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जंतर-मंतर से उठी नई लोकतांत्रिक चेतना की बयार

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जंतर-मंतर पर उभरा युवा आंदोलन भारतीय लोकतंत्र में नई आशा का संकेत है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इस संघर्ष की मंजिल नहीं, बल्कि एक नए दौर का आरंभ है। यदि यह आंदोलन शिक्षा सुधार के साथ रोजगार, पर्यावरण, समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रश्नों को जोड़े रखता है, तभी इसकी ऐतिहासिक सार्थकता सिद्ध होगी।


इतिहास में कुछ इस्तीफे केवल पद परिवर्तन नहीं होते, वे समाज की बदलती चेतना के दस्तावेज बन जाते हैं। जंतर-मंतर पर चले युवा आंदोलन के बाद देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी ऐसी ही एक घटना है। यह उन युवाओं को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने समतामूलक शिक्षा और व्यवस्था परिवर्तन की मांग को लेकर संघर्ष किया। लेकिन इसे अंतिम जीत मान लेना भूल होगी, क्योंकि परिवर्तन की असली यात्रा अभी शुरू हुई है।

हम जंतर-मंतर के जन आंदोलन को एक जन सत्याग्रह की तरह देखते हैं और सत्याग्रह में कोई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। लेकिन भारत के युवाओं ने जिस शालीनता से, जिस सादगी से सरकार के सिपाहियों और पुलिस द्वारा किए गए दुश्मनी भरे व्यवहार को भी सम्मान सहित जिया, ऐसा भारत में ही संभव है।

मैं भारत के युवाओं को अभिवादन करना चाहता हूँ, सलाम करना चाहता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि अभी इस आंदोलन की सफलता की बहुत-सी सीढ़ियाँ चढ़नी बाकी हैं। आपने जो एक बड़ी सफलता पाई है, उसके लिए आप सभी बधाई के पात्र है। । लेकिन आप बेरोजगारी से आजादी चाहते हैं। आप जलवायु परिवर्तन के संकट से आजादी चाहते हैं। आप बीमारी से आजादी चाहते हैं। आप प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण से आजादी चाहते हैं। आप भ्रष्टाचार से आजादी चाहते हैं। आप पेपर लीक से आजादी चाहते हैं। आपकी आजादी के आंदोलन के बहुत सारे कदम हैं। मुझे विश्‍वास है कि आप उन कदमों पर गहन विचार कर रहे होंगे।

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मैं 17 जुलाई से निरंतर जंतर-मंतर आता रहा और बिना किसी को अपनी उपस्थिति दर्ज कराए देखता रहा। यह देखता रहा कि आप लोगों ने जिस तरह स्वस्फूर्त, सादगी और सहजता से अपने आंदोलन को सफलता दिलाई, वह सफलता देखकर मेरी आँखें कई बार नम हुईं। और आँखों का नम होना इसलिए कि मैं भारत के युवाओं को ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ का शिकार मान रहा था। लेकिन इस आंदोलन में मैंने भारत के युवाओं के अंदर ‘प्राकृतिक बुद्धिमत्ता’ देखी। उनकी भावात्मक बुद्धिमत्ता देखी। उस बुद्धिमत्ता ने मेरे भीतर युवाओं के प्रति अगाध विश्वास पैदा किया।

पचास साल पहले मैं संपूर्ण क्रांति आंदोलन का एक सक्रिय सिपाही रहा था और फिर उसे छोड़कर राजस्थान में लोगों से सीखकर पर्यावरण और जल संरक्षण का काम जीवन भर करता रहा। उस आंदोलन में बहुत अच्छे लोग थे, लेकिन वे दलगत राजनीति के शिकार हो गए थे। मुझे इस आंदोलन की सफलता इस बात में दिखाई दी कि दलगत राजनीति युवाओं के आंदोलन के आगे नहीं थी, पीछे थी। युवाओं का आंदोलन आगे था और दलगत राजनीति की ताकत पीछे थी। इसलिए पीछे से दलगत राजनीति ने युवाओं के आंदोलन को सबल बनाया, सफल बनाया, हिम्मत दी और किसी ने इस आंदोलन को हाइजैक करने की कोशिश नहीं की। नहीं तो मैंने देखा है कि दलगत राजनीतिक लोग ऐसे आंदोलनों को अपनी पार्टी का आंदोलन बना लेते हैं। लेकिन इस आंदोलन को कोई ‘हाइजैक’ नहीं कर सका। इसलिए इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यही है। दूसरा, जिस अनुशासन ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यह कि पुलिस की हिंसा, पुलिस के डंडों और कहा जाता है कि 21 विद्यार्थियों की जान जाने के बावजूद भी इस भीड़ ने अपना सब्र नहीं तोड़ा। यह भीड़ अनुशासित बनी रही और अनुशासन के साथ-साथ निर्भीक भी बनी रही।

इस आंदोलन में आए हुए लोग भीड़ के लोग नहीं थे। वे अपने साध्य के लिए प्रतिबद्ध थे। साध्य में सफलता पाने के लिए साधना कर रहे थे और साधना में साधनों की शुद्धि का बहुत ख्याल रखा इन युवाओं ने। इसलिए मैं इस आंदोलन को भारत का एक ऐतिहासिक आंदोलन मानता हूँ, जो बँटे हुए, डरे हुए और धार्मिक द्वंद्वों से घिरे हुए वातावरण को सुधारने की पहल कर सका। यह युवा आंदोलन सचमुच एक तरह से भारत की आजादी के आंदोलन से बहुत मेल खाता है।

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महात्मा गांधी ने अंग्रेजों और अंग्रेजियत से आजादी दिलाने का आंदोलन शुरू किया था, जिसमें देश भर के सभी समुदायों, सभी धर्मों और सभी जातियों के लोग जुड़ गए थे। इसी प्रकार इस युवा आंदोलन में भी सभी धर्मों और सभी जातियों के लोग शामिल हुए और पूरे अनुशासन के साथ इस आंदोलन को चलाने में योगदान दिया। इस आंदोलन का संचालन युवाओं ने किया। इस आंदोलन को आरंभ से अंत तक युवाओं का आंदोलन बनाए रखा। यह इस आंदोलन की बड़ी खूबी है।

आज 25 जुलाई को आंदोलन के 35 दिन बाद भारत के शिक्षा मंत्री ने त्यागपत्र दिया। इस त्यागपत्र को आंदोलनकारियों को ऐसे देखना चाहिए कि जिन युवाओं ने अपना जीवन बलिदान दिया, शहादत दी, उन्हें यह श्रद्धांजलि है। अब हम ऐसी कोशिश करें कि यह आंदोलन अब जंतर-मंतर पर एक मंत्री के इस्तीफे से या चार मंत्रियों के इस्तीफे से खत्म न हो। यह आंदोलन और तेजी से परिवर्तन के लिए, समता के लिए, सादगी के लिए, प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण से मुक्ति के लिए, शिक्षा में पेपर लीक से मुक्ति के लिए सरकार पर दबाव बनाए रखे। और सरकार में जो और बदलाव की अपेक्षा है, वह बदलाव करने की तैयारी करे। इसलिए यह इस आंदोलन का समापन नहीं है, यह इस आंदोलन का प्रवेश बिंदु है।

महात्मा गांधी आजादी के आंदोलन में सतत एक सीढ़ी चढ़ने के बाद दूसरी सीढ़ी पर जाने की तैयारी किया करते थे। साथ ही साथ शिक्षण और रचना के काम भी करवाते थे। बापू ने रचना के काम के लिए चरखे को भारत की आजादी का बड़ा यंत्र बनाया और मैनचेस्टर कंपनी की लूट तथा प्रदूषण को रुकवाया। आज भारत में उस जमाने की मैनचेस्टर कंपनी के मुकाबले अब सैकड़ों-हजारों गुना बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियाँ भारत में ही चल रही हैं, जो भारत के समुद्रों पर, भारत के पहाड़ों पर, भारत के जंगलों पर और भारत की नदियों पर कब्जा कर रही हैं। तो क्या युवाओं को अपने भविष्य के रोजगार के लिए, प्रकृति के रक्षण और संरक्षण के लिए कोई कदम उठाना पड़ेगा?

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प्रकृति के रक्षण और संरक्षण के कदम के बिना जंतर-मंतर पर जो आजादी के नारे थे- बेरोजगारी से आजादी, बीमारी से आजादी, शिक्षा के भ्रष्टाचार से आजादी – ये आजादी के नारे सफलता की राह पर नहीं आ सकते। क्योंकि जब युवाओं को एक सफलता मिल जाती है, तो वे दूसरी सफलता के लिए बड़ी तेजी से, व्यग्रता के साथ और अपनी तीव्रता तथा त्वरा के साथ आगे के कार्यक्रम बनाते हैं।

मैं समझता हूँ कि जंतर-मंतर के आंदोलनकारी अब शांति से बैठकर आजादी के कार्यक्रम बनाएँ। अभी सरकारें जिस तरह से भारत के संविधान पर, जंगलों पर, प्रकृति पर, पहाड़ों पर और नदियों पर हमला कर रही हैं, अब इस आंदोलन के साथियों को मिल बैठकर जल्दी से चिंतन, मनन और आगे की रणनीति की शुरुआत करनी चाहिए। यह बड़ा संवेदनशील समय है। इसी समय युवाओं को अपनी गति, अपनी रीति और अपनी नीति तय करनी होगी। तब यह आंदोलन अपने साध्य की सिद्धि में ऐतिहासिक बन जाएगा।

डॉ. राजेंद्र सिंह प्रसिद्ध नदी पुनर्जीवनकर्ता और पर्यावरणविद् हैं। डॉ. सिंह तरुण भारत संघ के संस्थापक और अध्यक्ष हैं।

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