘अपने अन्तिम दिनों में भाई पिघले। मृत्युशय्या पर पड़े-पड़े उन्हें प्रतीति हुई कि मेरा आचरण ही सच्चा और धर्मपूर्ण था। उनका अत्यन्त करूणाजनक पत्र मिला। यदि पिता पुत्र से क्षमा माँग सकता है, तो उन्होंने मुझसे क्षमा मांगी। उन्होंने लिखा कि मैं उनके लड़कों का पालन-पोषण अपनी रीति-नीति के अनुसार करूँ। स्वयं मुझसे मिलने के लिए वे अधीर हो गये। मुझे तार दिया। मैने तार से ही जवाब दियाः ‘‘आ जाइये‘‘। पर हमारा मिलना बदा न था।’’(सप्रेस)

श्री अजय कुमार पाण्डेय राष्ट्रीय युवा योजना से संबंद्ध सामाजिक कार्यकर्त्‍ता हैं।

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