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हमारे फुटपाथ कौन हजम कर रहा?

हमारे फुटपाथ कौन हजम कर रहा?
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आज़ादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी यदि नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ के अधिकार के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़े, तो यह हमारे शहरी विकास मॉडल की बड़ी विफलता है। न्यायालय का हालिया फैसला पैदल यात्रियों के अधिकारों को केंद्र में लाने वाला महत्वपूर्ण कदम है।


कई बार मन में यह सवाल उठता है कि क्या भारत में वाकईं ऐसे शहरी योजनाकार हैं जो नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को समझते हैं? और अगर वे मौजूद हैं भी, तो क्या वरिष्ठ नौकरशाह और राजनेता उनकी बात सुनते हैं?

यह सवाल पुन: मन में कौधा जब कुछ चिंतित लोगों ने करोड़ों भारतीय पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया. यह सोचना ही चौंकाने वाला है कि आजादी के लगभग 80 साल बाद भी भारत में फुटपाथ (पादचारी मार्ग/पथ) पर सुरक्षित रूप से चलने जैसे अत्यंत बुनियादी अधिकारों को कानूनी रूप से संरक्षित करने की मांग करनी पड़ रही है.

सर्वोच्च न्यायालय ने तुरंत फैसला सुनाया कि सुरक्षित पैदल चलना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है. न्यायालय बधाई का पात्र है कि उसने ‘गरीब’ लोगों के बारे में सोचा. गरीब या असहाय इस मायने में कि बढ़ते शहरों में फुटपाथ जैसी बुनियादी सुविधा की मांग करने की जरूरत के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे.

जब प्रधानमंत्री ने लोगों को महंगे ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करने का सुझाव दिया – दुर्भाग्य से बहुत कम लोगों ने इस पर ध्यान दिया – तो सबसे पहला विचार जो आया, वो था कार साझा करना या अधिक से अधिक पैदल चलना ताकि अपनी गाडी या दोपहिया वाहन घर पर ही रहे.
मैंने असहाय इसलिए भी कहा क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों के पास न तो पैसा है, न ही अपनी बात रखने की ताकत है और न ही ऐसी उम्र है कि वे अपने घरों से बाहर निकलते समय खुद की रक्षा कर सकें – यानी वकीलों को नियुक्त करने या महंगे वाहनों का उपयोग करने के लिए पैसा!
जैसे-जैसे भारतीय शहर तेजी से फैल रहे हैं और मुख्यमंत्रियों से लेकर उद्योगपतियों तक सभी का ध्यान शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित होता जा रहा है, वैसे-वैसे हमारे पहले से ही अव्यवस्थित और भीड़भाड़ वाले शहरों में पैदल घूमना-फिरना और भी मुश्किल होता जा रहा है.

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त्रुटिपूर्ण शहरी नियोजन एक गंभीर समस्या है जिसका सामना सभी आयु वर्ग के भारतीय कर रहे हैं. कई शहर दशकों से अपने राजनीतिक आकाओं द्वारा मास्टर प्लान की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं. नई पीढ़ी के राजनीतिक आका मतदाताओं के कल्याण की बजाय अपने परिवार के कल्याण में व्यस्त दिखते हैं. मुझे विश्वास है कि पाठक शीर्ष राजनेताओं से जुड़े विभिन्न भूमि घोटालों से अवगत होंगे.

ऐसे में, पैदल चलने की सुरक्षा को मौलिक अधिकार मानने वाले फैसले का सभी को स्वागत करना चाहिए. हालिया दशक 2015-2024 में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 20 प्रतिशत से अधिक की भयावह वृद्धि हुई है, जिसके कुछ आंकड़े उपलब्ध हैं. इसमें मोटर वाहनों से जुड़ी दुर्घटनाएं शामिल नहीं हैं, जिन्हें कम करने के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी लगातार प्रयास कर रहे हैं और असफल साबित हो रहें है.

मुझे याद है जब शहर छोटे थे, तब सीमित कर्मचारी और लगभग नगण्य डिजिटलीकरण के बावजूद उनका प्रबंधन आज की तुलना में कहीं बेहतर था. उस समय न केवल फुटपाथ लिखते थे, बल्कि शहरी प्रशासन की बेहतर पद्धतियां भी प्रचलित थीं, जब भारत में ऑटोमोबाइल क्रांति का कोई नामो निशान नहीं था. सड़कों की सफाई, पैदल यात्रियों की सुरक्षा, ट्रैफिक सिग्नलों की सुचारु व्यवस्था और पुलिस की उपस्थिति पूरी तरह से व्यवस्थित थी. क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने से पहले व्यावहारिक परीक्षाएं लेते थे, जो समय के साथ लगभग लुप्त हो गई हैं.

एक जनहित याचिका के बाद इतना छोटा लेकिन महत्वपूर्ण निर्देश जारी करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा? यही सवाल तब भी उठता है जब आप पूछते हैं कि प्रधानमंत्री के शीर्ष स्तर से स्वच्छता अभियान क्यों शुरू करना पड़ा?
इसका उत्तर है: स्थानीय निकायों और शहरी प्रबंधकों की पूर्ण विफलता.

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स्वच्छता अभियान, अतिक्रमण हटाना, प्रदूषण नियंत्रण या पदपाथों का निर्माण व रखरखाव जैसे मुद्दे नगर प्रशासन और शहरी योजनाकारों की जिम्मेदारी हैं. कुछ राज्यों में ये दो आवश्यक कार्य दो अलग-अलग विभागों के अंतर्गत आते हैं, हालांकि इनकी कमी होने पर दोनों गतिविधियां नागरिकों को समान रूप से प्रभावित करती हैं.

जब 2016 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया गया था, तब नई दिल्ली में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के एक उत्साही संयुक्त सचिव ने रात्रिभोज के दौरान अनौपचारिक बातचीत में मुझसे और अन्य मित्रों से एक सवाल पूछा था. एक स्मार्ट सिटी की सफलता के लिए क्या-क्या आवश्यक होगा ? हममें से कई लोगों ने सहज रूप से कहा था कि शहरी सुरक्षा एक ऐसा पहलू है जिसकी लंबे समय से उपेक्षा की गई है और इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए.

हम सभी जानते हैं, अब समाप्त हो चुकी स्मार्ट सिटी परियोजना को देखते हुए, कि ‘स्मार्ट’ शहरों के रूप में चुने गए 100 शहरों में से एक भी भारत सरकार के निर्धारित लक्ष्यों के करीब भी नहीं पहुंच पाया. मेरे पास कोई आंकड़े नहीं हैं, लेकिन कईं स्मार्ट शहरों को करीब से देखने के बाद, मैं शर्त लगा सकता हूं कि उनमें से किसी ने भी पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बनाने के बारे में नहीं सोचा होगा.

अमीर लोग दफ्तरों में नहीं बल्कि बगीचों में टहलने जाते हैं. लेकिन बुजुर्गों, दिहाड़ी मजदूरों, गाड़ी न चला सकने वाली महिलाओं, शारीरिक रूप से विकलांगों और उन छात्रों का क्या जो बाजार, पास के दफ्तरों या विद्यालय और महाविद्यालय में जाते हैं?

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सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद उम्मीद यही है कि राज्य सरकारों के शहरी प्रशासन विभाग और शहरी विकास मंत्रालय अब पैदल यात्रियों के सुरक्षित रूप से चलने के अधिकार को सुनिश्चित करने के बारे में गंभीरता से सोचेंगे. वैसे, हम किसी आदिम युग में नहीं, बल्कि वर्ष 2026 में रह रहे हैं, सोचा याद दिला दूं.

अभिलाष खांडेकर वरिष्‍ठ पत्रकार है।

लेखक का परिचय

अभिलाष खांडेकर

अभिलाष खंडेकर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं, पर्यावरण, शहरीकरण आदि विषयों पर भी लिखते हैं।आपने हिंदुस्तान टाइम्स और डीएनए (डेली न्यूज़ एंड एनालिसिस) के संपादकीय प्रमुख के साथ काम किया है। 2007 और 2014 के बीच मध्य प्रदेश और फिर महाराष्ट्र में दैनिक भास्कर समूह के राज्य संपादक के रूप में सम्‍बद्ध रहे।

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