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सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विद्यार्थियों के लिए पर्यावरण

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मानसून के साथ-साथ स्कूल-कॉलेजों का खुलना और प्रकृति का पुनर्जीवित होना एक समय-चक्र की तरह है। ठीक इसी दौर में युवा विद्यार्थियों को उनके पर्यावरण से जोडने की सरकारी, गैर-सरकारी कवायदें भी की जाती हैं। पर्यावरण से जुड़े तरह-तरह के ‘दिवस,’ ‘सप्ताह’ आदि मनाए जाते हैं। तो क्या इन समारोहों से आसपास की प्रकृति में कोई बदलाव होता है? इन्हें कैसे मनाया जाएं ताकि विद्यार्थियों में पर्यावरण की चेतना का संचार हो सके?


 इन दिनों विद्यालयों में वन-महोत्सव / ईको क्‍लब के अंतर्गत पौधारोपण के विशेष अभियान चल रहे हैं। विद्यार्थी उत्साह के साथ पौधे लगा रहे हैं, उनकी देखभाल का संकल्प ले रहे हैं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं। ऐसे कार्यक्रम केवल औपचारिक गतिविधियाँ नहीं हैं, बल्कि बच्चों और युवाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के तेजी से होते दोहन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या विशेषज्ञों का विषय नहीं रह जाता। यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी बन चुका है। इस जिम्मेदारी को निभाने में विद्यार्थियों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, क्योंकि वे केवल भविष्य के नागरिक ही नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने की क्षमता भी रखते हैं।

इसके लिए पहली आवश्यकता है, विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता विकसित करना। विद्यालय इस दिशा में सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। ‘इको-क्लब,’ प्रकृति भ्रमण, पोस्टर प्रतियोगिताएँ, भाषण, वाद-विवाद, निबंध लेखन और विज्ञान प्रदर्शनियों जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को केवल जानकारी ही नहीं देते, बल्कि उन्हें पर्यावरण संरक्षण से भावनात्मक रूप से भी जोड़ते हैं। जब कोई विद्यार्थी किसी पौधे को अपने हाथों से लगाता है और उसकी देखभाल करता है, तब उसके भीतर प्रकृति के प्रति अपनापन विकसित होता है। यही अपनापन आगे चलकर जिम्मेदारी में बदलता है।

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स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, उपजाऊ भूमि, घने वन और जैव विविधता के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है, किंतु इसका प्राकृतिक संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, नदियाँ दूषित हो रही हैं, भूजल तेजी से नीचे जा रहा है और अनियोजित विकास के कारण जंगलों का दायरा सिमटता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिल रही हैं। इन समस्याओं का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है।

आज का युवा रचनात्मक सोच और तकनीकी समझ से भरपूर है। विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में वे ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जो पर्यावरण संरक्षण में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। सौर-ऊर्जा से चलने वाले मॉडल, जैविक कचरे से खाद बनाने की तकनीक, वर्षा-जल संरक्षण के सरल उपाय, कम लागत वाले जल-शुद्धिकरण मॉडल और ऊर्जा बचाने वाले उपकरणों पर विद्यार्थियों द्वारा किए जा रहे प्रयोग यह साबित करते हैं कि सही मार्गदर्शन मिलने पर वे समाज के सामने व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। कई विद्यार्थी डिजिटल माध्यमों और मोबाइल अनुप्रयोगों के जरिए लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध करा रहे हैं। तकनीक का यह सकारात्मक उपयोग भविष्य के लिए नयी आशा जगाता है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में हिमालय से लेकर समुद्र तक, घने जंगलों से लेकर मरुस्थलों तक, प्रकृति के अनेक रूप दिखाई देते हैं। इन प्राकृतिक धरोहरों की रक्षा तभी संभव है, जब समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी भूमिका निभाए। विद्यार्थी अपने स्थानीय परिवेश के अनुसार भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में वे जलस्रोतों की स्वच्छता, वृक्षों के संरक्षण और जैविक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ा सकते हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने, वर्षा जल संचयन और घर के आसपास और छतों पर हरियाली बढ़ाने जैसे प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभा सकते हैं।

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पर्यावरण संरक्षण को केवल एक ‘दिवस’ या ‘अभियान’ तक सीमित नहीं रखा जा सकता। ‘विश्व पर्यावरण दिवस,’ ‘वन महोत्सव’ या ‘पृथ्वी दिवस’ जैसे अवसर हमें प्रेरणा अवश्य देते हैं, लेकिन वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती है। पौधारोपण का महत्व तभी है, जब लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल भी की जाए। अनेक बार उत्साह में हजारों पौधे लगा दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। इसलिए प्रत्येक छात्र को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह केवल पौधा लगाएगा ही नहीं, बल्कि उसके वृक्ष बनने तक उसकी देखभाल भी करेगा।

विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है। यदि विद्यार्थियों को पुस्तकों के अध्ययन के साथ ही स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं पर ‘परियोजना कार्य’ दिए जाएँ, तो वे विषय को अधिक गहराई से समझ सकेंगे। अनुभव से प्राप्त ज्ञान हमेशा अधिक स्थायी होता है। जब विद्यार्थी स्वयं किसी नदी, जंगल, तालाब या उद्यान का महत्व समझते हैं, तब उनके भीतर प्रकृति के प्रति सम्मान स्वतः विकसित होता है। यही सम्मान उन्हें पर्यावरण संरक्षण का सच्चा सहभागी बनाता है।

यह भी आवश्यक है कि विद्यार्थी केवल दूसरों को सलाह देने तक सीमित न रहें, बल्कि स्वयं अपने व्यवहार से उदाहरण प्रस्तुत करें। यदि वे सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखें, अनावश्यक प्लास्टिक का उपयोग न करें, पानी और बिजली की बचत करें, पौधों की नियमित देखभाल करें तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें, तो उनका आचरण दूसरों के लिए प्रेरणा बनेगा। समाज में स्थायी परिवर्तन हमेशा अच्छे उदाहरणों से आता है, केवल उपदेशों से नहीं। जब बच्चे स्वयं जिम्मेदारी निभाते हैं, तो बड़े भी उनके प्रयासों का सम्मान करते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं।

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आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण संरक्षण को नैतिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया जाए। प्रकृति ने हमें जीवन के लिए आवश्यक सभी संसाधन दिए हैं। यदि हम उनका अत्यधिक दोहन करेंगे और उनके संरक्षण की चिंता नहीं करेंगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा। इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस संतुलन को बनाए रखने में छात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। धरती की रक्षा में विद्यार्थियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि प्रत्येक छात्र-छात्रा यह संकल्प ले कि वह अपने जीवन में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देगा, तो उसका प्रभाव केवल उसके परिवार या विद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज में दिखाई देगा। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं। एक पौधा लगाना केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और सुरक्षित भविष्य का आधार तैयार करना है। (सप्रेस)

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